13 जुलाई 2026
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पुरुषोत्तम मास 2026: जयपुर का गोविंद देव जी मंदिर — 'वृंदावन ठाकुर' के सप्त मंदिरों में विशेष स्थान, श्रीकृष्ण के प्रपौत्र वज्रनाभ ने बनाई थी मूर्ति

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पुरुषोत्तम मास 2026: जयपुर का गोविंद देव जी मंदिर — 'वृंदावन ठाकुर' के सप्त मंदिरों में विशेष स्थान, श्रीकृष्ण के प्रपौत्र वज्रनाभ ने बनाई थी मूर्ति

सारांश

पुरुषोत्तम मास में जयपुर के गोविंद देव जी मंदिर की महिमा अपरंपार है। 'वृंदावन ठाकुर' के सात प्रमुख मंदिरों में शुमार इस मंदिर में स्थापित 'बज्रकृत' प्रतिमा को श्रीकृष्ण के प्रपौत्र वज्रनाभ ने मात्र 13 वर्ष की आयु में बनाया था — यही इसे देश के अन्य मंदिरों से अलग और अद्वितीय बनाता है।

मुख्य बातें

गोविंद देव जी मंदिर जयपुर के सिटी पैलेस परिसर में स्थित है और 'वृंदावन ठाकुर' के सात प्रमुख मंदिरों में से एक है।
मंदिर का निर्माण सन् 1735 में महाराजा सवाई जय सिंह द्वितीय ने कराया था।
यहाँ की 'बज्रकृत' प्रतिमा का निर्माण श्रीकृष्ण के प्रपौत्र वज्रनाभ ने 13 वर्ष की आयु में किया था।
मंदिर में प्रतिदिन 7 बार पूजा-अर्चना और आरती होती है।
मंदिर की छत सोने की परत से ढकी है और भीतर भारतीय कला के सुंदर भित्तिचित्र हैं।
जयपुर जंक्शन से मंदिर की दूरी लगभग 5 किलोमीटर है।

पवित्र पुरुषोत्तम मास के दौरान जयपुर स्थित गोविंद देव जी मंदिर की आध्यात्मिक महत्ता और भी बढ़ जाती है। यह मंदिर 'वृंदावन ठाकुर' के सात प्रमुख मंदिरों में से एक माना जाता है और कछवाहा राजवंश के कुल देवता भगवान श्रीकृष्ण के गोविंद रूप की आराधना का सर्वोच्च केंद्र है। सनातन धर्म में पुरुषोत्तम मास को नारायण की विशेष कृपा का समय माना जाता है, जिसमें दर्शन, पूजन और दान का असाधारण महत्व है।

मंदिर का इतिहास और स्थापना

जयपुर के सिटी पैलेस परिसर में बादल महल और चंद्र महल के मध्य स्थित इस भव्य मंदिर का निर्माण सन् 1735 में आमेर के कछवाहा राजवंश के महाराजा सवाई जय सिंह द्वितीय ने कराया था। महाराजा ने इस पवित्र प्रतिमा को वृंदावन से जयपुर लाकर यहाँ विधिवत स्थापित किया। गौरतलब है कि यह मंदिर न केवल धार्मिक आस्था का केंद्र है, बल्कि राजपूत स्थापत्य कला का एक अनुपम उदाहरण भी है।

वज्रनाभ द्वारा निर्मित 'बज्रकृत' प्रतिमा

मंदिर की सबसे विशिष्ट और रहस्यमयी विशेषता यहाँ स्थापित गोविंद देव जी की रंगीन प्रतिमा है, जिसे 'बज्रकृत' कहा जाता है। मान्यता के अनुसार इस प्रतिमा का निर्माण भगवान श्रीकृष्ण के प्रपौत्र वज्रनाभ ने मात्र 13 वर्ष की अल्पायु में अपनी दादी के निर्देशन पर किया था। इस दिव्य प्रतिमा की पौराणिक उत्पत्ति ही इस मंदिर को शेष तीर्थस्थलों से अलग और अत्यंत विशिष्ट बनाती है। यह ऐसे समय में और भी प्रासंगिक हो जाता है जब पुरुषोत्तम मास में भक्त विशेष पुण्यलाभ की कामना से यहाँ उमड़ते हैं।

पूजा-अर्चना और उत्सव परंपरा

मंदिर में प्रतिदिन सात बार पूजा-अर्चना और आरती का आयोजन होता है। पुरुषोत्तम मास, श्रीकृष्ण जन्माष्टमी, अनंत चतुर्दशी, पूर्णिमा और अन्य विशेष तिथियों पर भक्तों की संख्या कई गुना बढ़ जाती है। जन्माष्टमी के अवसर पर विशेष सजावट, भजन-कीर्तन और उत्सव के साथ भगवान का जन्मोत्सव धूमधाम से मनाया जाता है। देशभर से श्रद्धालु गोविंद देव जी के दर्शन और आशीर्वाद प्राप्ति के लिए यहाँ आते हैं।

