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पंजाब में EWS कोटा उल्लंघन: सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार को नोटिस जारी किया, 15 वर्षों से शून्य प्रवेश का आरोप

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पंजाब में EWS कोटा उल्लंघन: सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार को नोटिस जारी किया, 15 वर्षों से शून्य प्रवेश का आरोप

सारांश

पंजाब के निजी स्कूलों में EWS कोटे की 15 साल से अनदेखी — सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार को नोटिस थमाया। RTI डेटा बताता है कि हजारों वंचित बच्चे संविधान-प्रदत्त मुफ्त शिक्षा से महरूम रहे। अगली सुनवाई 17 अगस्त को।

मुख्य बातें

सर्वोच्च न्यायालय ने पंजाब सरकार को RTE अधिनियम की धारा 12(1)(सी) के तहत EWS कोटा न लागू करने की PIL पर नोटिस जारी किया।
याचिका के अनुसार कम से कम 50,000 छात्रों को EWS कोटे के तहत प्रवेश मिलना चाहिए था; कुछ स्कूलों ने 15 वर्षों में एक भी दाखिला नहीं दिया।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति वी.
मोहना की पीठ ने याचिकाकर्ता को मान्यता प्राप्त निजी स्कूलों और वास्तविक प्रवेश का व्यापक अध्ययन करने का निर्देश दिया।
पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय के 2025 के निर्देशों और अवमानना कार्रवाई के बावजूद प्रभावी अनुपालन नहीं हुआ।
याचिका में केंद्र सरकार से अनुच्छेद 256 और 355 के तहत हस्तक्षेप और पारदर्शी निगरानी तंत्र की माँग की गई है।
मामले की अगली सुनवाई 17 अगस्त को होगी।

सर्वोच्च न्यायालय ने 16 जून 2025 को पंजाब सरकार को एक जनहित याचिका पर नोटिस जारी किया, जिसमें आरोप लगाया गया है कि राज्य के निजी स्कूलों में बाल शिक्षा का अधिकार (RTE) अधिनियम, 2009 की धारा 12(1)(सी) के तहत आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS) कोटा को लगभग डेढ़ दशक से लागू नहीं किया जा रहा। याचिका में दावा है कि इस चूक ने हजारों वंचित बच्चों के संविधान-प्रदत्त शिक्षा के मौलिक अधिकार को व्यवहार में निरर्थक बना दिया है।

मामले की पृष्ठभूमि

केएस राजू लीगल ट्रस्ट ने अपने प्रतिनिधि डॉ. जगमोहन सिंह राजू के माध्यम से यह जनहित याचिका दायर की। याचिका पर भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति वी. मोहना की खंडपीठ ने सुनवाई की और राज्य सरकार को नोटिस जारी करने का आदेश पारित किया। मामले की अगली सुनवाई 17 अगस्त को निर्धारित की गई है।

गौरतलब है कि RTE अधिनियम वर्ष 2009 में लागू हुआ था और इसकी धारा 12(1)(सी) के अंतर्गत प्रत्येक निजी गैर-सहायता प्राप्त गैर-अल्पसंख्यक स्कूल को प्रवेश स्तर पर EWS और वंचित समूहों के बच्चों के लिए कम से कम 25 प्रतिशत सीटें आरक्षित करना अनिवार्य है।

याचिकाकर्ता के मुख्य आरोप

याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि EWS कोटे के तहत पंजाब में कम से कम 50,000 छात्रों को प्रवेश मिलना चाहिए था। किंतु सूचना के अधिकार (RTI) अधिनियम के माध्यम से प्राप्त जानकारी के अनुसार, कुछ स्कूलों ने लगभग 15 वर्षों में इस कोटे के तहत एक भी बच्चे को प्रवेश नहीं दिया।

याचिका में यह भी कहा गया कि पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय ने 2025 में निर्देश जारी किए थे और अवमानना कार्रवाई भी हुई, फिर भी प्रभावी अनुपालन सुनिश्चित नहीं हो सका। उच्च न्यायालय ने स्वयं राज्य सरकार के रवैये को 'लापरवाह' बताया था और न्यायिक निर्देशों की जानबूझकर अवज्ञा के प्रथम दृष्टया निष्कर्ष दर्ज किए थे।

सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी और निर्देश

सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने सरकार के प्रति-हलफनामे का उल्लेख करते हुए कहा कि उसमें निजी स्कूलों में EWS श्रेणी के तहत प्रवेश की पुष्टि की गई है। हालाँकि, याचिकाकर्ता ने RTI से प्राप्त आँकड़ों के आधार पर इस दावे को चुनौती दी।

खंडपीठ ने याचिकाकर्ता को निर्देश दिया कि वे एक व्यापक अध्ययन करें — मान्यता प्राप्त निजी स्कूलों की कुल संख्या, EWS कोटे के तहत वास्तविक प्रवेश और प्रवेश देने से इनकार करने वाले स्कूलों का विवरण एकत्र करें। न्यायालय ने कहा, 'RTI को बुद्धिमानी से तैयार किया जाना चाहिए — देखें कि कितने निजी स्कूल मान्यता प्राप्त हैं और कितने प्रवेश हुए हैं।'

