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पुरुषोत्तम मास 2026: मदुरै का कूडल अझगर मंदिर, जिसके अष्टांग विमान की परछाईं जमीन पर नहीं पड़ती

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पुरुषोत्तम मास 2026: मदुरै का कूडल अझगर मंदिर, जिसके अष्टांग विमान की परछाईं जमीन पर नहीं पड़ती

सारांश

मदुरै का कूडल अझगर मंदिर सिर्फ आस्था का केंद्र नहीं — यह वास्तुशिल्प का वह चमत्कार है जिसके आठ हिस्सों वाले शिखर की परछाईं दोपहर में भी जमीन नहीं छूती। पुरुषोत्तम मास में 108 दिव्य देशमों में शामिल इस 600 साल पुराने विष्णु मंदिर का दर्शन विशेष फलदायी माना जाता है।

मुख्य बातें

कूडल अझगर मंदिर , मदुरै में स्थित, वैष्णव परंपरा के 108 दिव्य देशमों में शामिल है।
मंदिर का अष्टांग विमान (आठ हिस्सों वाला शिखर) वास्तुशिल्प का अनूठा उदाहरण है — दोपहर में भी इसकी परछाईं जमीन पर नहीं पड़ती।
यह मंदिर 600 वर्ष से अधिक पुराना है और पांड्य राजाओं के काल में बना; बाद में विजयनगर साम्राज्य और मदुरै नायक शासकों ने इसे भव्यता दी।
मंदिर की दीवारों पर सिलप्पादिकारम , परिपादल और मदुरै कांची के प्राचीन शिलालेख उत्कीर्ण हैं।
दर्शन का सर्वोत्तम समय दिसंबर से फरवरी ; मदुरै रेलवे जंक्शन से मात्र 1 किलोमीटर की दूरी पर।

पुरुषोत्तम मास के पावन अवसर पर मदुरै स्थित कूडल अझगर मंदिर की विशेष महिमा है — यह दक्षिण भारत का वह अनोखा नारायण मंदिर है जिसके अष्टांग विमान (आठ हिस्सों वाले शिखर) की परछाईं दोपहर के समय भी जमीन पर नहीं पड़ती। धार्मिक मान्यता के अनुसार पुरुषोत्तम मास में किए गए दर्शन-पूजन का फल सामान्य दिनों की तुलना में कई गुना अधिक मिलता है।

मंदिर की अद्भुत वास्तुकला

यह मंदिर अपने अष्टांग विमान के कारण वास्तुशिल्प का एक अनूठा उदाहरण है। मान्यता है कि इस शिखर की परछाईं दोपहर के वक्त भी धरती को नहीं छूती, जो हज़ारों श्रद्धालुओं और पर्यटकों को विस्मित करती है। मंदिर ग्रेनाइट की ऊँची दीवारों से घिरा है और प्रवेश द्वार पर पाँच मंजिला राजगोपुरम है, जिस पर दशावतार, लक्ष्मी-नारायण, लक्ष्मी-नरसिंह और अन्य देवी-देवताओं की सूक्ष्म नक्काशी उकेरी गई है।

मंदिर परिसर में नवग्रहों का मंडप भी स्थापित है। दीवारों पर प्राचीन तमिल साहित्य — सिलप्पादिकारम, परिपादल और मदुरै कांची — के शिलालेख उत्कीर्ण हैं, जो इस तीर्थ की प्राचीनता को प्रमाणित करते हैं।

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

कूडल अझगर मंदिर का निर्माण पांड्य राजाओं के काल में हुआ था। कालांतर में विजयनगर साम्राज्य और मदुरै नायक शासकों ने इसे और भव्य स्वरूप दिया। करीब 600 वर्ष से भी अधिक पुराना यह विष्णु मंदिर वैष्णव परंपरा के 108 दिव्य देशमों में गिना जाता है।

यहाँ भगवान नारायण 'कूडल अझगर' — अर्थात सुंदर सर्प शय्या पर विराजमान — रूप में भक्तों को दर्शन देते हैं। मुख्य मंदिर में उनकी पत्नी देवी मधुरवल्ली (लक्ष्मी) का अलग मंदिर है। परिसर में श्रीराम, श्रीकृष्ण और अन्य देवताओं के उपमंदिर भी हैं।

पौराणिक कथाएँ और भक्ति परंपरा

मंदिर से जुड़ी एक प्रमुख पौराणिक कथा के अनुसार, राक्षस सोमका ने ब्रह्माजी से चारों वेद चुरा लिए थे। तब भगवान विष्णु ने कूडल अझगर रूप में अवतार लेकर उस राक्षस का वध किया और वेदों को पुनः स्थापित किया। ब्रह्मांड पुराण में भी इस घटना का उल्लेख बताया जाता है।

