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नीलकंठ महादेव मंदिर ऋषिकेश: पौराणिक महत्व, इतिहास और सावन में लाखों भक्तों की आस्था

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नीलकंठ महादेव मंदिर ऋषिकेश: पौराणिक महत्व, इतिहास और सावन में लाखों भक्तों की आस्था

सारांश

ऋषिकेश से 32 किमी दूर मणिकूट पर्वत पर बसा नीलकंठ महादेव मंदिर वह पावन स्थल है जहाँ शिव ने हलाहल विष पीकर सृष्टि की रक्षा की थी। सावन में लाखों कांवड़िए यहाँ उमड़ते हैं और CM धामी ने भी इस धाम की आध्यात्मिक विरासत को एक्स पर साझा किया।

मुख्य बातें

नीलकंठ महादेव मंदिर उत्तराखंड के पौड़ी गढ़वाल जिले में ऋषिकेश से लगभग 32 किलोमीटर दूर मणिकूट पर्वत पर स्थित है।
पौराणिक मान्यता के अनुसार यहीं भगवान शिव ने समुद्र मंथन का हलाहल विष पिया था, जिससे उनका कंठ नीला पड़ा।
मंदिर में कंठ के आकार का स्वयंभू शिवलिंग स्थापित है, जो इसे अन्य शिव मंदिरों से अलग करता है।
मंदिर ब्रह्मकूट , विष्णुकूट और मणिकूट पहाड़ियों के बीच मधुमती व पंकजा नदियों के संगम पर अवस्थित है।
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने बुधवार को एक्स पर मंदिर का वीडियो साझा कर श्रद्धालुओं को दर्शन का आग्रह किया।
श्रावण मास और महाशिवरात्रि पर लाखों कांवड़िए गंगाजल लेकर यहाँ जलाभिषेक के लिए पहुँचते हैं।

नीलकंठ महादेव मंदिर, उत्तराखंड के पौड़ी गढ़वाल जिले में ऋषिकेश से लगभग 32 किलोमीटर दूर मणिकूट पर्वत पर स्थित है और इसे देवभूमि के सर्वाधिक पवित्र शैव तीर्थों में गिना जाता है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार यही वह स्थान है जहाँ भगवान शिव ने समुद्र मंथन से निकले हलाहल विष को अपने कंठ में धारण किया था, जिससे उनका गला नीला पड़ गया और वे 'नीलकंठ' कहलाए। श्रावण मास में देशभर से लाखों कांवड़िए गंगाजल लेकर यहाँ जलाभिषेक के लिए पहुँचते हैं।

मंदिर का पौराणिक इतिहास

धार्मिक ग्रंथों की मान्यता के अनुसार, समुद्र मंथन के दौरान उत्पन्न हलाहल विष की भीषण ऊष्मा को शांत करने के लिए भगवान शिव ने मणिकूट पर्वत पर वटवृक्ष के नीचे हजारों वर्षों तक समाधि लगाई थी। तपस्या की पूर्णाहुति के बाद उन्होंने अपने कंठ के प्रतीक रूप में यहाँ स्वयंभू शिवलिंग स्थापित किया, जो आज भी मंदिर के गर्भगृह में विराजमान है। यह शिवलिंग कंठ के आकार का है, जो इस स्थान की विशिष्ट पहचान है।

भौगोलिक और स्थापत्य विशेषताएँ

मंदिर तीन पर्वत-शृंखलाओं — ब्रह्मकूट, विष्णुकूट और मणिकूट — के मध्य मधुमती और पंकजा नदियों के संगम के निकट अवस्थित है। मंदिर के शिखर पर समुद्र मंथन का सुंदर और सजीव दृश्य उकेरा गया है, जो इसकी स्थापत्य कला को अन्य मंदिरों से अलग करता है। मंदिर की प्राचीन वास्तुकला और यहाँ का नैसर्गिक वातावरण श्रद्धालुओं को एक अलौकिक अनुभव प्रदान करता है।

