2 अगस्त 2026
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हाबरा रेलवे स्टेशन पर अतिक्रमण-विरोधी अभियान, दुकानदारों-फेरीवालों का विरोध; CPI(M) दफ्तर भी गिराया

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हाबरा रेलवे स्टेशन पर अतिक्रमण-विरोधी अभियान, दुकानदारों-फेरीवालों का विरोध; CPI(M) दफ्तर भी गिराया

सारांश

हाबरा रेलवे स्टेशन पर तड़के चले अतिक्रमण-विरोधी अभियान ने बड़ा तनाव खड़ा कर दिया — कथित CPI(M) कार्यालय सहित पक्के ढाँचे ध्वस्त किए गए, फेरीवाले और वामपंथी कार्यकर्ता सड़क पर उतरे। यह पश्चिम बंगाल में रेलवे की राज्यव्यापी बेदखली मुहिम की ताज़ा कड़ी है।

मुख्य बातें

हाबरा रेलवे स्टेशन पर मंगलवार तड़के बड़ा अतिक्रमण-विरोधी अभियान चलाया गया, जिसमें अवैध दुकानें और पक्के ढाँचे हटाए गए।
दुकानदारों को 15 जून तक जमीन खाली करने का नोटिस दिया गया था; समय-सीमा बीतने के बाद कार्रवाई हुई।
स्थानीय सूत्रों के अनुसार, CPI(M) का एक कार्यालय भी उन ढाँचों में शामिल था जिन्हें ध्वस्त किया गया।
GRP, RPF और राज्य पुलिस के साथ केंद्रीय सुरक्षा बल तैनात किए गए; कोई बड़ी अप्रिय घटना नहीं हुई।
फेरीवाला संगठनों ने पुनर्वास के बिना आजीविका छिनने का आरोप लगाते हुए विरोध प्रदर्शन किया।
यह अभियान हावड़ा, सियालदह, जाधवपुर और दम दम स्टेशनों पर हो चुके ऐसे ही ऑपरेशनों की श्रृंखला का हिस्सा है।

पश्चिम बंगाल के उत्तर 24 परगना जिले के हाबरा रेलवे स्टेशन पर 17 जून 2025 को तनाव का माहौल बन गया, जब रेलवे अधिकारियों ने मंगलवार की तड़के रेलवे की जमीन और स्टेशन परिसर से कथित तौर पर अवैध दुकानों एवं ढाँचों को हटाने के लिए बड़ा अतिक्रमण-विरोधी अभियान चलाया। इस कार्रवाई के दौरान सैकड़ों फेरीवाले और दुकानदार मौके पर जमा हो गए और बेदखली का विरोध किया।

अभियान की पृष्ठभूमि और नोटिस

पुलिस के अनुसार, रेलवे की जमीन पर कब्ज़ा किए हुए दुकानदारों और ढाँचों के मालिकों को इस महीने की शुरुआत में नोटिस जारी किए गए थे और 15 जून तक जमीन खाली करने का निर्देश दिया गया था। समय-सीमा बीत जाने के बाद भी कई लोगों ने परिसर नहीं छोड़ा, जिसके बाद रेलवे अधिकारियों ने तोड़-फोड़ अभियान शुरू किया।

लाउडस्पीकर के ज़रिए घोषणाएँ कर दुकानदारों और निवासियों को इस कार्रवाई की पूर्व-सूचना दी गई थी। रेलवे अधिकारियों का कहना है कि कब्ज़ा करने वालों को स्वेच्छा से दुकानें हटाने के लिए पर्याप्त समय दिया गया था।

सुरक्षा बलों की तैनाती

किसी भी अप्रिय घटना को रोकने के लिए मंगलवार रात करीब 1 बजे स्टेशन परिसर में केंद्रीय सुरक्षा बल तैनात किए गए। ऑपरेशन के दौरान सरकारी रेलवे पुलिस (GRP), रेलवे सुरक्षा बल (RPF) और राज्य पुलिस के जवान भी मौजूद रहे, ताकि कानून-व्यवस्था बनाए रखी जा सके।

CPI(M) कार्यालय सहित पक्के ढाँचे भी ध्वस्त

अभियान के दौरान अस्थायी स्टालों के अलावा रेलवे की जमीन पर कथित तौर पर बने कई पक्के ढाँचे भी गिराए गए। स्थानीय सूत्रों का दावा है कि कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (मार्क्सवादी) का एक कार्यालय भी उन ढाँचों में शामिल था जिन्हें इस ऑपरेशन में हटाया गया। इसके बाद वामपंथी कार्यकर्ताओं ने स्टेशन परिसर में विरोध प्रदर्शन किया। बताया जाता है कि जब प्रदर्शनकारियों से इलाका खाली करने को कहा गया तो पुलिस के साथ उनकी बहस हुई, हालाँकि किसी बड़ी अप्रिय घटना की खबर नहीं है।

