पुरुषोत्तम मास 2026: मदुरै का कूडल अझगर मंदिर, जिसके अष्टांग विमान की परछाईं जमीन पर नहीं पड़ती
सारांश
मुख्य बातें
पुरुषोत्तम मास के पावन अवसर पर मदुरै स्थित कूडल अझगर मंदिर की विशेष महिमा है — यह दक्षिण भारत का वह अनोखा नारायण मंदिर है जिसके अष्टांग विमान (आठ हिस्सों वाले शिखर) की परछाईं दोपहर के समय भी जमीन पर नहीं पड़ती। धार्मिक मान्यता के अनुसार पुरुषोत्तम मास में किए गए दर्शन-पूजन का फल सामान्य दिनों की तुलना में कई गुना अधिक मिलता है।
मंदिर की अद्भुत वास्तुकला
यह मंदिर अपने अष्टांग विमान के कारण वास्तुशिल्प का एक अनूठा उदाहरण है। मान्यता है कि इस शिखर की परछाईं दोपहर के वक्त भी धरती को नहीं छूती, जो हज़ारों श्रद्धालुओं और पर्यटकों को विस्मित करती है। मंदिर ग्रेनाइट की ऊँची दीवारों से घिरा है और प्रवेश द्वार पर पाँच मंजिला राजगोपुरम है, जिस पर दशावतार, लक्ष्मी-नारायण, लक्ष्मी-नरसिंह और अन्य देवी-देवताओं की सूक्ष्म नक्काशी उकेरी गई है।
मंदिर परिसर में नवग्रहों का मंडप भी स्थापित है। दीवारों पर प्राचीन तमिल साहित्य — सिलप्पादिकारम, परिपादल और मदुरै कांची — के शिलालेख उत्कीर्ण हैं, जो इस तीर्थ की प्राचीनता को प्रमाणित करते हैं।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
कूडल अझगर मंदिर का निर्माण पांड्य राजाओं के काल में हुआ था। कालांतर में विजयनगर साम्राज्य और मदुरै नायक शासकों ने इसे और भव्य स्वरूप दिया। करीब 600 वर्ष से भी अधिक पुराना यह विष्णु मंदिर वैष्णव परंपरा के 108 दिव्य देशमों में गिना जाता है।
यहाँ भगवान नारायण 'कूडल अझगर' — अर्थात सुंदर सर्प शय्या पर विराजमान — रूप में भक्तों को दर्शन देते हैं। मुख्य मंदिर में उनकी पत्नी देवी मधुरवल्ली (लक्ष्मी) का अलग मंदिर है। परिसर में श्रीराम, श्रीकृष्ण और अन्य देवताओं के उपमंदिर भी हैं।
पौराणिक कथाएँ और भक्ति परंपरा
मंदिर से जुड़ी एक प्रमुख पौराणिक कथा के अनुसार, राक्षस सोमका ने ब्रह्माजी से चारों वेद चुरा लिए थे। तब भगवान विष्णु ने कूडल अझगर रूप में अवतार लेकर उस राक्षस का वध किया और वेदों को पुनः स्थापित किया। ब्रह्मांड पुराण में भी इस घटना का उल्लेख बताया जाता है।
बारह अलवार संतों में से एक पेरियालवार (विष्णुचित्त) ने पांड्य राजा के दरबार में भगवान की महिमा का गान किया था। मान्यता है कि उनके भक्ति गान से प्रभावित होकर स्वयं भगवान कूडल अझगर प्रकट हुए और उन्हें आशीर्वाद दिया। मंगुडी मरुदन रचित मदुरै कांची, कलिथ्थोकाई, परिपाटल और सिलप्पदिकारम जैसी साहित्यिक कृतियों में भी इस मंदिर का उल्लेख मिलता है।
दर्शन और यात्रा की जानकारी
मदुरै की गर्म जलवायु को देखते हुए यहाँ आने का सर्वोत्तम समय दिसंबर से फरवरी के बीच है, जब मौसम अनुकूल रहता है। मदुरै बस स्टैंड और रेलवे जंक्शन से मंदिर मात्र 1 किलोमीटर की दूरी पर है, जबकि मदुरै एयरपोर्ट से यह दूरी लगभग 14 किलोमीटर है। ऑटो, टैक्सी या लोकल बस से यहाँ सहजता से पहुँचा जा सकता है।
पुरुषोत्तम मास में इस तीर्थ के दर्शन का विशेष महत्व माना जाता है, और इस अवधि में श्रद्धालुओं की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि देखी जाती है।