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कल्पेश्वर महादेव: पंचकेदार का वह पावन धाम जहाँ 12 महीने होते हैं शिव की जटाओं के दर्शन

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कल्पेश्वर महादेव: पंचकेदार का वह पावन धाम जहाँ 12 महीने होते हैं शिव की जटाओं के दर्शन

सारांश

पंचकेदार का पाँचवाँ और अंतिम धाम — कल्पेश्वर महादेव — वह एकमात्र केदार तीर्थ है जो साल के बारहों महीने खुला रहता है। चमोली की उर्गम घाटी में प्राकृतिक गुफा में स्थित इस मंदिर में शिव की जटाओं के दर्शन होते हैं। CM धामी ने एक्स पर वीडियो साझा कर श्रद्धालुओं को आमंत्रित किया।

मुख्य बातें

श्री कल्पेश्वर महादेव मंदिर पंचकेदारों में पंचम धाम है, जो चमोली जिले की उर्गम घाटी में स्थित है।
यह एकमात्र पंचकेदार तीर्थ है जिसके कपाट वर्ष के 12 महीने खुले रहते हैं।
यहाँ भगवान शिव की जटाओं (केशों) की पूजा होती है — अन्य चार केदारों से यह विशेषता इसे अलग बनाती है।
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने सोमवार को एक्स पर मंदिर का वीडियो पोस्ट कर श्रद्धालुओं को आमंत्रित किया।
मंदिर तक पहुँचने के लिए हेलंग से उर्गम घाटी ( ~30 किमी ) और फिर 2-3 किमी की पैदल यात्रा करनी होती है।
पौराणिक मान्यता के अनुसार पांडवों और महर्षि दुर्वासा ने इसी स्थान पर तपस्या की थी।

उत्तराखंड के चमोली जिले की उर्गम घाटी में स्थित श्री कल्पेश्वर महादेव मंदिर पंचकेदारों में पंचम और अंतिम धाम है — और यह एकमात्र ऐसा केदार तीर्थ है जिसके कपाट वर्षभर श्रद्धालुओं के लिए खुले रहते हैं। यहाँ भगवान शिव की जटाओं (केशों) की पूजा की जाती है, जो इसे शेष चार केदारों से अलग और अद्वितीय बनाती है।

क्या है कल्पेश्वर की विशेषता

पंचकेदार श्रृंखला में केदारनाथ में पृष्ठभाग, तुंगनाथ में भुजाएँ, रुद्रनाथ में मुख और मध्यमहेश्वर में नाभि की पूजा होती है। कल्पेश्वर में भगवान शिव की जटाओं के दर्शन होते हैं। यह मंदिर एक प्राकृतिक गुफा के भीतर स्थित है, जो इसे एक दुर्लभ आध्यात्मिक अनुभव प्रदान करती है। अन्य केदार मंदिर शीतकाल में बंद हो जाते हैं, किंतु कल्पेश्वर के द्वार साल के बारहों महीने खुले रहते हैं।

पौराणिक महत्व और ऐतिहासिक संदर्भ

मंदिर से जुड़ी पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, महाभारत युद्ध के पश्चात पाँचों पांडवों ने स्वजन-हत्या के पाप से मुक्ति पाने हेतु भगवान शिव की शरण में यहाँ तपस्या की थी। इसके अतिरिक्त, महर्षि दुर्वासा ने इसी स्थान पर कल्पवृक्ष के नीचे घोर तपस्या की थी — इसी कारण इस तीर्थ का नाम 'कल्पेश्वर' पड़ा। यह नाम स्वयं इस स्थान की आध्यात्मिक गहराई का प्रमाण है।

मुख्यमंत्री धामी की अपील

उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने सोमवार को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर मंदिर का एक भव्य वीडियो साझा करते हुए लिखा, 'चमोली जिले की पवित्र धरती पर स्थित श्री कल्पेश्वर महादेव मंदिर पंच केदारों में से एक है। प्राकृतिक सुंदरता और आध्यात्मिक ऊर्जा से भरपूर यह स्थान श्रद्धालुओं को गहरी शांति और सुकून का अनुभव कराता है। अगर आप चमोली जिले की यात्रा पर जाएं, तो इस पावन मंदिर में दर्शन करना जरूर न भूलें।' उनकी यह पोस्ट तीर्थ-पर्यटन को बढ़ावा देने की राज्य सरकार की व्यापक पहल का हिस्सा मानी जा रही है।

