पीएलए तैनाती में कमी के बावजूद भारत को सतर्कता बनाए रखनी होगी: रिटायर्ड मेजर जनरल प्रमोद सहगल
सारांश
मुख्य बातें
रिटायर्ड मेजर जनरल प्रमोद सहगल ने 14 सितंबर 2026 को चेतावनी दी कि उत्तरी सीमाओं पर चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (पीएलए) की तैनाती में कमी और कूटनीतिक स्तर पर बातचीत के सकारात्मक संकेतों के बावजूद भारत को अपनी रक्षा तैयारियों, सैन्य तैनाती और वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) पर सीमा अवसंरचना में किसी भी प्रकार की ढील नहीं देनी चाहिए। उन्होंने स्पष्ट किया कि भारत-चीन संबंधों में सुधार के संकेतों का स्वागत होना चाहिए, परंतु सुरक्षा नीति केवल राजनीतिक बयानों के आधार पर नहीं बदली जानी चाहिए।
कूटनीतिक घटनाक्रम और व्यापक परिप्रेक्ष्य
मेजर जनरल सहगल ने कहा कि रक्षा मंत्रालय की रिपोर्ट और हालिया कूटनीतिक घटनाक्रमों को व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखना आवश्यक है। उनके अनुसार, ब्रिक्स सम्मेलन के दौरान चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग का भारत आना दोनों देशों के संबंधों को स्थिर करने की दिशा में एक राजनीतिक संकेत के रूप में देखा जा सकता है। उन्होंने यह भी बताया कि वर्तमान में चीन दक्षिण चीन सागर और पूर्वी चीन सागर समेत कई मोर्चों पर अंतरराष्ट्रीय दबाव का सामना कर रहा है, इसलिए वह भारत के साथ तनाव को और बढ़ाना नहीं चाहता।
सहगल ने यह भी रेखांकित किया कि वर्ष 2020 के बाद भारत-चीन संबंधों की प्रकृति मौलिक रूप से बदल चुकी है। भारत की ओर से भी यह स्पष्ट किया जा चुका है कि दोनों देशों के संबंधों में वास्तविक सुधार तभी संभव है जब एलएसी पर शांति और स्थिरता बनी रहे।
चीन की सैन्य क्षमता और भौगोलिक लाभ
रिटायर्ड मेजर जनरल ने चीन की सैन्य और परिवहन क्षमता की विस्तार से चर्चा करते हुए कहा कि चीन को सीमा क्षेत्रों में बेहतर सड़क, रेल और संचार सुविधाओं का स्पष्ट लाभ मिलता है। उन्होंने बताया कि चीन अपनी आरक्षित सैन्य टुकड़ियों को अपेक्षाकृत कम समय में अग्रिम क्षेत्रों तक पहुँचाने की क्षमता रखता है, जबकि भारत को कठिन भौगोलिक परिस्थितियों के कारण सैन्य संरचनाओं की आवाजाही में अधिक समय लग सकता है।
उन्होंने चेताया कि यदि चीन भविष्य में अपनी कुछ टुकड़ियों को पीछे भी हटाता है, तो उसके पास बेहतर संचार और परिवहन नेटवर्क के कारण उन्हें दोबारा आगे तैनात करने की क्षमता बनी रहेगी। इसलिए भारत को अपनी सैन्य तैनाती, सीमा अवसंरचना और फोर्स मॉडर्नाइजेशन की गति किसी भी स्थिति में कम नहीं करनी चाहिए।
डिसइंगेजमेंट, डी-एस्केलेशन और डी-इंडक्शन — तीन अलग प्रक्रियाएँ
सहगल ने स्पष्ट किया कि कुछ क्षेत्रों में सैनिकों के पीछे हटने या डिसइंगेजमेंट की प्रक्रिया को पूर्ण सैन्य तनाव की समाप्ति नहीं माना जाना चाहिए। उन्होंने जोर देकर कहा कि डिसइंगेजमेंट, डी-एस्केलेशन और डी-इंडक्शन तीन अलग-अलग और क्रमिक प्रक्रियाएँ हैं, जिन्हें एक साथ नहीं देखा जाना चाहिए।
गलवान संघर्ष के बाद की परिस्थितियों का उल्लेख करते हुए सहगल ने कहा कि पिछले अनुभवों से यह सीख मिलती है कि सीमा पर किसी भी प्रकार की सुरक्षा ढील भविष्य में गंभीर चुनौती पैदा कर सकती है।
संवाद तंत्र और कॉन्फिडेंस बिल्डिंग उपाय
सहगल ने सीमा प्रबंधन और कॉन्फिडेंस बिल्डिंग मेजर्स के तहत हुई बातचीत को सकारात्मक कदम बताया। उन्होंने कहा कि विभिन्न सेक्टरों में नए हॉटलाइन और बैठक तंत्र स्थापित करने का उद्देश्य स्थानीय स्तर पर उत्पन्न होने वाले तनाव को समय रहते सुलझाना है, ताकि छोटी घटनाएँ बड़े सैन्य टकराव का रूप न ले सकें। कोर कमांडर स्तर की बातचीत और नए संचार माध्यम भविष्य में गलतफहमियाँ कम करने में सहायक हो सकते हैं।
हालाँकि उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि इन उपायों के बावजूद भारत को चीन की सीमा संबंधी नीतियों और दावों को लेकर सतर्क रहना होगा। उनके अनुसार, संवाद और सैन्य तैयारी — दोनों को साथ-साथ आगे बढ़ाने की आवश्यकता है।
ऑपरेशन सिंदूर और भविष्य की चुनौतियाँ
ऑपरेशन सिंदूर के संदर्भ में सहगल ने कहा कि इस अभियान के दौरान भारत ने अपनी खुफिया क्षमता, तकनीकी दक्षता और सेना, वायुसेना तथा नौसेना के बीच संयुक्त तैयारी का सफल प्रदर्शन किया। साथ ही उन्होंने माना कि ऐसे अभियानों में कुछ कमियाँ भी उजागर होती हैं, जिन्हें दूर करने के लिए भारतीय सशस्त्र बल लगातार आधुनिकीकरण पर काम कर रहे हैं।
उन्होंने कहा कि ड्रोन तकनीक, आधुनिक हथियार प्रणालियों और फोर्स मल्टीप्लायर्स को सैन्य ढाँचे में शामिल करने की दिशा में कदम उठाए जा रहे हैं। उनके अनुसार, यदि कभी एक से अधिक मोर्चों पर एक साथ सुरक्षा चुनौती उत्पन्न होती है, तो भारत की सैन्य तैयारियाँ पर्याप्त और आधुनिक होनी चाहिए — यही दीर्घकालिक रणनीतिक स्थिरता की कुंजी है।