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पीवी नरसिम्हा राव: आर्थिक सुधारों के जनक जिन्हें कांग्रेस ने दशकों तक भुलाए रखा

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पीवी नरसिम्हा राव: आर्थिक सुधारों के जनक जिन्हें कांग्रेस ने दशकों तक भुलाए रखा

सारांश

नेहरू-गांधी परिवार से बाहर के प्रधानमंत्री पीवी नरसिम्हा राव ने 1991 में भारत को दिवालियेपन से बचाया और LPG सुधारों से आधुनिक भारत की नींव रखी — फिर भी कांग्रेस ने उन्हें डेढ़ दशक तक भुलाए रखा। बाबरी विध्वंस और सोनिया गांधी से मतभेद इस उपेक्षा की जड़ में थे।

मुख्य बातें

पीवी नरसिम्हा राव का जन्म 28 जून 1921 को करीमनगर, तेलंगाना में हुआ; वे नेहरू-गांधी परिवार से बाहर के प्रमुख कांग्रेसी प्रधानमंत्री थे।
1991 में भुगतान-संतुलन संकट के बीच उन्होंने उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण (LPG) सुधारों की नींव रखी।
6 दिसंबर 1992 को अयोध्या में बाबरी विध्वंस के बाद कांग्रेस के भीतर से उन पर गंभीर आरोप लगे; मणि शंकर अय्यर ने उन्हें 'BJP का पहला प्रधानमंत्री' तक कह दिया।
माखनलाल फोतेदार ('द चिनार लीव्स') और कुलदीप नैयर ('बियॉन्ड द लाइंस') ने पुस्तकों में राव पर अनदेखी के आरोप लगाए।
23 दिसंबर 2004 को निधन के बाद करीब डेढ़ दशक तक कांग्रेस नेतृत्व ने उनकी विरासत को आधिकारिक तौर पर नज़रअंदाज़ किया।
उनकी विरासत में मध्याह्न भोजन योजना, नवोदय विद्यालय, लुक ईस्ट पॉलिसी और परमाणु-मिसाइल प्रगति शामिल हैं।

भारत के पूर्व प्रधानमंत्री पीवी नरसिम्हा राव — जिन्होंने 1991 में देश को आर्थिक दिवालियेपन के कगार से उबारा — स्वयं अपनी पार्टी भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (कांग्रेस / INC) के भीतर दशकों तक उपेक्षा के शिकार रहे। नेहरू-गांधी परिवार से बाहर के इस असाधारण नेता को कांग्रेस के कुछ वरिष्ठ नेताओं ने कभी पूरी तरह 'अपना' नहीं माना — और उनके निधन के बाद करीब डेढ़ दशक तक पार्टी नेतृत्व ने उनकी विरासत को लगभग भुला दिया।

राजनीति छोड़ने की कगार से प्रधानमंत्री की कुर्सी तक

28 जून 1921 को तेलंगाना के करीमनगर में जन्मे पामुलापर्ती वेंकट नरसिम्हा राव 1991 में सक्रिय राजनीति से संन्यास लेने की तैयारी में थे। तभी पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की दुखद हत्या ने परिस्थितियाँ बदल दीं और वे देश के नौवें प्रधानमंत्री के रूप में शपथ लेने पर विवश हुए। उनके सामने चुनौतियाँ विकट थीं — पंजाब और असम में अशांति, और एक ऐसा भुगतान-संतुलन संकट जो देश को दिवालिया घोषित करने की कगार पर ले आया था।

आलोचकों का भी मानना है कि राव की दूरदर्शिता ने भारत को उस दुर्दशा से बचाया जिसमें आज पाकिस्तान जकड़ा हुआ है। उन्होंने तत्कालीन वित्त मंत्री डॉ. मनमोहन सिंह के साथ मिलकर उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण (LPG) की नींव रखी — एक ऐसा आर्थिक बदलाव जिसने आधुनिक भारत की दिशा तय की।

राव की ऐतिहासिक विरासत

राव के कार्यकाल में भारत ने मिसाइल, परमाणु और मोबाइल प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति की। मध्याह्न भोजन योजना और प्रधानमंत्री रोज़गार योजना जैसे कल्याणकारी कार्यक्रम उनके कार्यकाल की देन हैं। इसके अलावा नवोदय विद्यालय, लुक ईस्ट पॉलिसी और भूमि सुधार जैसी पहलें भी उनके नेतृत्व में आकार लेती रहीं।

गौरतलब है कि ये वही दौर था जब भारत का विदेशी मुद्रा भंडार महज कुछ हफ्तों के आयात के लायक रह गया था। राव-मनमोहन की जोड़ी ने न केवल संकट को टाला, बल्कि भारत को वैश्विक अर्थव्यवस्था में एकीकृत करने का मार्ग भी प्रशस्त किया।

बाबरी विध्वंस और कांग्रेस के भीतर विवाद

6 दिसंबर 1992 को अयोध्या में विवादित ढाँचे के विध्वंस ने राव की छवि को गहरी चोट पहुँचाई। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता माखनलाल फोतेदार ने अपनी आत्मकथा 'द चिनार लीव्स' में इस घटना के लिए राव के रुख को जिम्मेदार ठहराया। पत्रकार कुलदीप नैयर ने अपनी पुस्तक 'बियॉन्ड द लाइंस' में उन पर अनदेखी के आरोप लगाए।