प्राकृतिक परिवेश और वातावरण

मंदिर के निकट कल्पगंगा नदी — जिसे हिरणावती भी कहा जाता है — प्रवाहित होती है। समूचा क्षेत्र घने हरे-भरे जंगलों और सेब के बगीचों से आच्छादित है, जो इसे एक नयनाभिराम तीर्थ बनाता है। यह स्थान न केवल आस्था का केंद्र है, बल्कि प्रकृति-प्रेमियों के लिए भी एक अनुपम गंतव्य है।

कैसे पहुँचें कल्पेश्वर

ऋषिकेश से हेलंग (चमोली) तक सड़क मार्ग उपलब्ध है। हेलंग से उर्गम घाटी तक — लगभग 30 किलोमीटर — वाहन सेवा उपलब्ध है। उर्गम से मंदिर तक लगभग 2 से 3 किलोमीटर की पैदल यात्रा करनी होती है। चूँकि मंदिर वर्षभर खुला रहता है, श्रद्धालु किसी भी मौसम में यहाँ आ सकते हैं — यही इसकी सबसे बड़ी विशेषता है।

संपादकीय दृष्टिकोण

जो केदारनाथ-बद्रीनाथ की भीड़ से दूर हैं। वर्षभर खुले रहने की विशेषता कल्पेश्वर को ऑफ-सीज़न पर्यटन के लिए एक स्वाभाविक विकल्प बनाती है — लेकिन उर्गम घाटी तक पहुँचने वाली सड़क और बुनियादी ढाँचे की स्थिति अभी भी सुधार की माँग करती है। राज्य सरकार यदि इस धाम को सोशल मीडिया प्रचार से आगे बढ़कर ठोस कनेक्टिविटी और सुविधाओं से जोड़े, तो यह स्थान वास्तव में उत्तराखंड के तीर्थ-पर्यटन का एक नया अध्याय लिख सकता है।
RashtraPress
9 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

कल्पेश्वर महादेव मंदिर कहाँ स्थित है?
कल्पेश्वर महादेव मंदिर उत्तराखंड के चमोली जिले की उर्गम घाटी में स्थित है। यह एक प्राकृतिक गुफा के भीतर बना मंदिर है और पंचकेदार श्रृंखला का पाँचवाँ एवं अंतिम धाम है।
कल्पेश्वर मंदिर में किसकी पूजा होती है?
यहाँ भगवान शिव की जटाओं (केशों) की पूजा होती है। पंचकेदार के अन्य मंदिरों में शिव के विभिन्न अंगों की पूजा होती है — कल्पेश्वर में जटाओं की पूजा इसे विशिष्ट बनाती है।
क्या कल्पेश्वर मंदिर साल भर खुला रहता है?
हाँ, कल्पेश्वर महादेव मंदिर पंचकेदारों में एकमात्र ऐसा धाम है जिसके कपाट वर्ष के 12 महीने श्रद्धालुओं के लिए खुले रहते हैं। अन्य केदार मंदिर शीतकाल में बंद हो जाते हैं।
कल्पेश्वर मंदिर तक कैसे पहुँचें?
ऋषिकेश से हेलंग (चमोली) तक सड़क मार्ग से जाएँ, फिर हेलंग से उर्गम घाटी (लगभग 30 किलोमीटर) तक वाहन उपलब्ध हैं। उर्गम से मंदिर तक लगभग 2 से 3 किलोमीटर की पैदल यात्रा करनी होती है।
कल्पेश्वर नाम कैसे पड़ा?
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, महर्षि दुर्वासा ने इसी स्थान पर कल्पवृक्ष के नीचे कठोर तपस्या की थी, जिसके कारण इस स्थान का नाम 'कल्पेश्वर' पड़ा। महाभारत युद्ध के बाद पांडवों ने भी यहाँ भगवान शिव से क्षमा प्राप्त करने के लिए तपस्या की थी।
राष्ट्र प्रेस
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