स्थापत्य कला और सौंदर्य

मंदिर की सोने की परत से ढकी छत इसे दूर से ही भव्य और दीप्तिमान बनाती है। भीतर नक्काशीदार झाड़फानूस और दीवारों पर भारतीय कला को प्रदर्शित करने वाले सुंदर भित्तिचित्र और चित्रकारी मंदिर को एक अद्वितीय सांस्कृतिक धरोहर का दर्जा देते हैं। चारों ओर सुंदर बगीचे और शांत वातावरण भक्तों को आध्यात्मिक ऊर्जा और मानसिक शांति प्रदान करते हैं। जयपुर आने वाले पर्यटक सिटी पैलेस के साथ-साथ इस मंदिर को अपनी यात्रा सूची में अवश्य शामिल करते हैं।

कैसे पहुँचें गोविंद देव जी मंदिर

मंदिर तक पहुँचना सुगम है। कार से आने वाले श्रद्धालु एलिवेटेड अजमेर रोड या जयपुर रोड के माध्यम से आ सकते हैं। बस यात्री सिंधी कैंप बस स्टैंड तक पहुँचकर वहाँ से टैक्सी या ऑटो से मंदिर आ सकते हैं — बस स्टैंड से मंदिर की दूरी लगभग 4 किलोमीटर है। ट्रेन से आने वाले यात्रियों के लिए जयपुर जंक्शन निकटतम रेलवे स्टेशन है, जो मंदिर से करीब 5 किलोमीटर दूर है। पुरुषोत्तम मास के इस पावन काल में गोविंद देव जी के दर्शन कर भक्त विशेष आध्यात्मिक लाभ प्राप्त करते हैं।

संपादकीय दृष्टिकोण

बल्कि उस पौराणिक दावे में है जो इसे वृंदावन के मूल तीर्थों से जोड़ता है — वज्रनाभ द्वारा निर्मित 'बज्रकृत' प्रतिमा की कथा इसे एक जीवंत धार्मिक विरासत बनाती है। पुरुषोत्तम मास जैसे अवसर इन मंदिरों को न केवल आस्था का केंद्र, बल्कि धार्मिक पर्यटन की धुरी भी बनाते हैं। यह उल्लेखनीय है कि राजस्थान में धार्मिक पर्यटन का विस्तार हो रहा है, लेकिन इन ऐतिहासिक मंदिरों के संरक्षण और आगंतुक प्रबंधन पर गंभीर ध्यान देने की आवश्यकता है।
RashtraPress
13 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

गोविंद देव जी मंदिर जयपुर में कहाँ स्थित है?
गोविंद देव जी मंदिर जयपुर के सिटी पैलेस परिसर में बादल महल और चंद्र महल के बीच स्थित है। यह जयपुर जंक्शन से लगभग 5 किलोमीटर की दूरी पर है।
गोविंद देव जी मंदिर का निर्माण किसने और कब कराया?
इस मंदिर का निर्माण सन् 1735 में आमेर के कछवाहा राजवंश के महाराजा सवाई जय सिंह द्वितीय ने कराया था। उन्होंने वृंदावन से इस पवित्र प्रतिमा को जयपुर लाकर यहाँ स्थापित किया।
गोविंद देव जी की प्रतिमा को 'बज्रकृत' क्यों कहा जाता है?
मान्यता है कि इस प्रतिमा का निर्माण भगवान श्रीकृष्ण के प्रपौत्र वज्रनाभ ने मात्र 13 वर्ष की आयु में अपनी दादी के निर्देश पर किया था, इसीलिए इसे 'बज्रकृत' कहा जाता है। यह पौराणिक उत्पत्ति इस प्रतिमा को विशेष धार्मिक महत्व देती है।
पुरुषोत्तम मास में गोविंद देव जी मंदिर का क्या विशेष महत्व है?
पुरुषोत्तम मास में नारायण और उनके विभिन्न रूपों के दर्शन, पूजन और दान का विशेष महत्व माना जाता है। इस दौरान गोविंद देव जी मंदिर में दर्शन कर भक्त विशेष पुण्यलाभ प्राप्त करते हैं और देशभर से श्रद्धालुओं की संख्या बढ़ जाती है।
'वृंदावन ठाकुर' के सात प्रमुख मंदिरों में कौन-कौन से मंदिर शामिल हैं?
'वृंदावन ठाकुर' के सात प्रमुख मंदिरों में गोविंद देव जी मंदिर के अलावा श्री राधा वल्लभ जी और श्री बांके बिहारी जी जैसे प्रसिद्ध मंदिर भी शामिल हैं। ये सभी मंदिर भक्ति, इतिहास और वास्तुकला की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।
राष्ट्र प्रेस
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