डॉ. राही मासूम रजा: एक मुस्लिम लेखक जो महाभारत की पटकथा लिखकर धर्म से परे कला का परिचय दिया
सारांश
Key Takeaways
- राही मासूम रजा ने महाभारत की पटकथा लिखकर सांस्कृतिक एकता का संदेश दिया।
- उनकी लेखनी ने हिंदी और उर्दू के बंटवारे को चुनौती दी।
- उन्होंने समाज में महत्वपूर्ण मुद्दों को उठाया, जैसे सामंती पाखंड और भाषाई भेदभाव।
- उनकी कृतियों में गंगौली गांव की वास्तविकता को दर्शाया गया।
- राही ने भारतीय साहित्य में एक नई धारा प्रवाहित की।
नई दिल्ली, 14 मार्च (राष्ट्र प्रेस)। यह कहानी 1980 के दशक के अंत की है। दूरदर्शन पर बीआर चोपड़ा भारत के सबसे प्रसिद्ध महाकाव्य 'महाभारत' को स्क्रीन पर लाने की योजना बना रहे थे। जब यह खबर आई कि इस पवित्र हिंदू ग्रंथ के संवाद एक मुस्लिम लेखक द्वारा लिखे जाएंगे, तो देश में हंगामा मच गया। प्रश्न उठाया गया, "क्या कोई हिंदू विद्वान नहीं है जो एक मुसलमान को हमारे धर्मग्रंथ की पटकथा लिखने दे?" लेकिन उस लेखक ने कोई रक्षात्मक उत्तर नहीं दिया, बल्कि एक ऐसी गर्जना की जिसने सभी को चुप करा दिया।
उन्होंने कहा, "मैं गंगा का पुत्र हूं। मुझसे बेहतर महाभारत कौन लिख सकता है?" यह थी डॉ. राही मासूम रजा की बेबाक आवाज़। जब टीवी स्क्रीन पर एक घूमते पहिये के साथ गूंजा, "मैं समय हूं..." तो संपूर्ण भारत ने न केवल महाभारत को समझा, बल्कि राही मासूम रजा की उस कलम के प्रति भी सम्मान व्यक्त किया जो किसी धर्म की मोहताज नहीं थी।
1 सितंबर 1927 को उत्तर प्रदेश के गाजीपुर के 'गंगौली' गांव में एक प्रतिष्ठित शिया जमींदार परिवार में जन्मे राही का बचपन राजकुमार जैसा नहीं था। मात्र छह वर्ष की आयु में टीबी और पोलियो जैसी गंभीर बीमारियों ने उन्हें जकड़ लिया, लेकिन यह बीमारी उनके लिए वरदान साबित हुई। उनके अकेलेपन का साथी 'कल्लू काका' नामक सेवक लोककथाएं और किंवदंतियां सुनाया करते थे।
1947 में जब देश का बंटवारा हुआ, तो नफरत की लहरें उठीं। कई प्रतिष्ठित मुस्लिम परिवार पाकिस्तान जा रहे थे। लेकिन राही मासूम रजा के पिता, जो एक प्रसिद्ध वकील थे, ने इस नवगठित देश में जाने से मना कर दिया।
अपनी बीमारी से उबरकर राही ने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय (एएमयू) में दाखिला लिया। वामपंथी विचारों से प्रभावित होकर राही जल्द ही छात्रों के प्रिय प्रोफेसर बन गए, लेकिन उनकी जिंदगी में एक ऐसा तूफान आया जिसने भारतीय साहित्य की धारा को बदल दिया।
राही ने नैयर जहां से विवाह किया, जिनका रामपुर राजघराने के एक व्यक्ति से तलाक हो चुका था। एएमयू के 'उर्दू अभिजात्य वर्ग' ने इस पर इतना विरोध किया कि उन्होंने राही का बहिष्कार कर दिया। अपने ही परिसर में उनके खिलाफ राजनीति का ऐसा जाल बिछा कि उस स्वाभिमानी इंसान को नौकरी छोड़नी पड़ी।
यह उर्दू साहित्य का दुर्भाग्य और हिंदी साहित्य का सौभाग्य था। इस घटना ने उन्हें इतना आहत किया कि उन्होंने उर्दू लिपि से मुंह मोड़ लिया और देवनागरी (हिंदी) में लिखना शुरू किया। 1967 में अपनी पत्नी के साथ वह बॉम्बे (अब मुंबई) चले गए।
बॉम्बे पहुंचने पर राही ने ऐसा लिखा जो हिंदी साहित्य में पहले कभी नहीं लिखा गया, 'आधा गांव'। यह उपन्यास कोई चमचमाती प्रेम कहानी नहीं थी। इसमें गंगौली गांव की धूल, वहां का पसीना, सामंती पाखंड और भरपूर गालियां थीं।
उपन्यास में गांव की महिलाएं खालिस 'भोजपुरी' बोलती थीं और शहरी उर्दू को 'वेश्याओं की भाषा' कहकर नकारती थीं। राही मासूम रजा ने साबित कर दिया कि भाषा किसी मजहब की नहीं, बल्कि भूगोल की होती है। उन्होंने हिंदी और उर्दू के बंटवारे को झूठा करार देते हुए 'हिन्दवी' की वकालत की। उनके दूसरे उपन्यास 'टोपी शुक्ला' ने हिंदू-मुस्लिम मित्रता (टोपी और इफ्फान) के माध्यम से बंटवारे की बेबुनियादता को उजागर किया।
बॉम्बे फिल्म उद्योग में राही ने 300 से अधिक फिल्मों के लिए लेखन किया, जहां कमर्शियल सिनेमा अक्सर लेखकों की धार को कुंद कर देता है। राही ने वहां भी अपनी शर्तें लागू कीं। अपने उपन्यास 'सीन: 75' में उन्होंने फिल्म उद्योग के इसी चमचमाते परदे के पीछे के काले सच और खोखलेपन को बेनकाब किया।
15 मार्च 1992 को डॉ. राही मासूम रजा ने इस दुनिया को अलविदा कह दिया।