पीवी नरसिम्हा राव: आर्थिक सुधारों के जनक जिन्हें कांग्रेस ने दशकों तक भुलाए रखा
सारांश
मुख्य बातें
भारत के पूर्व प्रधानमंत्री पीवी नरसिम्हा राव — जिन्होंने 1991 में देश को आर्थिक दिवालियेपन के कगार से उबारा — स्वयं अपनी पार्टी भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (कांग्रेस / INC) के भीतर दशकों तक उपेक्षा के शिकार रहे। नेहरू-गांधी परिवार से बाहर के इस असाधारण नेता को कांग्रेस के कुछ वरिष्ठ नेताओं ने कभी पूरी तरह 'अपना' नहीं माना — और उनके निधन के बाद करीब डेढ़ दशक तक पार्टी नेतृत्व ने उनकी विरासत को लगभग भुला दिया।
राजनीति छोड़ने की कगार से प्रधानमंत्री की कुर्सी तक
28 जून 1921 को तेलंगाना के करीमनगर में जन्मे पामुलापर्ती वेंकट नरसिम्हा राव 1991 में सक्रिय राजनीति से संन्यास लेने की तैयारी में थे। तभी पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की दुखद हत्या ने परिस्थितियाँ बदल दीं और वे देश के नौवें प्रधानमंत्री के रूप में शपथ लेने पर विवश हुए। उनके सामने चुनौतियाँ विकट थीं — पंजाब और असम में अशांति, और एक ऐसा भुगतान-संतुलन संकट जो देश को दिवालिया घोषित करने की कगार पर ले आया था।
आलोचकों का भी मानना है कि राव की दूरदर्शिता ने भारत को उस दुर्दशा से बचाया जिसमें आज पाकिस्तान जकड़ा हुआ है। उन्होंने तत्कालीन वित्त मंत्री डॉ. मनमोहन सिंह के साथ मिलकर उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण (LPG) की नींव रखी — एक ऐसा आर्थिक बदलाव जिसने आधुनिक भारत की दिशा तय की।
राव की ऐतिहासिक विरासत
राव के कार्यकाल में भारत ने मिसाइल, परमाणु और मोबाइल प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति की। मध्याह्न भोजन योजना और प्रधानमंत्री रोज़गार योजना जैसे कल्याणकारी कार्यक्रम उनके कार्यकाल की देन हैं। इसके अलावा नवोदय विद्यालय, लुक ईस्ट पॉलिसी और भूमि सुधार जैसी पहलें भी उनके नेतृत्व में आकार लेती रहीं।
गौरतलब है कि ये वही दौर था जब भारत का विदेशी मुद्रा भंडार महज कुछ हफ्तों के आयात के लायक रह गया था। राव-मनमोहन की जोड़ी ने न केवल संकट को टाला, बल्कि भारत को वैश्विक अर्थव्यवस्था में एकीकृत करने का मार्ग भी प्रशस्त किया।
बाबरी विध्वंस और कांग्रेस के भीतर विवाद
6 दिसंबर 1992 को अयोध्या में विवादित ढाँचे के विध्वंस ने राव की छवि को गहरी चोट पहुँचाई। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता माखनलाल फोतेदार ने अपनी आत्मकथा 'द चिनार लीव्स' में इस घटना के लिए राव के रुख को जिम्मेदार ठहराया। पत्रकार कुलदीप नैयर ने अपनी पुस्तक 'बियॉन्ड द लाइंस' में उन पर अनदेखी के आरोप लगाए।
पूर्व विदेश मंत्री नटवर सिंह ने बाबरी विध्वंस को राव के कार्यकाल की सबसे बड़ी असफलता करार दिया। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता मणि शंकर अय्यर ने 2016 में एक पुस्तक विमोचन के दौरान यहाँ तक कह दिया था, "पूर्व प्रधानमंत्री पीवी नरसिम्हा राव का हिंदुत्व की ओर झुकाव ही बाबरी मस्जिद विध्वंस की वजह थी।" अय्यर ने यह भी कहा था कि राव वस्तुतः भारतीय जनता पार्टी (BJP) के पहले प्रधानमंत्री थे — एक ऐसा बयान जिसने पार्टी के भीतर गहरी दरार को उजागर किया।
सोनिया गांधी से मनमुटाव और उपेक्षा के वर्ष
बाबरी प्रकरण के अलावा, राव और सोनिया गांधी के बीच वैचारिक व व्यक्तिगत मतभेदों के अनेक किस्से सार्वजनिक रूप से सामने आते रहे। इन्हीं तनावों की परिणति यह रही कि 23 दिसंबर 2004 को निधन के बाद करीब डेढ़ दशक तक कांग्रेस नेतृत्व ने उन्हें पार्टी के आधिकारिक आख्यान से लगभग बाहर कर दिया। न उनकी जयंती पर बड़े आयोजन हुए, न उनकी आर्थिक उपलब्धियों को पार्टी मंच से रेखांकित किया गया।
पुनर्मूल्यांकन की शुरुआत
हालाँकि, हाल के वर्षों में इतिहासकारों और राजनीतिक विश्लेषकों के बीच राव की विरासत का पुनर्मूल्यांकन तेज़ हुआ है। उनकी जन्मशती के अवसर पर 2021 में कई कार्यक्रम आयोजित हुए और उन्हें भारत रत्न देने की माँग भी उठती रही है। यह ऐसे समय में आया है जब देश आर्थिक सुधारों की तीसरी पीढ़ी पर बहस कर रहा है — और राव की नीतियाँ उस बहस की बुनियाद बनी हुई हैं।