पूर्व विदेश मंत्री नटवर सिंह ने बाबरी विध्वंस को राव के कार्यकाल की सबसे बड़ी असफलता करार दिया। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता मणि शंकर अय्यर ने 2016 में एक पुस्तक विमोचन के दौरान यहाँ तक कह दिया था, "पूर्व प्रधानमंत्री पीवी नरसिम्हा राव का हिंदुत्व की ओर झुकाव ही बाबरी मस्जिद विध्वंस की वजह थी।" अय्यर ने यह भी कहा था कि राव वस्तुतः भारतीय जनता पार्टी (BJP) के पहले प्रधानमंत्री थे — एक ऐसा बयान जिसने पार्टी के भीतर गहरी दरार को उजागर किया।

सोनिया गांधी से मनमुटाव और उपेक्षा के वर्ष

बाबरी प्रकरण के अलावा, राव और सोनिया गांधी के बीच वैचारिक व व्यक्तिगत मतभेदों के अनेक किस्से सार्वजनिक रूप से सामने आते रहे। इन्हीं तनावों की परिणति यह रही कि 23 दिसंबर 2004 को निधन के बाद करीब डेढ़ दशक तक कांग्रेस नेतृत्व ने उन्हें पार्टी के आधिकारिक आख्यान से लगभग बाहर कर दिया। न उनकी जयंती पर बड़े आयोजन हुए, न उनकी आर्थिक उपलब्धियों को पार्टी मंच से रेखांकित किया गया।

पुनर्मूल्यांकन की शुरुआत

हालाँकि, हाल के वर्षों में इतिहासकारों और राजनीतिक विश्लेषकों के बीच राव की विरासत का पुनर्मूल्यांकन तेज़ हुआ है। उनकी जन्मशती के अवसर पर 2021 में कई कार्यक्रम आयोजित हुए और उन्हें भारत रत्न देने की माँग भी उठती रही है। यह ऐसे समय में आया है जब देश आर्थिक सुधारों की तीसरी पीढ़ी पर बहस कर रहा है — और राव की नीतियाँ उस बहस की बुनियाद बनी हुई हैं।

संपादकीय दृष्टिकोण

खासकर तब जब आप सत्ता-केंद्र के बाहर के हों। जिस नेता ने 1991 में भारत को IMF के सामने गिरवी रखने से बचाया, उसे उसी पार्टी ने डेढ़ दशक तक हाशिये पर रखा — यह महज़ व्यक्तिगत मनमुटाव नहीं, बल्कि एक संस्थागत विफलता है। बाबरी विध्वंस पर राव की भूमिका पर बहस जायज़ है, लेकिन आर्थिक सुधारों की विरासत को उसी विवाद में दफ़न कर देना इतिहास के साथ अन्याय है। कांग्रेस का यह द्वंद्व आज भी अनसुलझा है — राव को स्वीकारना उनके उन फैसलों को भी स्वीकारना है जो नेहरूवादी ढाँचे से अलग थे।
RashtraPress
11 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

पीवी नरसिम्हा राव कौन थे और उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि क्या थी?
पीवी नरसिम्हा राव भारत के नौवें प्रधानमंत्री थे, जिन्होंने 1991 में देश को गंभीर भुगतान-संतुलन संकट से उबारा और उदारीकरण, निजीकरण व वैश्वीकरण (LPG) सुधारों की नींव रखी। उनकी विरासत में मध्याह्न भोजन योजना, नवोदय विद्यालय और लुक ईस्ट पॉलिसी भी शामिल हैं।
कांग्रेस ने पीवी नरसिम्हा राव को क्यों नहीं अपनाया?
कांग्रेस के भीतर राव की उपेक्षा के दो प्रमुख कारण माने जाते हैं — 6 दिसंबर 1992 को बाबरी विध्वंस के समय उनकी कथित निष्क्रियता, और सोनिया गांधी के साथ व्यक्तिगत व वैचारिक मतभेद। वरिष्ठ नेताओं ने उन्हें पार्टी की मुख्यधारा से बाहर का माना।
मणि शंकर अय्यर ने नरसिम्हा राव के बारे में क्या कहा था?
कांग्रेस के वरिष्ठ नेता मणि शंकर अय्यर ने 2016 में एक पुस्तक विमोचन के दौरान कहा था कि 'पूर्व प्रधानमंत्री पीवी नरसिम्हा राव का हिंदुत्व की ओर झुकाव ही बाबरी मस्जिद विध्वंस की वजह थी।' उन्होंने यह भी कहा था कि राव वस्तुतः BJP के पहले प्रधानमंत्री थे।
बाबरी विध्वंस में नरसिम्हा राव की भूमिका को लेकर किन पुस्तकों में आरोप लगाए गए?
माखनलाल फोतेदार ने अपनी आत्मकथा 'द चिनार लीव्स' में और कुलदीप नैयर ने 'बियॉन्ड द लाइंस' में राव पर अनदेखी के आरोप लगाए। पूर्व विदेश मंत्री नटवर सिंह ने भी बाबरी विध्वंस को राव के कार्यकाल की सबसे बड़ी असफलता बताया।
पीवी नरसिम्हा राव का निधन कब हुआ और उनके बाद क्या हुआ?
पीवी नरसिम्हा राव का निधन 23 दिसंबर 2004 को हुआ। उनके निधन के बाद करीब डेढ़ दशक तक कांग्रेस नेतृत्व ने उनकी विरासत को आधिकारिक तौर पर नज़रअंदाज़ किया, हालाँकि 2021 में उनकी जन्मशती पर पुनर्मूल्यांकन की शुरुआत हुई।
राष्ट्र प्रेस
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