पुरुषोत्तम मास में चेन्नई के श्री पार्थसारथी मंदिर में विराजते हैं विष्णु के पाँच स्वरूप, निहत्थे हैं 'अर्जुन के सारथी'
सारांश
मुख्य बातें
पुरुषोत्तम मास के पावन अवसर पर चेन्नई के श्री पार्थसारथी मंदिर में श्रद्धालुओं की विशेष भीड़ उमड़ रही है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार यह महीना भगवान विष्णु को अत्यंत प्रिय है और इस दौरान श्रीहरि के दर्शन-पूजन से सामान्य दिनों की तुलना में कई गुना अधिक पुण्य फल प्राप्त होता है। तमिलनाडु की राजधानी चेन्नई के त्रिपलीकेन क्षेत्र में स्थित यह मंदिर वैष्णव परंपरा के सर्वाधिक महत्वपूर्ण तीर्थस्थलों में से एक है।
मंदिर की विशिष्ट पहचान
श्री पार्थसारथी मंदिर की सबसे अनूठी विशेषता यहाँ के मुख्य विग्रह में है — भगवान श्रीकृष्ण को यहाँ मूँछों वाले स्वरूप में दर्शाया गया है और उनके हाथों में कोई अस्त्र-शस्त्र नहीं है। यह इस मंदिर को देशभर के अन्य विष्णु मंदिरों से स्पष्ट रूप से अलग करता है। 'पार्थसारथी' का शाब्दिक अर्थ है — अर्जुन के सारथी, क्योंकि महाभारत के कुरुक्षेत्र युद्ध में श्रीकृष्ण ने अर्जुन के रथ का संचालन किया था। उसी स्वरूप की यहाँ विशेष उपासना की जाती है।
विष्णु के पाँच स्वरूप एक ही परिसर में
मंदिर परिसर में भगवान विष्णु के पाँच प्रमुख स्वरूपों की एक साथ पूजा होती है — पार्थसारथी (श्रीकृष्ण), योग नरसिंह, श्रीराम, गजेंद्र वरदराज और रंगनाथ। एक ही परिसर में पंचस्वरूप दर्शन की यह व्यवस्था वैष्णव श्रद्धालुओं के लिए इस तीर्थ को विशेष बनाती है। यह मंदिर 108 दिव्य देशमों में गिना जाता है — वे पवित्र वैष्णव क्षेत्र जिनका उल्लेख तमिल संत-कवियों द्वारा रचित नालायिर दिव्य प्रबंधम् में मिलता है।
ऐतिहासिक और स्थापत्य विरासत
मंदिर का निर्माण पल्लव शासकों के काल में हुआ माना जाता है। कालांतर में चोल और विजयनगर राजवंशों ने भी इसके विस्तार और सौंदर्यीकरण में योगदान दिया। मंदिर की द्रविड़ शैली की स्थापत्य कला — विशाल गोपुरम, सुंदर नक्काशी और भव्य मंडप — श्रद्धालुओं और पर्यटकों दोनों को समान रूप से आकर्षित करती है। गौरतलब है कि यह मंदिर दक्षिण भारत के उन चुनिंदा प्राचीन मंदिरों में है जो अनेक राजवंशों के संरक्षण में फलते-फूलते रहे।
पौराणिक महत्व और आध्यात्मिक परंपरा
मंदिर से जुड़ी एक प्रमुख पौराणिक कथा के अनुसार राजा सुमति ने भगवान विष्णु से उनके पार्थसारथी स्वरूप के दर्शन की अभिलाषा व्यक्त की थी, तब भगवान ने उन्हें इसी स्थल पर आने का संकेत दिया। मान्यता है कि यह क्षेत्र कभी तुलसी के घने वन और सुंदर पुष्पों से सुशोभित सरोवरों से आच्छादित था। सप्त ऋषियों सहित अनेक महान ऋषि-मुनियों ने यहाँ तपस्या की थी, जिससे यह भूमि आध्यात्मिक ऊर्जा का केंद्र बनी। मंदिर का पवित्र सरोवर भी अत्यंत शुभ माना जाता है, जहाँ श्रद्धालु पूजा-अर्चना से पूर्व स्नान और दर्शन करते हैं।
उत्सव और दर्शन व्यवस्था
मंदिर में वर्षभर धार्मिक उत्सवों का आयोजन होता है, किंतु वैकुंठ एकादशी और अन्य विष्णु उत्सवों के दौरान यहाँ विशेष रौनक देखने को मिलती है। पुरुषोत्तम मास में दर्शन का विशेष महत्व होने के कारण इन दिनों श्रद्धालुओं की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि होती है। मंदिर प्रतिदिन सुबह और शाम दर्शन के लिए खुला रहता है। चेन्नई शहर के मध्य में स्थित होने से यहाँ हवाई, रेल और सड़क मार्ग से सुगमता से पहुँचा जा सकता है। पुरुषोत्तम मास में भगवान नारायण के दर्शन का पुण्य अर्जित करने के इच्छुक श्रद्धालुओं के लिए श्री पार्थसारथी मंदिर एक अनिवार्य तीर्थ है।