मुख्यमंत्री धामी की अपील

उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने बुधवार को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर मंदिर का वीडियो साझा करते हुए लिखा, 'ऋषिकेश के निकट पौड़ी गढ़वाल जनपद में स्थित देवाधिदेव महादेव को समर्पित नीलकंठ महादेव मंदिर अत्यंत पावन तीर्थस्थल है। पौराणिक मान्यताओं और आध्यात्मिक ऊर्जा से परिपूर्ण यह धाम सावन मास में विशेष आस्था का केंद्र बन जाता है। देशभर से लाखों शिवभक्त कांवड़ में गंगाजल लेकर नीलकंठ महादेव पहुँचते हैं और भोलेनाथ का जलाभिषेक कर उनकी कृपा एवं आशीर्वाद प्राप्त करते हैं।' धामी ने श्रद्धालुओं से पौड़ी गढ़वाल आने पर इस मंदिर के दर्शन करने का आग्रह भी किया।

सावन और महाशिवरात्रि पर उमड़ती है भीड़

श्रावण मास और महाशिवरात्रि के अवसर पर नीलकंठ महादेव मंदिर में श्रद्धालुओं की संख्या अपने चरम पर होती है। सदियों से साधु-संत, ऋषि और आम भक्त इस स्थान को अपनी आस्था का केंद्र मानते आए हैं। यह मंदिर न केवल उत्तराखंड, बल्कि समूचे भारत की पौराणिक सांस्कृतिक विरासत का एक जीवंत प्रतीक है, और आने वाले समय में भी तीर्थाटन के मानचित्र पर इसकी केंद्रीय भूमिका बनी रहेगी।

संपादकीय दृष्टिकोण

जो राज्य की अर्थव्यवस्था में सावन के महीने में उल्लेखनीय योगदान देती है। मुख्यमंत्री धामी का एक्स पोस्ट इस बात का संकेत है कि सरकार धार्मिक पर्यटन को डिजिटल माध्यमों से प्रचारित करने की रणनीति अपना रही है। हालाँकि, लाखों कांवड़ियों की भीड़ के बीच मंदिर मार्ग पर यातायात प्रबंधन और बुनियादी सुविधाओं की पर्याप्तता एक ऐसा पहलू है जिस पर सरकारी घोषणाओं में प्रायः कम ध्यान दिया जाता है।
RashtraPress
12 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

नीलकंठ महादेव मंदिर कहाँ स्थित है?
नीलकंठ महादेव मंदिर उत्तराखंड के पौड़ी गढ़वाल जिले में ऋषिकेश से लगभग 32 किलोमीटर दूर मणिकूट पर्वत पर स्थित है। यह मधुमती और पंकजा नदियों के संगम के निकट ब्रह्मकूट, विष्णुकूट और मणिकूट पहाड़ियों के बीच बसा है।
नीलकंठ महादेव मंदिर का पौराणिक महत्व क्या है?
पौराणिक मान्यता के अनुसार यही वह स्थान है जहाँ भगवान शिव ने समुद्र मंथन से निकले हलाहल विष को अपने कंठ में धारण किया था, जिससे उनका गला नीला पड़ गया और वे 'नीलकंठ' कहलाए। विषपान के बाद उन्होंने यहीं वटवृक्ष के नीचे हजारों वर्षों तक तपस्या की और फिर अपने कंठ के प्रतीक रूप में स्वयंभू शिवलिंग स्थापित किया।
सावन में नीलकंठ महादेव मंदिर क्यों विशेष हो जाता है?
श्रावण मास में देशभर से लाखों शिवभक्त कांवड़ में गंगाजल लेकर नीलकंठ महादेव पहुँचते हैं और जलाभिषेक करते हैं। महाशिवरात्रि पर भी यहाँ भारी भीड़ उमड़ती है, जिससे यह मंदिर वर्षभर में इन दो अवसरों पर सर्वाधिक सक्रिय तीर्थस्थल बन जाता है।
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने नीलकंठ महादेव मंदिर के बारे में क्या कहा?
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने बुधवार को एक्स पर मंदिर का वीडियो साझा करते हुए इसे 'अत्यंत पावन तीर्थस्थल' बताया। उन्होंने श्रद्धालुओं से पौड़ी गढ़वाल आने पर इस धाम के दर्शन करने का आग्रह किया।
नीलकंठ महादेव मंदिर में कैसा शिवलिंग है?
मंदिर के गर्भगृह में कंठ के आकार का स्वयंभू शिवलिंग स्थापित है, जो इस मंदिर की सबसे विशिष्ट पहचान है। यह शिवलिंग भगवान शिव के नीलकंठ स्वरूप का प्रतीक माना जाता है।
राष्ट्र प्रेस
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