राजनाथ सिंह का IPRD-2026 में बड़ा बयान: हिंद-प्रशांत का भविष्य तकनीक नहीं, साझेदारी तय करेगी
सारांश
मुख्य बातें
रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने 4 नवंबर 2026 को नई दिल्ली में आयोजित 'इंडो-पैसिफिक रीजनल डायलॉग-2026' (IPRD-2026) के विशेष सत्र को संबोधित करते हुए स्पष्ट किया कि हिंद-प्रशांत क्षेत्र का भविष्य केवल तकनीकी उन्नति पर नहीं, बल्कि देशों के बीच आपसी विश्वास, सुदृढ़ साझेदारी और सहयोग की भावना पर निर्भर करेगा। उन्होंने कहा कि भारत इस सामूहिक प्रयास में सक्रिय योगदान देने के लिए पूरी तरह तैयार है। यह संबोधन ऐसे समय में आया है जब हिंद-प्रशांत क्षेत्र में समुद्री सुरक्षा को लेकर वैश्विक चिंताएँ गहरी होती जा रही हैं।
भारत और महासागरों का ऐतिहासिक संबंध
राजनाथ सिंह ने रेखांकित किया कि भारत के लिए महासागर कभी दूर या अपरिचित नहीं रहे। उन्होंने कहा कि सदियों से भारतीय नाविक इन समुद्री मार्गों से न केवल व्यापार करते आए हैं, बल्कि अपने साथ ज्ञान, संस्कृति और मानवीय संबंध भी लेकर चलते रहे हैं। यही गहरा ऐतिहासिक जुड़ाव है जो भारत को स्वतंत्र, खुली और नियम-आधारित अंतरराष्ट्रीय समुद्री व्यवस्था का स्वाभाविक समर्थक बनाता है।
रक्षा मंत्री ने स्पष्ट किया कि भारत की समुद्री जिम्मेदारियाँ उसकी राष्ट्रीय तटरेखा तक सीमित नहीं हैं। भारत एक खुली, समावेशी और नियम-आधारित समुद्री व्यवस्था का निरंतर पक्षधर रहा है और आगे भी रहेगा।
वैश्विक समुद्री सुरक्षा पर बढ़ता दबाव
राजनाथ सिंह ने चिंता जताई कि आज वैश्विक समुद्री सुरक्षा का माहौल जानबूझकर किए जा रहे व्यापारिक व्यवधानों के कारण दबाव में है। उन्होंने कहा कि समुद्री मार्गों पर आवाजाही की स्वतंत्रता को खुली चुनौती दी जा रही है और संकरे समुद्री रास्तों को हथियार के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है। यह अस्थिरता व्यापक अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था के लिए भी गंभीर खतरा बन रही है।
उन्होंने कहा कि हर व्यवधान का जवाब वैश्वीकरण से पीछे हटकर नहीं दिया जा सकता, बल्कि आपसी निर्भरता को और सुरक्षित बनाने और आपूर्ति शृंखलाओं में विविधता लाने की दिशा में ठोस कदम उठाने होंगे। गौरतलब है कि लाल सागर और हिंद महासागर में हाल के वर्षों में व्यावसायिक जहाजरानी पर हमलों ने वैश्विक व्यापार को प्रभावित किया है।
तकनीक और समुद्री भविष्य
रक्षा मंत्री ने कहा कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), स्वचालित प्रणालियाँ, नए सेंसर, सामग्री विज्ञान, जैव प्रौद्योगिकी और डेटा विश्लेषण — ये सभी समुद्री सुरक्षा और आर्थिक गतिविधियों के स्वरूप को बदल रहे हैं। हालाँकि उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि तकनीक अकेले इन चुनौतियों का समाधान नहीं है।
उन्होंने चेतावनी दी कि तकनीक देशों के बीच असमानता का एक और कारण नहीं बननी चाहिए। हिंद-प्रशांत क्षेत्र में तकनीकी और आर्थिक क्षमताओं में भारी अंतर है — यदि तकनीकी प्रगति का लाभ केवल कुछ ही देशों तक सीमित रहा, तो क्षेत्रीय सामूहिक मजबूती हासिल नहीं हो पाएगी।
भारत की समुद्री रणनीति और विजन-2047
राजनाथ सिंह ने याद दिलाया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2019 में हिंद-प्रशांत महासागर पहल (IPOI) की घोषणा की थी, जो समुद्री सहयोग को सात परस्पर जुड़े क्षेत्रों पर आधारित एक व्यावहारिक ढाँचे के तहत आगे बढ़ाती है। उन्होंने भारत के 'समुद्री अमृत काल विजन-2047' का भी उल्लेख किया, जिसमें तकनीक, नवाचार, अनुसंधान, शिक्षा और कौशल विकास पर विशेष जोर दिया गया है।
रक्षा मंत्री ने कहा कि जब भारत 2047 तक विकसित राष्ट्र बनने की दिशा में आगे बढ़ रहा है, तब समुद्री क्षेत्र इस राष्ट्रीय बदलाव में केंद्रीय भूमिका निभाएगा। भारत की महत्वाकांक्षाएँ केवल व्यापार या नौसैनिक क्षमता तक सीमित नहीं, बल्कि एक व्यापक समुद्री तंत्र विकसित करने की हैं।
सहयोग की राह: आगे क्या
IPRD-2026 जैसे मंच की भूमिका पर बोलते हुए राजनाथ सिंह ने कहा कि यह संवाद विभिन्न क्षेत्रों के लोगों और समुदायों को एक साथ लाता है, ताकि वे विशिष्ट चुनौतियों पर चर्चा कर व्यावहारिक समाधान तलाश सकें। उन्होंने ज़ोर दिया कि राष्ट्रीय प्राथमिकताओं, क्षेत्रीय सहयोग और ठोस परिणामों के बीच का जुड़ाव अत्यंत महत्वपूर्ण है। आने वाले समय में भारत हिंद-प्रशांत में शांतिपूर्ण, सुरक्षित और समृद्ध समुद्री व्यवस्था के निर्माण में अपनी भागीदारी और गहरी करेगा।