14 अगस्त 2026
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सियालदह रेलवे स्टेशन पर 1947 बंटवारे के पीड़ितों की याद में स्मारक का भूमि पूजन

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सियालदह रेलवे स्टेशन पर 1947 बंटवारे के पीड़ितों की याद में स्मारक का भूमि पूजन

सारांश

सियालदह — जो 1947 में लाखों शरणार्थियों का पहला आश्रय बना था — अब उनकी स्थायी स्मृति का स्थल बनेगा। 14 अगस्त को भूमि पूजन के साथ, बंटवारे की पीड़ा को राष्ट्रीय स्मृति में अंकित करने की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम उठाया गया।

मुख्य बातें

सियालदह रेलवे स्टेशन , कोलकाता पर 14 अगस्त 2026 को 1947 के बंटवारे के पीड़ितों की स्मृति में स्मारक मूर्ति के लिए भूमि पूजन किया गया।
आयोजन केंद्रीय संस्कृति मंत्रालय और IGNCA के सहयोग से संपन्न हुआ।
रिपोर्टों के अनुसार 1947–1950 के बीच किसी भी समय स्टेशन पर 20,000 से अधिक शरणार्थी उपस्थित रहते थे।
बंटवारे के प्रत्यक्षदर्शी हिमांशु गंगोपाध्याय समारोह में उपस्थित रहे।
समारोह में बंटवारे की दुर्लभ तस्वीरों की एक विशेष फोटो प्रदर्शनी भी आयोजित की गई।

कोलकाता के ऐतिहासिक सियालदह रेलवे स्टेशन पर 14 अगस्त 2026 को 1947 के बंटवारे के पीड़ितों की स्मृति में एक स्मारक मूर्ति की स्थापना के लिए भूमि पूजन किया गया। यह आयोजन केंद्रीय संस्कृति मंत्रालय और इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र (IGNCA) के संयुक्त तत्वावधान में संपन्न हुआ। यह प्रस्तावित स्मारक आधुनिक इतिहास के सबसे बड़े जबरन विस्थापनों में से एक के दौरान विस्थापन, पीड़ा, हिंसा और अपूरणीय क्षति झेलने वाले अनगिनत लोगों को श्रद्धांजलि अर्पित करेगा।

मुख्य घटनाक्रम

भूमि पूजन समारोह में पश्चिम बंगाल की शहरी विकास मंत्री अग्निमित्रा पॉल, सूचना और सांस्कृतिक मामलों की राज्य मंत्री पूर्णिमा चक्रवर्ती, और सार्वजनिक उद्यम एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्री तापस रॉय सम्मिलित हुए। पूर्वी रेलवे की महाप्रबंधक गीतिका पांडे, सियालदह मंडल के मंडल रेल प्रबंधक राजीव सक्सेना और IGNCA के विभागाध्यक्ष के. अनिल कुमार भी इस अवसर पर उपस्थित रहे। बंटवारे के प्रत्यक्षदर्शी हिमांशु गंगोपाध्याय की उपस्थिति ने इस समारोह को विशेष भावनात्मक गहराई दी।

सियालदह का ऐतिहासिक महत्व

बंटवारे के दौरान सियालदह स्टेशन लाखों बंगाली हिंदू शरणार्थियों का पहला पड़ाव बना, जो पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) से विस्थापित होकर यहाँ पहुँचे थे। उस समय की रिपोर्टों के अनुसार, 1947 और 1950 के बीच किसी भी समय स्टेशन पर 20,000 से अधिक शरणार्थी मौजूद रहते थे। इनमें से अनेक शरणार्थी शिविरों में चले गए, जबकि कुछ महीनों — और यहाँ तक कि वर्षों — तक प्लेटफॉर्म पर ही रहे। लोगों का आगमन धीरे-धीरे कम हुआ, परंतु 1960 के दशक के अंत तक जारी रहा।

रेलवे अधिकारी की प्रतिक्रिया

एक रेलवे अधिकारी ने इस अवसर पर कहा, 'हजारों लोग सुरक्षा और नई शुरुआत के लिए घर, परिवार, सामान और जानी-पहचानी जगहों को छोड़कर सियालदह पहुँचे। कई शरणार्थियों के लिए सियालदह एक रेलवे स्टेशन से कहीं अधिक, एक अनजान और अनिश्चित जीवन में आगमन का पहला पड़ाव था। इस स्टेशन ने विस्थापित परिवारों की भारी कठिनाइयों के साथ-साथ उनके साहस, उम्मीद और दृढ़ संकल्प को भी देखा।'