आम जनता और फेरीवालों पर असर

हाबरा उत्तर 24 परगना के सबसे व्यस्त रेलवे स्टेशनों में से एक है, जहाँ रोज़ाना हज़ारों यात्री आते-जाते हैं। पिछले कुछ वर्षों में स्टेशन परिसर के आसपास अनधिकृत दुकानें और कब्ज़े बढ़ते रहे, जिससे खासकर ऑफिस के व्यस्त घंटों में यात्रियों को भारी भीड़ और असुविधा का सामना करना पड़ता था। कई नियमित यात्री लंबे समय से इस इलाके को खाली कराने की माँग करते आए थे।

कुछ दुकानदारों ने तोड़-फोड़ अभियान की वैधता पर सवाल उठाए और आरोप लगाया कि बिना किसी पुनर्वास उपाय के उनकी आजीविका छीन ली गई। फेरीवाला संगठनों ने भी कई स्थानों पर विरोध प्रदर्शन किए और अपने कारोबार व आय की सुरक्षा की माँग की।

राज्यव्यापी अतिक्रमण-विरोधी मुहिम का हिस्सा

हाबरा का यह ऑपरेशन रेलवे की उस व्यापक पहल का हिस्सा है, जिसके तहत पश्चिम बंगाल के विभिन्न स्टेशन परिसरों और रेलवे भूमि से कब्ज़े हटाए जा रहे हैं। इससे पहले हावड़ा, सियालदह, जाधवपुर और दम दम स्टेशनों पर भी इसी तरह के अभियान चलाए जा चुके हैं। आगे भी ऐसे अभियानों की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता, जिससे स्टेशन परिसरों पर निर्भर दुकानदारों और फेरीवालों की चिंताएँ बढ़ी हुई हैं।

संपादकीय दृष्टिकोण

जहाँ केंद्रीय एजेंसियाँ ज़मीन वापस लेने की कोशिश करती हैं और स्थानीय राजनीतिक समीकरण उसमें बाधा बनते हैं। CPI(M) कार्यालय के ध्वस्त होने का दावा इस ऑपरेशन को राजनीतिक रंग देता है, जबकि रेलवे इसे नियमित प्रशासनिक कदम बताती है। असली सवाल यह है कि बेदखल दुकानदारों के पुनर्वास की कोई ठोस योजना है या नहीं — क्योंकि बिना वैकल्पिक व्यवस्था के ऐसे अभियान आजीविका संकट को और गहरा करते हैं।
RashtraPress
2 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

हाबरा रेलवे स्टेशन पर अतिक्रमण-विरोधी अभियान क्यों चलाया गया?
रेलवे की जमीन और स्टेशन परिसर पर वर्षों से अवैध दुकानें और ढाँचे बन गए थे, जिससे यात्रियों को भीड़ और असुविधा होती थी। दुकानदारों को 15 जून तक जमीन खाली करने का नोटिस दिया गया था, और समय-सीमा बीतने के बाद रेलवे अधिकारियों ने तोड़-फोड़ अभियान शुरू किया।
क्या CPI(M) का कार्यालय भी इस अभियान में गिराया गया?
स्थानीय सूत्रों का दावा है कि रेलवे की जमीन पर बना कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (मार्क्सवादी) का एक कार्यालय भी उन ढाँचों में शामिल था जिन्हें ऑपरेशन के दौरान हटाया गया। इसके बाद वामपंथी कार्यकर्ताओं ने स्टेशन परिसर में विरोध प्रदर्शन किया।
अभियान के दौरान कानून-व्यवस्था कैसे बनाए रखी गई?
मंगलवार रात करीब 1 बजे केंद्रीय सुरक्षा बल तैनात किए गए। GRP, RPF और राज्य पुलिस के जवान भी मौजूद रहे। प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच बहस हुई, लेकिन किसी बड़ी अप्रिय घटना की खबर नहीं है।
फेरीवालों और दुकानदारों की मुख्य माँग क्या है?
बेदखल दुकानदारों और फेरीवाला संगठनों का आरोप है कि बिना किसी पुनर्वास उपाय के उनकी आजीविका छीन ली गई। उन्होंने अपने कारोबार और आय की सुरक्षा के लिए वैकल्पिक व्यवस्था की माँग की है।
क्या पश्चिम बंगाल के अन्य स्टेशनों पर भी ऐसे अभियान चले हैं?
हाँ, हाबरा ऑपरेशन रेलवे की राज्यव्यापी मुहिम का हिस्सा है। इससे पहले हावड़ा, सियालदह, जाधवपुर और दम दम स्टेशनों पर भी इसी तरह के अतिक्रमण-विरोधी अभियान चलाए जा चुके हैं।
राष्ट्र प्रेस
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