भाजपा की 'लोकतंत्र बचाओ' रैली पर सपा का तंज: 'सत्ता में रहते सड़क पर आंदोलन पहली बार'
सारांश
मुख्य बातें
समाजवादी पार्टी (सपा) और कांग्रेस ने 4 नवंबर 2026 को लखनऊ में भारतीय जनता पार्टी (BJP) की 'लोकतंत्र बचाओ, अराजकता हटाओ' रैली पर तीखा पलटवार किया। सपा सांसद, विधायक और कांग्रेस प्रवक्ता ने एक सुर में सवाल उठाया कि सत्तारूढ़ दल का सड़क पर उतरकर नारेबाज़ी करना खुद उनकी विफलता का स्वीकरोक्ति है।
सपा सांसद का सीधा सवाल
सपा सांसद रमाशंकर राजभर ने कहा, 'भाजपा का यह नारा किसे संबोधित कर रहा है? अगर देश में अराजकता का माहौल है, तो इसके लिए भाजपा और उसकी सरकार जिम्मेदार हैं। भाजपा सत्ता में है और सरकार चला रही है, तो फिर वह दूसरों के खिलाफ 'देश बचाओ और अराजकता खत्म करो' जैसे नारे क्यों लगा रही है?' उन्होंने यह भी कहा कि बागेश्वर धाम पीठाधीश्वर धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री की भगवान कृष्ण पर की गई टिप्पणी 'पूरी तरह निंदनीय' है और प्रशासन को दोषियों के विरुद्ध कार्रवाई करनी चाहिए।
सपा विधायक का तीखा तंज
सपा विधायक अमिताभ बाजपेई ने रैली को लेकर कहा, ''लोकतंत्र बचाओ, अराजकता हटाओ' रैली निकालकर भाजपा यह मान रही है कि देश में अराजकता है। यह पहली बार है कि कोई राजनीतिक दल सरकार में रहते हुए सड़क पर आंदोलन कर रहा है।' उन्होंने आगे दावा किया कि 'इस रैली के ज़रिए भाजपा नेता विपक्ष की भूमिका निभाने की तैयारी कर रहे हैं।'
बाजपेई ने धीरेंद्र शास्त्री के बयान पर भी प्रतिक्रिया दी और कहा कि 'अगर कोई विपक्ष का नेता ऐसा बयान देता, तो अब तक हंगामा हो गया होता।' यह टिप्पणी भाजपा पर चुनिंदा धार्मिक संवेदनशीलता का आरोप लगाती है।
कांग्रेस की प्रतिक्रिया और 'इंडिया' ब्लॉक
कांग्रेस प्रवक्ता सुरेंद्र राजपूत ने 2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों से पहले सपा प्रमुख अखिलेश यादव की रणनीति का समर्थन करते हुए कहा, 'अगर समाजवादी पार्टी पिछड़े समुदायों, दलितों और आदिवासियों के मुद्दों को उठा रही है, तो यह एक स्वागत योग्य कदम है।' उन्होंने स्पष्ट किया कि अखिलेश यादव चुनाव लड़ें या न लड़ें, वे 'इंडिया' ब्लॉक के प्रमुख नेताओं में से एक हैं और उनका कोई भी फैसला गठबंधन को मंज़ूर होगा।
राजनीतिक पृष्ठभूमि
गौरतलब है कि यह बयानबाज़ी ऐसे समय में आई है जब उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव करीब आ रहे हैं और सपा-कांग्रेस गठबंधन अपनी स्थिति मज़बूत करने में जुटा है। भाजपा की रैली को विपक्ष ने सत्ता में रहते हुए जनता का ध्यान भटकाने की कोशिश के रूप में प्रस्तुत किया। आलोचकों का कहना है कि इस तरह की रैलियाँ उस राजनीतिक असुरक्षा का संकेत हो सकती हैं जो सत्तारूढ़ दल को बड़े चुनावी मुकाबले से पहले घेर रही है।
आगे क्या होगा
2027 के चुनावों को देखते हुए यह राजनीतिक घमासान और तेज़ होने की संभावना है। 'इंडिया' ब्लॉक के दलों की एकजुटता और भाजपा की जन-संपर्क रणनीति — दोनों की परीक्षा आने वाले महीनों में होगी। विशेषज्ञों के अनुसार, धार्मिक और सामाजिक मुद्दों पर बयानबाज़ी उत्तर प्रदेश की चुनावी राजनीति का अहम हिस्सा बने रहने की संभावना है।