फोटो प्रदर्शनी — स्मृति का दर्पण

समारोह के दौरान बंटवारे के पीड़ितों की याद में एक विशेष फोटो प्रदर्शनी भी आयोजित की गई। इसमें बंटवारे, बड़े पैमाने पर विस्थापन, परिवारों द्वारा झेली गई कठिनाइयों और जीवन को पुनः खड़ा करने की उनकी यात्रा को दर्शाने वाली दुर्लभ तस्वीरें प्रदर्शित की गईं। यह प्रदर्शनी उन सभी के साहस और सहनशक्ति को एक मूक श्रद्धांजलि थी, जिन्होंने असाधारण विपरीत परिस्थितियों में भी जीने की उम्मीद नहीं छोड़ी।

आगे की राह

यह स्मारक बंटवारे की सामूहिक पीड़ा को राष्ट्रीय स्मृति में स्थायी रूप से अंकित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। IGNCA और संस्कृति मंत्रालय के सहयोग से निर्मित यह मूर्ति सियालदह की उस विरासत को चिरस्थायी बनाएगी, जो दर्द और पुनर्निर्माण दोनों की गवाह रही है।

संपादकीय दृष्टिकोण

बल्कि उस सामूहिक स्मृतिलोप को स्वीकार करने का प्रयास है जो दशकों तक बंटवारे की पीड़ा को मुख्यधारा के इतिहास-लेखन में उचित स्थान नहीं मिलने से उपजा। गौरतलब है कि भारत में बंटवारे की स्मृति को संस्थागत रूप देने की पहल अपेक्षाकृत देर से शुरू हुई है — 2021 में 'विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस' की घोषणा उसी कड़ी का हिस्सा है। असली परीक्षा यह है कि यह स्मारक केवल प्रतीकात्मक रहेगा या शरणार्थी परिवारों की मौखिक स्मृतियों और अभिलेखों को जीवित रखने का सक्रिय केंद्र भी बनेगा। जब तक इसमें जीवित साक्षियों की आवाज़ें दर्ज करने की ठोस योजना नहीं जुड़ती, यह स्मृति पत्थर में तो उकेरी जाएगी, पर इतिहास में नहीं।
RashtraPress
14 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

सियालदह रेलवे स्टेशन पर किस स्मारक का भूमि पूजन हुआ?
14 अगस्त 2026 को सियालदह रेलवे स्टेशन पर 1947 के बंटवारे के पीड़ितों की याद में एक स्मारक मूर्ति स्थापित करने के लिए भूमि पूजन किया गया। यह आयोजन केंद्रीय संस्कृति मंत्रालय और IGNCA के सहयोग से हुआ।
बंटवारे के दौरान सियालदह स्टेशन की क्या भूमिका थी?
1947 के बंटवारे के दौरान सियालदह स्टेशन पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) से विस्थापित लाखों बंगाली हिंदू शरणार्थियों का पहला पड़ाव बना। उस समय की रिपोर्टों के अनुसार 1947 और 1950 के बीच किसी भी समय वहाँ 20,000 से अधिक शरणार्थी मौजूद रहते थे।
इस स्मारक समारोह में कौन-कौन से प्रमुख अधिकारी शामिल हुए?
समारोह में पश्चिम बंगाल की शहरी विकास मंत्री अग्निमित्रा पॉल, राज्य मंत्री पूर्णिमा चक्रवर्ती, मंत्री तापस रॉय, पूर्वी रेलवे महाप्रबंधक गीतिका पांडे, मंडल रेल प्रबंधक राजीव सक्सेना और IGNCA के विभागाध्यक्ष के. अनिल कुमार उपस्थित रहे।
भूमि पूजन के साथ और क्या आयोजन हुए?
भूमि पूजन के साथ-साथ बंटवारे की दुर्लभ तस्वीरों की एक विशेष फोटो प्रदर्शनी भी आयोजित की गई, जिसमें विस्थापन, कठिनाइयों और पुनर्निर्माण की यात्रा को दर्शाया गया। बंटवारे के प्रत्यक्षदर्शी हिमांशु गंगोपाध्याय भी इस अवसर पर उपस्थित थे।
यह स्मारक किसे समर्पित होगा?
यह स्मारक उन सभी लोगों को समर्पित होगा जिन्होंने 1947 के बंटवारे के दौरान विस्थापन, हिंसा, पीड़ा और अपूरणीय क्षति झेली। यह आधुनिक इतिहास के सबसे बड़े जबरन विस्थापनों में से एक की सामूहिक स्मृति को संस्थागत रूप देने का प्रयास है।
राष्ट्र प्रेस
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