संवैधानिक आधार और माँगें

याचिका में संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत हस्तक्षेप की माँग करते हुए केंद्र सरकार को निर्देश देने की प्रार्थना की गई है कि वह अनुच्छेद 256 और 355 के अंतर्गत अपने संवैधानिक अधिकार का प्रयोग कर पंजाब में RTE प्रावधानों का पालन सुनिश्चित कराए।

याचिका में यह भी तर्क दिया गया कि धारा 12(1)(सी) के तहत प्रवेश से इनकार 'अपरिवर्तनीय क्षति' का कारण बनता है, क्योंकि यह अधिकार केवल प्रवेश-स्तर के दाखिले तक सीमित है — निर्धारित आयु पार हो जाने के बाद बच्चा इस लाभ का दावा नहीं कर सकता।

आगे क्या होगा

सर्वोच्च न्यायालय ने पारदर्शी और समयबद्ध निगरानी तंत्र की माँग पर भी गौर किया, जिसमें सार्वजनिक डैशबोर्ड, उपलब्ध सीटों का प्रकाशन, स्कूलों के लिए प्रतिपूर्ति ढाँचा और अनुपालन न करने वाले स्कूलों के विरुद्ध प्रवर्तनीय उपाय शामिल हैं। 17 अगस्त की सुनवाई में पंजाब सरकार का जवाब और याचिकाकर्ता का अद्यतन अध्ययन निर्णायक भूमिका निभाएगा।

संपादकीय दृष्टिकोण

उच्च न्यायालय के निर्देश और अवमानना कार्रवाई के बाद भी यदि स्कूल शून्य प्रवेश देते रहे, तो यह स्पष्ट करता है कि प्रवर्तन तंत्र मूलतः निष्प्रभावी है। सर्वोच्च न्यायालय का हस्तक्षेप स्वागत योग्य है, परंतु असली परीक्षा यह है कि क्या इस बार न्यायिक निगरानी में मापन-योग्य अनुपालन सुनिश्चित होगा — या यह भी पूर्व के आदेशों की तरह कागज़ों तक सीमित रह जाएगा।
RashtraPress
1 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

सुप्रीम कोर्ट ने पंजाब सरकार को किस मामले में नोटिस जारी किया?
सर्वोच्च न्यायालय ने पंजाब सरकार को उस जनहित याचिका पर नोटिस जारी किया जिसमें आरोप है कि राज्य के निजी स्कूल RTE अधिनियम की धारा 12(1)(सी) के तहत EWS और वंचित समूहों के बच्चों को 25% सीटें देने से इनकार कर रहे हैं। RTI डेटा के अनुसार कुछ स्कूलों ने 15 वर्षों में एक भी EWS दाखिला नहीं दिया।
RTE अधिनियम की धारा 12(1)(सी) क्या कहती है?
यह धारा प्रत्येक निजी गैर-सहायता प्राप्त गैर-अल्पसंख्यक स्कूल को प्रवेश स्तर पर EWS और वंचित समूहों के बच्चों के लिए कम से कम 25 प्रतिशत सीटें आरक्षित करने के लिए बाध्य करती है। यह प्रावधान वर्ष 2009 से लागू है और संविधान के अनुच्छेद 21ए के तहत शिक्षा के मौलिक अधिकार को मूर्त रूप देता है।
याचिकाकर्ता ने कितने बच्चों को प्रवेश न मिलने का दावा किया है?
याचिकाकर्ता केएस राजू लीगल ट्रस्ट के अनुसार पंजाब में EWS कोटे के तहत कम से कम 50,000 छात्रों को प्रवेश मिलना चाहिए था। RTI के माध्यम से प्राप्त जानकारी बताती है कि कुछ स्कूलों ने लगभग 15 वर्षों में इस श्रेणी में एक भी बच्चे को दाखिला नहीं दिया।
सुप्रीम कोर्ट ने याचिकाकर्ता को क्या करने का निर्देश दिया?
खंडपीठ ने याचिकाकर्ता को निर्देश दिया कि वे पंजाब के मान्यता प्राप्त निजी स्कूलों की कुल संख्या, EWS कोटे के तहत वास्तविक प्रवेश और प्रवेश देने से इनकार करने वाले स्कूलों का व्यापक अध्ययन कर आँकड़े प्रस्तुत करें। अगली सुनवाई 17 अगस्त को होगी।
क्या पहले भी इस मामले में कोई न्यायिक कार्रवाई हुई थी?
हाँ, पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय ने 2025 में निर्देश जारी किए थे और अवमानना कार्रवाई भी हुई थी। उच्च न्यायालय ने राज्य सरकार के रवैये को 'लापरवाह' बताया और न्यायिक निर्देशों की जानबूझकर अवज्ञा के प्रथम दृष्टया निष्कर्ष दर्ज किए थे, फिर भी प्रभावी अनुपालन सुनिश्चित नहीं हो सका।
राष्ट्र प्रेस
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