बूढ़ा केदार धाम: टिहरी गढ़वाल का 'पांचवां धाम', जहां नाथ संप्रदाय के योगी करते हैं पूजा
सारांश
मुख्य बातें
उत्तराखंड के टिहरी गढ़वाल जिले में बालगंगा और धर्मगंगा नदियों के पवित्र संगम पर स्थित बूढ़ा केदार धाम को देवभूमि का 'पांचवां धाम' माना जाता है। घने देवदार और बांज के जंगलों तथा वन्यजीव अभयारण्य से घिरा यह जागृत शिवालय आधुनिकता की चकाचौंध से कोसों दूर, अध्यात्म और आस्था का अद्वितीय केंद्र है। यहाँ स्थापित विशाल शिवलिंग की आभा और आकार देश के अन्य शिवालयों से सर्वथा भिन्न और विस्मयकारी बताई जाती है।
मुख्यमंत्री धामी ने किया धाम का गुणगान
उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने बुधवार, 27 मई को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर मंदिर का एक विशेष वीडियो साझा किया। अपनी पोस्ट में उन्होंने लिखा, 'हर-हर महादेव। जनपद टिहरी गढ़वाल में बालगंगा और धर्मगंगा के पावन संगम के समीप स्थित बूढ़ा केदार धाम आस्था और अध्यात्म का अद्भुत केंद्र है। स्कंदपुराण के केदारखंड में वर्णित यह पवित्र स्थल पंचम धाम के रूप में विशेष मान्यता रखता है। टिहरी गढ़वाल आगमन पर इस पावन मंदिर के दर्शन अवश्य करें।'
मुख्यमंत्री की इस पोस्ट ने एक बार फिर इस अपेक्षाकृत अल्पचर्चित धाम को राष्ट्रीय ध्यान में ला दिया है। गौरतलब है कि स्कंदपुराण के केदारखंड में इस स्थल का उल्लेख मिलता है, जो इसकी पौराणिक प्रामाणिकता को रेखांकित करता है।
पौराणिक महत्व: महाभारत से जुड़ी मान्यता
मंदिर का इतिहास महाभारत से गहराई से जुड़ा हुआ है। प्रचलित मान्यता के अनुसार, महाभारत युद्ध में कौरवों और गुरु द्रोणाचार्य के वध के पश्चात पांडवों पर गोत्र हत्या और स्वजन हत्या का पाप लगा था। भगवान कृष्ण के निर्देश पर पाप-मोचन हेतु पांडव महादेव की खोज में निकले। मान्यता है कि इसी स्थान पर भगवान शिव ने उन्हें एक वृद्ध ब्राह्मण के रूप में दर्शन दिए और फिर अंतर्ध्यान होकर शिवलिंग में समाहित हो गए। इसी घटना के कारण इस स्थान का नाम 'बूढ़ा केदार' पड़ा।
यह वही आख्यान है जो केदारनाथ की उत्पत्ति-कथा से भी जुड़ता है — जहाँ शिव ने पांडवों को भैंसे के रूप में दर्शन दिए थे — किंतु बूढ़ा केदार की कथा में वृद्ध ब्राह्मण का स्वरूप इसे एक अलग आध्यात्मिक आयाम देता है।
नाथ संप्रदाय की अनूठी परंपरा
बूढ़ा केदार धाम की एक विशिष्ट पहचान यह है कि सदियों से चली आ रही परंपरा के अनुसार यहाँ के पुजारी केवल नाथ संप्रदाय के योगी ही होते हैं। यह परंपरा इसे उत्तराखंड के अन्य प्रमुख शैव तीर्थों से अलग करती है, जहाँ प्रायः रावल या जंगम पुजारी पूजा-अर्चना करते हैं।
नाथ संप्रदाय की यह उपस्थिति मंदिर को तंत्र, योग और शैव दर्शन के संगम का प्रतीक बनाती है। यह ऐसे समय में और भी प्रासंगिक है जब नाथ परंपरा को लेकर देशभर में नई जिज्ञासा जागी है।
भौगोलिक स्थिति और तीर्थयात्रा की जानकारी
यह धाम टिहरी शहर से लगभग 60 किलोमीटर और ऋषिकेश से लगभग 120 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। अन्य हिमालयी धामों — जैसे केदारनाथ और बद्रीनाथ — के विपरीत, बूढ़ा केदार धाम के कपाट वर्षभर श्रद्धालुओं के लिए खुले रहते हैं, जो इसे शीतकाल में भी एक सुलभ तीर्थ बनाता है।
मंदिर का परिवेश — घने जंगल, पर्वतीय नदियों का संगम और वन्यजीव अभयारण्य की निकटता — इसे आध्यात्मिक यात्रा के साथ-साथ प्रकृति-प्रेमियों के लिए भी एक आकर्षक गंतव्य बनाती है।
आगे क्या
मुख्यमंत्री धामी की पोस्ट के बाद उम्मीद है कि राज्य सरकार इस धाम तक पहुँच-मार्ग और पर्यटन अवसंरचना को और बेहतर बनाने पर ध्यान देगी। उत्तराखंड के चार धामों की यात्रा में आने वाले श्रद्धालुओं को अब इस 'पांचवें धाम' की ओर भी आकर्षित करने के प्रयास तेज़ हो सकते हैं।