प्रणब मुखर्जी और नंबर 13: भारत के 13वें राष्ट्रपति की जिंदगी का सबसे खास अंक
सारांश
मुख्य बातें
भारत के 13वें राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी की जीवन-यात्रा में नंबर 13 एक ऐसे धागे की तरह बुना रहा, जो उनके निजी जीवन से लेकर राजनीतिक शिखर तक हर पड़ाव पर प्रकट हुआ। संयोग हो या स्वभाव, इस अंक ने उनके करियर के कुछ सबसे निर्णायक क्षणों में अपनी उपस्थिति दर्ज कराई। 31 अगस्त 2020 को 84 वर्ष की आयु में उनके निधन के बाद भी यह किस्सा उनकी विरासत का अभिन्न हिस्सा बना हुआ है।
13 नंबर और प्रणब दा का अटूट नाता
जब प्रणब मुखर्जी सांसद के रूप में 13, तालकटोरा रोड के बंगले में रहने गए, तो कई शुभचिंतकों ने उन्हें आगाह किया कि यह नंबर अशुभ होता है। लेकिन उस दिन के बाद उनका राजनीतिक सफर लगातार ऊपर की ओर बढ़ता गया। बरसों तक बड़े सरकारी आवास के हकदार होने के बावजूद उन्होंने वह साधारण-सा घर छोड़ने से इनकार कर दिया। संसद भवन में भी उनका कार्यालय कमरा नंबर 13 था।
उनकी बेटी शर्मिष्ठा मुखर्जी ने एक साक्षात्कार में कहा था, 'मेरे पिता की जिंदगी में 13 नंबर का कुछ विशेष महत्व है। नंबर 13 उनके लिए एक लकी नंबर था। मेरे माता-पिता की सालगिराह 13 जुलाई को रही। उन्होंने राज्यसभा सदस्य के रूप में पहली बार 13 जुलाई को ही शपथ ली थी। तालकटोरा रोड पर वे 10 साल रहे।'
प्रणब मुखर्जी स्वयं इस विषय पर बेलाग बोलते थे। एक साक्षात्कार में उन्होंने कहा था, 'हिंदू शास्त्रों में नंबर 13 असल में शुभ माना जाता है, क्योंकि इसका मतलब त्रयोदशी होता है। अगर आप उस दिन कोई काम करते हैं तो उसके अच्छे और सकारात्मक नतीजे मिलते हैं।' वे अंधविश्वास में यकीन नहीं रखते थे — यह उनका स्पष्ट मत था।
बचपन की कठिनाइयाँ और संघर्ष के दिन
11 दिसंबर 1935 को पश्चिम बंगाल के बीरभूम जिले के छोटे-से गाँव मिराती में जन्मे प्रणब मुखर्जी का बचपन सहज नहीं था। 1940 से 1945 के बीच वे स्कूल नहीं गए और खेलने, पेड़ों पर चढ़ने तथा गायों के झुंड के पीछे भागने में व्यस्त रहे। 1946 में किरनाहर के शिबचंद्र हाई इंग्लिश स्कूल में उनका नाम पाँचवीं कक्षा में लिखवाया गया।
यह स्कूल घर से ढाई किलोमीटर दूर था, यानी प्रतिदिन पाँच किलोमीटर पैदल, वह भी नंगे पाँव। रास्ते में दोनों ओर गड्ढों वाली पगडंडी थी। बरसात के मौसम में जब इलाका कई फीट पानी में डूब जाता, तो वे निक्कर और जूते उतारकर गमछा पहन, पानी तैरकर पार करते और ऊँची जमीन पर आकर दोबारा वर्दी पहनते। 1973 में जब वे मंत्री बने, तब उन्होंने उसी पगडंडी को पक्का करवाया — इसका उल्लेख उन्होंने अपनी आत्मकथा में किया है।
पुलिस और 8 साल के प्रणब की चतुराई
प्रणब मुखर्जी के पिता स्वतंत्रता आंदोलन के सक्रिय सहभागी थे। एक बार पुलिस दल उनके घर का सामान जब्त करने पहुँचा, उस समय प्रणब मुखर्जी की उम्र महज 8 साल थी। परिवार को पहले से सूचना मिल जाने के कारण कीमती सामान, अनाज, पशु और दस्तावेज पड़ोसियों के यहाँ सुरक्षित भेज दिए गए थे।
जब सब-इंस्पेक्टर को जब्त करने के लिए कुछ नहीं मिला, तो उसने छोटे प्रणब से गायों के बारे में पूछा। बालक ने मासूमियत से जवाब दिया, 'गाय? उन्हें तो हम खा गए।' हैरान सब-इंस्पेक्टर ने कहा, 'तुम हिंदू हो और तुमने अपनी गाय खाई?' प्रणब ने सहज उत्तर दिया, 'दरअसल पिताजी बहुत समय से जेल में हैं, इसलिए हमने पेट भरने के लिए गाय बेच दीं।' यह किस्सा उनकी बचपन से ही मौजूद बौद्धिक चतुराई का प्रमाण है।
राजनीतिक जीवन और उपलब्धियाँ
कोलकाता विश्वविद्यालय से इतिहास, राजनीति विज्ञान और कानून में डिग्री हासिल करने के बाद प्रणब मुखर्जी ने अध्यापन और पत्रकारिता से करियर शुरू किया। पिता के राष्ट्रीय आंदोलन में योगदान से प्रेरित होकर वे सार्वजनिक जीवन में आए और 1969 में राज्यसभा के लिए चुने गए।
1973-75 में उद्योग, पोत-परिवहन, इस्पात और वित्त राज्य मंत्री के रूप में काम किया। 1982 में पहली बार वित्त मंत्री बने। 1980-85 तक राज्यसभा में सदन के नेता, 1991-96 तक योजना आयोग के उपाध्यक्ष, 1993-95 तक वाणिज्य मंत्री, 1995-96 और 2006-09 तक विदेश मंत्री, 2004-06 तक रक्षा मंत्री और 2009-12 तक फिर वित्त मंत्री रहे। 2004-12 तक वे लोकसभा में सदन के नेता भी रहे।
25 जुलाई 2012 को उन्होंने भारत के 13वें राष्ट्रपति के रूप में पदभार संभाला और पाँच वर्ष का कार्यकाल पूरा किया। उन्हें 1997 में सर्वश्रेष्ठ सांसद, 2008 में पद्म विभूषण और 2019 में देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न से नवाजा गया।
विरासत और स्मृति
प्रणब मुखर्जी एक अगाध पुस्तक-प्रेमी थे और उन्होंने भारतीय अर्थव्यवस्था तथा राष्ट्र-निर्माण पर अनेक पुस्तकें लिखीं। राष्ट्रपति के रूप में उन्होंने राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मामलों पर विद्वतापूर्ण दृष्टिकोण से इस पद की गरिमा को नई ऊँचाई दी। 31 अगस्त 2020 को 84 वर्ष की आयु में उनका निधन हुआ। उनकी जीवन-कहानी — मिराती के एक छोटे गाँव से राष्ट्रपति भवन तक — आज भी प्रेरणा का अक्षय स्रोत है।