बेबी-ममता की नज़दीकी से वाम मोर्चे में बेचैनी, पश्चिम बंगाल की राजनीति में नया तनाव
सारांश
मुख्य बातें
सीपीआईएम महासचिव एमए बेबी और तृणमूल कांग्रेस (TMC) प्रमुख ममता बनर्जी के बीच हाल ही में दिखी नज़दीकी ने पश्चिम बंगाल की राजनीति में एक नई बहस को जन्म दे दिया है। नई दिल्ली में 'इंडिया' ब्लॉक की रैली के दौरान सामने आई एक तस्वीर — जिसमें बेबी ममता के कान में कुछ फुसफुसाते और ममता ध्यान से सुनते हुए मुस्कुराती दिख रही हैं — ने वाम मोर्चे (लेफ्ट फ्रंट) के भीतर असहज सवाल खड़े कर दिए हैं। रिपोर्टों के अनुसार, यह दृश्य उस विचारधारा से साफ़ टकराव है जो दशकों तक बंगाल के वामपंथियों की पहचान रही।
विवाद की जड़ें
गौरतलब है कि ममता बनर्जी का राजनीतिक उदय ही वामपंथियों के गढ़ को ध्वस्त करने के एकमात्र संकल्प पर टिका था। उन्होंने 2011 में इसे अंजाम दिया — कांग्रेस छोड़ने के करीब 13 साल बाद। इस पृष्ठभूमि में बेबी और ममता की सौहार्दपूर्ण बातचीत को कुछ समय पहले तक अकल्पनीय माना जाता था।
बंगाल के वाम नेताओं का वर्षों से यह मानना रहा है कि भारतीय जनता पार्टी (BJP) और तृणमूल कांग्रेस (TMC) एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। उनका तर्क था कि ममता के साथ किसी भी समझौते से पार्टी की स्वतंत्र पहचान कमज़ोर होगी और कार्यकर्ताओं में भ्रम पैदा होगा — खासकर तब, जब पार्टी का आरोप रहा है कि ममता शासन में उसके समर्थकों पर अत्याचार हुए।
वाम मोर्चे के भीतर दो विचारधाराएँ
इस मुद्दे पर सीपीआईएम के भीतर दो स्पष्ट खेमे उभरे हैं। एक धड़े का मानना है कि BJP से लड़ने के लिए वामपंथियों को 'दुश्मन के दुश्मन' — यानी TMC — के साथ व्यावहारिक तालमेल बनाना होगा। इस पक्ष के समर्थक बताते हैं कि सीपीआईएम की सर्वोच्च निर्णय-निर्माण संस्था ने 'सांप्रदायिक ताकतों' के खिलाफ कांग्रेस को समर्थन देने का प्रस्ताव पहले ही पारित किया है।
इसी खेमे का यह भी कहना है कि कांग्रेस के नेतृत्व वाले संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (UPA) से समर्थन वापस लेने के बाद ही वामपंथियों के जनाधार में गिरावट शुरू हुई थी। दूसरी ओर, विरोधी धड़े का तर्क है कि जब ममता बनर्जी अपने राजनीतिक चरम पर थीं, तब कांग्रेस के साथ गठबंधन करने के बावजूद वाम दल उन्हें रोकने में नाकाम रहे थे।
करात बनाम बेबी — रणनीतिक दरार
जमीनी चर्चाओं और मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, पार्टी का एक हिस्सा इस नई राजनीतिक दिशा को वरिष्ठ मार्क्सवादी नेता और पूर्व महासचिव प्रकाश करात की रणनीतिक सोच से दूर जाने के रूप में देख रहा है। करात पंथ का मानना रहा है कि वामपंथियों को कांग्रेस और TMC दोनों से बराबर दूरी बनाकर अपनी स्वतंत्र वैचारिक पहचान बचानी चाहिए।
पर्यवेक्षकों के अनुसार, एमए बेबी के महासचिव बनने के बाद से पार्टी ने 'भाजपा-विरोधी एकता' को केंद्र में रखने पर बल दिया है। इसी क्रम में 'इंडिया' ब्लॉक के दायरे में ममता बनर्जी के साथ उनकी बातचीत को 'सौहार्दपूर्ण' बताया जा रहा है।
केरल कारक और राष्ट्रीय समीकरण
इस समीकरण को और जटिल बनाता है केरल का राजनीतिक यथार्थ, जहाँ वाम लोकतांत्रिक मोर्चा (LDF) का सीधा और कड़ा मुकाबला कांग्रेस के नेतृत्व वाले संयुक्त लोकतांत्रिक मोर्चा (UDF) से है। ऐसे में राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस और TMC से हाथ मिलाना केरल के ज़मीनी कार्यकर्ताओं को असंगत लग सकता है।
संसद में सीपीआईएम की मौजूदगी पहले की तुलना में काफी सिकुड़ चुकी है। ऐसे में पार्टी के भीतर एक वर्ग मानता है कि विपक्षी एकता अब महज़ विकल्प नहीं, बल्कि अस्तित्व की ज़रूरत बन गई है। लेकिन कट्टर समर्थकों को आशंका है कि इन तस्वीरों और संदेशों से यह धारणा बन सकती है कि सीपीआईएम, TMC के प्रति अपना विरोध धीरे-धीरे नरम कर रही है।
आगे क्या
यह बहस फिलहाल वैचारिक स्तर पर है, लेकिन पश्चिम बंगाल में अगले विधानसभा चुनाव की रणनीति तय होते वक्त यह दरार और गहरी हो सकती है। वाम मोर्चे के सामने असली सवाल यह है कि क्या वह राष्ट्रीय स्तर की BJP-विरोधी राजनीति और बंगाल में TMC के ख़िलाफ़ ज़मीनी संघर्ष — दोनों को एक साथ साध सकता है।