पुणे-मुंबई मिसिंग लिंक पर यातायात बहाल, CM फडणवीस ने एक्स पर दी जानकारी; भूस्खलन के बाद सुरक्षा जाँच पूरी
सारांश
मुख्य बातें
महाराष्ट्र राज्य सड़क विकास निगम (एमएसआरडीसी) ने 6 जुलाई 2026 की देर रात घोषणा की कि मुंबई-पुणे एक्सप्रेसवे के मिसिंग लिंक कॉरिडोर पर वाहनों की आवाजाही फिर से बहाल कर दी गई है। व्यापक सुरक्षा एवं तकनीकी जाँच पूरी होने के बाद यह निर्णय लिया गया। इससे पहले उसी दिन तड़के करीब 3:30 बजे हुए भूस्खलन के कारण मार्ग को बंद करना पड़ा था।
मुख्य घटनाक्रम
6 जुलाई को तड़के हुई मूसलाधार बारिश के चलते पहाड़ी ढलान से विशाल चट्टानें गिरीं और मलबा पुणे से मुंबई की ओर जाने वाले मिसिंग लिंक कॉरिडोर की पहली सुरंग के निकास द्वार पर आ गिरा। इससे सुरक्षात्मक रिटेनिंग वॉल क्षतिग्रस्त हो गई और मार्ग को तत्काल यातायात के लिए असुरक्षित घोषित करना पड़ा। एमएसआरडीसी के अनुसार, गिरी हुई चट्टानें जमीन से करीब 150 मीटर की ऊँचाई से आई थीं।
सुरक्षा कार्य और तकनीकी निरीक्षण
एमएसआरडीसी की टीमों ने भारी बारिश, तेज हवाओं और कम दृश्यता के बावजूद लगातार काम करते हुए विशेष उपकरणों से मलबा हटाया। तकनीकी विशेषज्ञों ने टनल-2 और उससे सटी पहाड़ी ढलान का विस्तृत निरीक्षण किया, ताकि कोई ढीला पत्थर या मलबा यात्रियों के लिए खतरा न बने। निगम ने बताया कि ड्रोन सर्वेक्षण का भी प्रयास किया गया, लेकिन घने कोहरे और प्रतिकूल मौसम के कारण हवाई सर्वेक्षण सीमित रहा।
मुख्यमंत्री की अपील
मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने सोशल मीडिया मंच एक्स पर लिखा, 'कनेक्टिंग लिंक पर यातायात फिर से शुरू हो गया है। वाहनों की आवाजाही बहाल कर दी गई है। सरकार अपनी ओर से पूरी कोशिश कर रही है। सभी लोग सुरक्षित रहें।' एमएसआरडीसी ने भी यात्रियों से अपील की है कि मानसून के दौरान अनावश्यक यात्रा से बचें और प्रशासन द्वारा जारी यातायात सलाह का पालन करें।
निर्माण एजेंसी का पक्ष और सुरक्षा उपाय
एमएसआरडीसी ने इस घटना को प्राकृतिक आपदा (एक्ट ऑफ गॉड) करार दिया। निगम के एक अधिकारी ने बताया कि स्थल पर आईआईटी बॉम्बे से प्रमाणित रॉकफॉल रोकथाम प्रणाली पहले से लगाई गई थी — सुरंग के ऊपर पहाड़ी ढलान पर 15 मीटर तक की ऊँचाई पर रॉक बोल्टिंग और लोहे की जाली, जो अब भी सुरक्षित है। अधिकारी के अनुसार, ठेकेदार की कोई गलती नहीं है और यह पूरी तरह प्राकृतिक कारणों से हुई घटना है। गौरतलब है कि जो चट्टानें गिरीं, वे इस सुरक्षा जाली की परिधि से बाहर, 150 मीटर की ऊँचाई से आई थीं।
आगे क्या होगा
अधिकारियों ने बताया कि बारिश कम होने के बाद विशेषज्ञ चट्टानों का निरीक्षण करेंगे और यह मूल्यांकन करेंगे कि सुरक्षा जाली को पहाड़ी पर और ऊपर तक बढ़ाया जा सकता है या नहीं। हालाँकि, यह एक महँगी प्रक्रिया होगी और इसके लिए वन विभाग की भूमि के उपयोग की भी आवश्यकता पड़ सकती है। यह ऐसे समय में आया है जब मानसून सीज़न में मुंबई-पुणे मार्ग पर भूस्खलन की घटनाएँ पहले भी सामने आ चुकी हैं, जो इस कॉरिडोर की दीर्घकालिक भूवैज्ञानिक चुनौतियों को रेखांकित करती हैं।