मणिपुर में सुरक्षा बलों पर एनएससीएन-आईएम का गंभीर आरोप — कुकी उग्रवादियों को मिल रहा 'संरक्षण'
सारांश
मुख्य बातें
नेशनल सोशलिस्ट काउंसिल ऑफ नागालिम (एनएससीएन-आईएम) के इसाक-मुइवा गुट ने 26 मई को आरोप लगाया कि मणिपुर में तैनात भारतीय सुरक्षा बल तटस्थता का दिखावा करते हुए कथित तौर पर कुकी उग्रवादियों को संरक्षण दे रहे हैं और नागा गाँवों को निशाना बनाने के लिए जमीनी व हवाई रसद सहायता मुहैया करा रहे हैं। यह आरोप नागालैंड के हेब्रोन कैंप में आयोजित 75वें नागा जनमत संग्रह दिवस की सभा में लगाए गए।
मुख्य आरोप और घटनाक्रम
एनएससीएन-आईएम के अध्यक्ष क्वेहेज़ू टुक्कू ने सभा को संबोधित करते हुए दावा किया कि सुरक्षा बल 'कुकी नार्को-आतंकवादियों' के साथ मिलीभगत कर रहे हैं। उनके अनुसार, नागा रक्षा बंकरों को ध्वस्त किया जा रहा है, नागा नागरिकों की हत्या हो रही है, घरों को जलाया जा रहा है और नागा गाँवों पर हमला करने वाले सशस्त्र गुटों को खुला संरक्षण मिल रहा है।
टुक्कू ने विशेष रूप से 13 मई की उस घटना का उल्लेख किया, जिसमें कथित तौर पर म्यांमार स्थित कुकी उग्रवादियों ने तीन तंगखुल नागा व्यक्तियों पर हमला किया। उनका कहना था कि इस हमले ने भारतीय सुरक्षा बलों की भूमिका पर 'गंभीर सवाल' खड़े किए हैं।
फ्रेमवर्क समझौते पर केंद्र सरकार की आलोचना
टुक्कू ने केंद्र सरकार पर 3 अगस्त 2015 को हस्ताक्षरित फ्रेमवर्क समझौते के तहत किए गए वादों को पूरा न करने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा, 'हम भारत सरकार के दोहरे रवैये की कड़ी निंदा करते हैं, विशेष रूप से ऐतिहासिक फ्रेमवर्क समझौते में किए गए वादों को तोड़ने के लिए, जिसमें नागाओं की विशिष्टता को मान्यता देने वाले एक समझौते की परिकल्पना की गई थी, लेकिन जो अभी तक लागू नहीं हुआ है।'
एनएससीएन-आईएम नेता ने यह भी कहा कि 'भारत सरकार द्वारा कुकी नार्को-आतंकवादियों का इस तरह से इस्तेमाल करना युद्धविराम के बुनियादी नियमों और अंतरराष्ट्रीय स्वदेशी अधिकार कानूनों का स्पष्ट उल्लंघन है।' यह आरोप संगठन की ओर से हैं; सुरक्षा बलों या केंद्र सरकार की ओर से अभी तक कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।
नागा संप्रभुता और भूमि अधिकारों की माँग
टुक्कू ने नागा राजनीतिक आंदोलन को 'स्थायी विरासत' बताते हुए कहा कि नागाओं के 'अद्वितीय इतिहास और अधिकारों' को मान्यता देने वाला एक सम्मानजनक राजनीतिक समाधान अनिवार्य है। उन्होंने चेतावनी दी, 'संप्रभुता की कीमत पर आकर्षक आर्थिक पैकेज समाधान का विकल्प नहीं हैं।'
संगठन ने यह भी दावा किया कि बाहरी ताकतें स्वदेशी अधिकारों को मान्यता दिए बिना नागाओं की पैतृक भूमि पर कब्जे का प्रयास कर रही हैं। टुक्कू ने कहा, 'नागा क्षेत्र केवल नागा लोगों के हैं और हम अपनी ईश्वर प्रदत्त भूमि की हर कीमत पर रक्षा करेंगे।'
नागा जनमत संग्रह का ऐतिहासिक संदर्भ
गौरतलब है कि यह जनमत संग्रह ए.जेड. फिजो के नेतृत्व में नागा राष्ट्रीय परिषद (एनएनसी) द्वारा 14 अगस्त 1947 को नागा स्वतंत्रता की घोषणा के बाद आयोजित किया गया था। संगठन के अनुसार, इसमें 99.9 प्रतिशत नागा आबादी ने भारतीय संघ से अलग एक स्वतंत्र और संप्रभु नागा राष्ट्र के समर्थन में अंगूठे के निशान लगाए थे।
यह ऐसे समय में आया है जब केंद्र और विभिन्न नागा समूहों के बीच दशकों में 90 से अधिक दौर की वार्ताएँ हो चुकी हैं, फिर भी कोई अंतिम समझौता नहीं हो सका है। एनएससीएन-आईएम लगातार एक अलग नागा ध्वज और संविधान की माँग करता रहा है, साथ ही अरुणाचल प्रदेश, असम, मणिपुर, नागालैंड और म्यांमार के कुछ हिस्सों में फैले नागा-बहुल क्षेत्रों के एकीकरण की भी।
आगे की स्थिति
मणिपुर में जातीय तनाव की पृष्ठभूमि में एनएससीएन-आईएम के ये आरोप संघर्ष को एक नई परत देते हैं। केंद्र सरकार और सुरक्षा बलों की ओर से इन आरोपों पर अभी कोई आधिकारिक बयान नहीं आया है। नागा राजनीतिक वार्ता की अगली दिशा इन आरोपों के मद्देनजर और अधिक जटिल होने की संभावना है।