16 जुलाई 2026
LIVE
Get it on Google Play Download on the App Store

पुरुषोत्तम मास 2026: भुवनेश्वर के अनंत वासुदेव मंदिर में वासुदेव, बलराम व सुभद्रा के दर्शन और महाप्रसाद की अनूठी परंपरा

शेयर करें:
ऑडियो वॉइस लोड हो रही है…
पुरुषोत्तम मास 2026: भुवनेश्वर के अनंत वासुदेव मंदिर में वासुदेव, बलराम व सुभद्रा के दर्शन और महाप्रसाद की अनूठी परंपरा

सारांश

पुरुषोत्तम मास में भुवनेश्वर का अनंत वासुदेव मंदिर विशेष महत्व रखता है — यहाँ वासुदेव, बलराम और सुभद्रा एक ही गर्भगृह में विराजमान हैं। 13वीं सदी में रानी चंद्रिका देवी द्वारा निर्मित यह कलिंग-शैली का मंदिर अपनी महाप्रसाद 'अभाड़ा' परंपरा के लिए भी प्रसिद्ध है।

मुख्य बातें

अनंत वासुदेव मंदिर , भुवनेश्वर में वासुदेव (कृष्ण) , बलराम और सुभद्रा एक ही गर्भगृह में विराजमान हैं।
मंदिर का निर्माण 13वीं शताब्दी में पूर्वी गंग वंश की रानी चंद्रिका देवी ने करवाया था।
मंदिर कलिंग स्थापत्य शैली का उदाहरण है और बिंदु सरोवर झील के तट पर स्थित है।
यहाँ का महाप्रसाद 'अभाड़ा' मिट्टी के बर्तनों और चूल्हों पर पारंपरिक विधि से तैयार होता है।
पुरुषोत्तम मास में मंदिर में विशेष पूजा-अर्चना होती है और महाप्रसाद की माँग बढ़ जाती है।
17वीं शताब्दी में मराठा शासनकाल के दौरान मंदिर का जीर्णोद्धार किया गया था।

भुवनेश्वर के हृदय में स्थित अनंत वासुदेव मंदिर इस पुरुषोत्तम मास में श्रद्धालुओं की विशेष आस्था का केंद्र बना हुआ है। यह ओडिशा का एकमात्र ऐसा प्रमुख मंदिर है जहाँ भगवान वासुदेव (कृष्ण) के साथ उनके अग्रज बलराम और अनुजा सुभद्रा एक ही गर्भगृह में विराजमान हैं। पुरुषोत्तम मास में भगवान विष्णु की उपासना का जो विशेष महत्व शास्त्रों में वर्णित है, वह इस मंदिर में आकर साकार होता प्रतीत होता है।

मंदिर का इतिहास और वास्तुकला

13वीं शताब्दी में पूर्वी गंग वंश की रानी चंद्रिका देवी ने इस मंदिर का निर्माण करवाया था। बिंदु सरोवर झील के शांत तट पर स्थित यह मंदिर कलिंग स्थापत्य शैली का उत्कृष्ट उदाहरण है। मंदिर का ऊँचा गोपुरम विविध देवी-देवताओं की सूक्ष्म नक्काशी से अलंकृत है, जबकि शिखर और दीवारें वैष्णव परंपरा की कथाओं को पत्थर में उकेरती हैं।

मंदिर की संरचना चार प्रमुख खंडों में विभाजित है — गर्भगृह, जगमोहन, भोगमंडप और नाटमंदिर। यह मंदिर अपने क्रॉस आकार के चबूतरे के लिए भी विशेष पहचान रखता है, जो ओडिशा के मंदिर-स्थापत्य में दुर्लभ माना जाता है। 17वीं शताब्दी में मराठा शासनकाल के दौरान मंदिर का जीर्णोद्धार कराया गया था।

गर्भगृह में विराजित त्रिदेव

मंदिर के गर्भगृह में काले ग्रेनाइट पत्थर से निर्मित तीन मूर्तियाँ प्रतिष्ठित हैं। मध्य में भगवान कृष्ण (वासुदेव) शंख, चक्र और गदा धारण किए विराजमान हैं। उनके बाईं ओर भगवान बलराम सप्त-फण वाले नाग की छाया में खड़े हैं, जबकि दाईं ओर देवी सुभद्रा कमल और कलश लिए उपस्थित हैं। इन तीनों की एक साथ उपस्थिति मंदिर को पुरी के जगन्नाथ मंदिर से जोड़ने वाली वैष्णव परंपरा का प्रतिबिंब है, और भक्तों को परिवार-स्वरूप में भगवान के दर्शन का दुर्लभ अवसर देती है।

महाप्रसाद की अनूठी परंपरा

अनंत वासुदेव मंदिर की सबसे विशिष्ट पहचान यहाँ का महाप्रसाद है, जिसे स्थानीय भाषा में 'अभाड़ा' भी कहते हैं। यह प्रसाद मिट्टी के बर्तनों और मिट्टी के चूल्हों पर पूर्णतः पारंपरिक विधि से तैयार किया जाता है। देवताओं को अर्पण के पश्चात इसे भोग बाजार में श्रद्धालुओं को वितरित किया जाता है। मान्यता है कि यह प्रसाद शरीर और आत्मा दोनों को तृप्ति प्रदान करता है। पुरुषोत्तम मास के दौरान इस प्रसाद की माँग सामान्य दिनों की तुलना में उल्लेखनीय रूप से बढ़ जाती है।

