पान मसाला विज्ञापन से युवा नशे की राह पर: FDA नोटिस का संजय निरुपम ने किया समर्थन
सारांश
मुख्य बातें
शिवसेना प्रवक्ता संजय निरुपम ने 17 अगस्त को मुंबई में कहा कि महाराष्ट्र खाद्य एवं औषधि प्रशासन (FDA) द्वारा शाहरुख खान, अजय देवगन और टाइगर श्रॉफ को पान मसाला के सरोगेट विज्ञापनों को लेकर नोटिस दिया जाना पूरी तरह उचित है। उनके अनुसार, इस तरह के विज्ञापन युवा पीढ़ी को नशीले पदार्थों की ओर धकेलते हैं और समाज के लिए घातक हैं।
FDA नोटिस पर निरुपम का रुख
निरुपम ने स्पष्ट किया कि पान मसाला, गुटखा और जर्दा जैसे पदार्थ प्रतिबंधित श्रेणी में आते हैं। उन्होंने कहा कि महाराष्ट्र में पान मसाला और गुटखे की सार्वजनिक बिक्री पर पहले से पाबंदी है। ऐसे में जब शाहरुख खान, अजय देवगन या टाइगर श्रॉफ जैसे सुपरस्टार सरोगेट विज्ञापनों के ज़रिए इन ब्रांडों का प्रचार करते हैं, तो उनके करोड़ों प्रशंसक — विशेषकर युवा — इन पदार्थों के सेवन के लिए प्रेरित होते हैं।
उन्होंने कहा कि इन नशीले पदार्थों के सेवन से गंभीर बीमारियाँ होती हैं और कैंसर के कारण बड़ी संख्या में लोगों की जान जाती है। उनके शब्दों में, 'यह विज्ञापन समाज के लिए, पूरी युवा पीढ़ी के लिए और देश के लिए घातक हैं और गैरकानूनी भी हैं।' निरुपम ने आग्रह किया कि फिल्म स्टार्स को FDA के इस निर्णय का सम्मान करना चाहिए।
'दिमागी नक्सल' विवाद पर प्रतिक्रिया
पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती द्वारा खुद को 'दिमागी नक्सल' बताए जाने पर निरुपम ने तीखी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने याद दिलाया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्वतंत्रता दिवस पर लाल किले की प्राचीर से कुछ अराजक तत्वों को 'दिमागी नक्सलवादी' कहा था।
निरुपम ने सवाल उठाया कि जब पी. चिदंबरम और महबूबा मुफ्ती जैसे विपक्षी नेता गर्व से खुद को 'दिमागी नक्सली' बता रहे हैं, तो क्या वे स्वीकार करते हैं कि उनका भारत के संविधान और अहिंसक गांधीवादी विचारधारा में विश्वास नहीं है? उन्होंने कहा कि इसका जवाब चिदंबरम को सार्वजनिक रूप से देना होगा।
गौरतलब है कि आर्टिकल 370 को भारत की संसद ने विधिवत हटाया था। निरुपम के अनुसार, यदि महबूबा मुफ्ती इसे पुनः लागू कराने की माँग करने वाले तत्वों का समर्थन करती हैं, तो यह संसदीय निर्णय के प्रति अविश्वास को दर्शाता है।
गोपीनाथ मुंडे और कांग्रेस की अंदरूनी कलह
कांग्रेस नेता हुसैन दलवाई के इस दावे पर कि दिवंगत गोपीनाथ मुंडे और एकनाथ शिंदे कांग्रेस में शामिल होने को तैयार थे, निरुपम ने कहा कि गोपीनाथ मुंडे के संदर्भ में इसमें काफी सच्चाई है।
उन्होंने बताया कि 2009 के लोकसभा चुनाव के बाद 2012-13 के आसपास पुणे में एक जिला अध्यक्ष की नियुक्ति के मुद्दे पर तत्कालीन भाजपा राष्ट्रीय अध्यक्ष से मुंडे का तनाव बढ़ गया था। इसी दौरान उन्होंने कांग्रेस में जाने पर विचार किया था और तत्कालीन प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह से भी मुलाकात की थी। विलासराव देशमुख इस बातचीत में मध्यस्थ की भूमिका निभा रहे थे। हालाँकि, जैसे ही भाजपा के शीर्ष नेतृत्व को इसकी भनक लगी, उन्होंने मुंडे की सभी चिंताओं को दूर करते हुए उन्हें पार्टी में ही रोक लिया।
भाजपा और कांग्रेस की कार्यसंस्कृति में फर्क
निरुपम ने कहा कि यही भाजपा और कांग्रेस की कार्यसंस्कृति का मूल अंतर है। उनके अनुसार, कांग्रेस में जब कोई बड़ा नेता नाराज होता है, तो शीर्ष नेतृत्व उसे मनाने की बजाय 'एक धक्का और' देता है। उन्होंने दावा किया कि यदि पृथ्वीराज चव्हाण या हुसैन दलवाई आज पार्टी छोड़ने की सोचें, तो उन्हें थामने वाला कोई नहीं होगा — बल्कि दिल्ली से पार्टी उन्हें बाहर करने में जुट जाएगी। इसके विपरीत, भाजपा में नेतृत्व और कार्यकर्ता अपने लोगों को संभालने के लिए दिन-रात प्रयास करते हैं।
यह बयान ऐसे समय में आया है जब महाराष्ट्र में राजनीतिक गठजोड़ों और दलबदल की चर्चाएँ एक बार फिर तेज हो गई हैं और विधानसभा चुनावों की तैयारियाँ जोर पकड़ रही हैं।