बारह अलवार संतों में से एक पेरियालवार (विष्णुचित्त) ने पांड्य राजा के दरबार में भगवान की महिमा का गान किया था। मान्यता है कि उनके भक्ति गान से प्रभावित होकर स्वयं भगवान कूडल अझगर प्रकट हुए और उन्हें आशीर्वाद दिया। मंगुडी मरुदन रचित मदुरै कांची, कलिथ्थोकाई, परिपाटल और सिलप्पदिकारम जैसी साहित्यिक कृतियों में भी इस मंदिर का उल्लेख मिलता है।

दर्शन और यात्रा की जानकारी

मदुरै की गर्म जलवायु को देखते हुए यहाँ आने का सर्वोत्तम समय दिसंबर से फरवरी के बीच है, जब मौसम अनुकूल रहता है। मदुरै बस स्टैंड और रेलवे जंक्शन से मंदिर मात्र 1 किलोमीटर की दूरी पर है, जबकि मदुरै एयरपोर्ट से यह दूरी लगभग 14 किलोमीटर है। ऑटो, टैक्सी या लोकल बस से यहाँ सहजता से पहुँचा जा सकता है।

पुरुषोत्तम मास में इस तीर्थ के दर्शन का विशेष महत्व माना जाता है, और इस अवधि में श्रद्धालुओं की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि देखी जाती है।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन इस पर वैज्ञानिक दृष्टि से कोई सार्वजनिक अध्ययन उपलब्ध नहीं है — यह तथ्य और मिथक के बीच की वह रोचक सीमा है जो भारतीय मंदिर स्थापत्य को विश्व स्तर पर विशिष्ट बनाती है। पुरुषोत्तम मास जैसे अवसरों पर ऐसे तीर्थों की पहचान धार्मिक पर्यटन को बढ़ावा देने का एक स्वाभाविक माध्यम भी है, जिसका लाभ स्थानीय अर्थव्यवस्था को मिलता है। 108 दिव्य देशमों में से अधिकांश दक्षिण भारत में हैं, फिर भी हिंदी पट्टी में इनकी जानकारी सीमित है — यह सांस्कृतिक दूरी पाटने की ज़रूरत को रेखांकित करता है।
RashtraPress
22 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

कूडल अझगर मंदिर कहाँ स्थित है और यह किस लिए प्रसिद्ध है?
कूडल अझगर मंदिर तमिलनाडु के मदुरै शहर में स्थित है और यह वैष्णव परंपरा के 108 दिव्य देशमों में से एक है। यह मंदिर अपने अष्टांग विमान (आठ हिस्सों वाले शिखर) के लिए विशेष रूप से प्रसिद्ध है, जिसकी परछाईं दोपहर के समय भी जमीन पर नहीं पड़ती।
पुरुषोत्तम मास में कूडल अझगर मंदिर के दर्शन का क्या महत्व है?
धार्मिक मान्यता के अनुसार पुरुषोत्तम मास (अधिक मास) भगवान विष्णु की आराधना के लिए अत्यंत शुभ होता है और इस माह में किए गए दर्शन-पूजन का फल सामान्य दिनों की तुलना में कई गुना अधिक मिलता है। कूडल अझगर एक प्रमुख नारायण तीर्थ होने के कारण इस काल में यहाँ श्रद्धालुओं की विशेष भीड़ उमड़ती है।
कूडल अझगर मंदिर का निर्माण किसने करवाया था?
इस मंदिर का मूल निर्माण पांड्य राजाओं के काल में हुआ था। बाद में विजयनगर साम्राज्य और मदुरै नायक शासकों ने इसे और भव्य रूप दिया। मंदिर की दीवारों पर उत्कीर्ण प्राचीन तमिल साहित्य के शिलालेख इसकी 600 वर्ष से अधिक पुरानी ऐतिहासिकता को प्रमाणित करते हैं।
कूडल अझगर मंदिर से जुड़ी पौराणिक कथा क्या है?
प्रचलित मान्यता के अनुसार राक्षस सोमका ने ब्रह्माजी से चारों वेद चुरा लिए थे, जिसके बाद भगवान विष्णु ने कूडल अझगर रूप में अवतार लेकर उस राक्षस का वध किया और वेदों को पुनः स्थापित किया। ब्रह्मांड पुराण में भी इस घटना का उल्लेख बताया जाता है।
कूडल अझगर मंदिर पहुँचने का सबसे अच्छा तरीका क्या है?
मदुरै बस स्टैंड और रेलवे जंक्शन से मंदिर मात्र 1 किलोमीटर की दूरी पर है, जबकि मदुरै एयरपोर्ट से यह लगभग 14 किलोमीटर दूर है। ऑटो, टैक्सी या लोकल बस से यहाँ आसानी से पहुँचा जा सकता है। यात्रा का सर्वोत्तम समय दिसंबर से फरवरी के बीच है।
राष्ट्र प्रेस
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