पुरुषोत्तम मास और जन्माष्टमी उत्सव

पुरुषोत्तम मास में मंदिर परिसर में विशेष पूजा-अर्चना और धार्मिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। जन्माष्टमी के अवसर पर मंदिर फूलों, दीपों और भक्ति-संगीत से सजाया जाता है। भक्त भगवान कृष्ण को दूध, मक्खन, फल और मिठाइयाँ अर्पित करते हैं। यह ऐसे समय में और भी महत्वपूर्ण हो जाता है जब पुरुषोत्तम मास की पावनता श्रद्धालुओं को विशेष पुण्य-लाभ की ओर प्रेरित करती है।

आसपास के दर्शनीय स्थल

अनंत वासुदेव मंदिर के निकट ही लिंगराज मंदिर स्थित है, जो भगवान शिव को समर्पित भुवनेश्वर का सबसे प्रतिष्ठित मंदिर है। बीजू पटनायक पार्क में बिंदु सरोवर झील के किनारे भ्रमण और नौकायन का आनंद लिया जा सकता है। वन्यजीव प्रेमियों के लिए नंदनकानन चिड़ियाघर में सफेद बाघ सहित अनेक दुर्लभ प्रजातियाँ देखने को मिलती हैं। ट्राइबल रिसर्च इंस्टीट्यूट म्यूजियम ओडिशा की आदिवासी संस्कृति और विरासत से परिचय कराता है। इस प्रकार अनंत वासुदेव मंदिर की यात्रा आस्था, इतिहास और प्रकृति का एक समग्र अनुभव बन जाती है।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन यह मंदिर वास्तव में ओडिशा की वैष्णव और जगन्नाथ परंपरा के बीच की कड़ी है — जहाँ वासुदेव, बलराम और सुभद्रा की त्रयी पुरी के जगन्नाथ मंदिर की प्रतिध्वनि करती है। महाप्रसाद 'अभाड़ा' की मिट्टी-चूल्हा परंपरा उस समय और प्रासंगिक हो जाती है जब आधुनिकीकरण के दबाव में अनेक मंदिरों की पारंपरिक रसोई-विधियाँ लुप्त हो रही हैं। पुरुषोत्तम मास में इस मंदिर की ओर बढ़ती श्रद्धालु-संख्या यह भी बताती है कि धार्मिक पर्यटन के लिए ओडिशा की क्षमता अभी पूरी तरह रेखांकित नहीं हुई है।
RashtraPress
16 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

अनंत वासुदेव मंदिर भुवनेश्वर में क्या विशेष है?
यह ओडिशा का एक प्रमुख मंदिर है जहाँ भगवान वासुदेव (कृष्ण), बलराम और सुभद्रा एक ही गर्भगृह में काले ग्रेनाइट की मूर्तियों के रूप में विराजमान हैं। इसके अतिरिक्त यहाँ की महाप्रसाद 'अभाड़ा' परंपरा और कलिंग स्थापत्य शैली इसे विशिष्ट बनाती है।
अनंत वासुदेव मंदिर का निर्माण किसने और कब करवाया था?
इस मंदिर का निर्माण 13वीं शताब्दी में पूर्वी गंग वंश की रानी चंद्रिका देवी ने करवाया था। 17वीं शताब्दी में मराठा शासनकाल के दौरान इसका जीर्णोद्धार भी किया गया।
महाप्रसाद 'अभाड़ा' क्या है और इसे कैसे तैयार किया जाता है?
महाप्रसाद 'अभाड़ा' अनंत वासुदेव मंदिर का पारंपरिक भोग-प्रसाद है, जो मिट्टी के बर्तनों और मिट्टी के चूल्हों पर पारंपरिक विधि से तैयार किया जाता है। देवताओं को अर्पण के बाद यह प्रसाद भोग बाजार में भक्तों को वितरित किया जाता है।
पुरुषोत्तम मास में अनंत वासुदेव मंदिर का क्या महत्व है?
पुरुषोत्तम मास भगवान विष्णु की आराधना के लिए विशेष रूप से पावन माना जाता है। इस मास में अनंत वासुदेव मंदिर में विशेष पूजा-अर्चना और धार्मिक कार्यक्रम आयोजित होते हैं तथा महाप्रसाद की माँग सामान्य दिनों की तुलना में उल्लेखनीय रूप से बढ़ जाती है।
अनंत वासुदेव मंदिर के आसपास कौन-से दर्शनीय स्थल हैं?
मंदिर के निकट प्रसिद्ध लिंगराज मंदिर, बीजू पटनायक पार्क (बिंदु सरोवर झील), नंदनकानन चिड़ियाघर और ट्राइबल रिसर्च इंस्टीट्यूट म्यूजियम स्थित हैं। ये स्थल धार्मिक, प्राकृतिक और सांस्कृतिक — तीनों दृष्टियों से दर्शनीय हैं।
राष्ट्र प्रेस
सिलसिला

जुड़े बिंदु

इस ख़बर के पीछे की कड़ियाँ — सबसे नई पहले।

8 बिंदु
  1. नवीनतम 1 महीना पहले
  2. 1 महीना पहले
  3. 1 महीना पहले
  4. 1 महीना पहले
    पुरुषोत्तम मास 2026: जयपुर का गोविंद देव जी मंदिर — 'वृंदावन ठाकुर' के सप्त मंदिरों में विशेष स्थान, श्रीकृष्ण के प्रपौत्र वज्रनाभ ने बनाई थी मूर्ति
  5. 1 महीना पहले
  6. 1 महीना पहले
  7. 6 महीने पहले
  8. 8 महीने पहले