फास्ट ट्रैक स्पेशल कोर्ट योजना को 5 साल का विस्तार, कैबिनेट ने 31 मार्च 2031 तक मंजूरी दी
सारांश
मुख्य बातें
केंद्रीय कैबिनेट ने 4 नवंबर 2026 को फास्ट ट्रैक स्पेशल कोर्ट (FTSC) योजना को 1 अप्रैल 2026 से 31 मार्च 2031 तक पाँच वर्षों के लिए विस्तारित करने की मंजूरी दे दी। यह योजना महिलाओं और बच्चों के विरुद्ध यौन अपराधों से जुड़े मामलों के त्वरित निपटारे के लिए संचालित है। यह इस योजना का तीसरा विस्तार है, जो मूल रूप से 2019 में शुरू की गई थी।
योजना का विस्तार और दायरा
नए विस्तार के तहत देशभर में 850 फास्ट ट्रैक स्पेशल कोर्ट संचालित किए जाएंगे, जिनमें विशेष पॉक्सो अदालतें भी शामिल होंगी। फिलहाल 29 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में 779 FTSC कार्यरत हैं, जिनमें से 399 विशेष पॉक्सो अदालतें हैं। सरकार ने संकेत दिया है कि लंबित दुष्कर्म और पॉक्सो मामलों की संख्या को देखते हुए अतिरिक्त जिलों को भी इस योजना के दायरे में लाया जाएगा।
प्रदर्शन के आँकड़े
सरकारी आँकड़ों के अनुसार, वर्ष 2025 में 775 FTSC (जिनमें 398 पॉक्सो अदालतें शामिल थीं) ने लगभग 66,500 मामलों का निस्तारण किया। इससे पहले वर्ष 2024 में 85,595 मामले और वर्ष 2023 में 76,319 मामले निपटाए गए थे। हालाँकि, 2025 के अंत तक करीब 2.45 लाख मामले अभी भी लंबित हैं, जो इस योजना की निरंतर आवश्यकता को रेखांकित करता है।
वित्तीय सहायता और केंद्र की भूमिका
FTSC योजना के अंतर्गत केंद्र सरकार राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को न्यायिक अधिकारियों एवं सहायक कर्मचारियों के वेतन के साथ-साथ अदालतों के दैनिक संचालन के लिए वित्तीय सहायता प्रदान करती है। योजना की शुरुआत से अब तक राज्यों एवं केंद्र शासित प्रदेशों को ₹1,259.51 करोड़ की राशि जारी की जा चुकी है। यह राशि देशभर में त्वरित न्याय तंत्र को बनाए रखने के लिए केंद्र की प्रतिबद्धता को दर्शाती है।
योजना की पृष्ठभूमि
FTSC योजना की शुरुआत वर्ष 2019 में बाल यौन अपराध संरक्षण (पॉक्सो) अधिनियम, 2012 और दुष्कर्म से जुड़े मामलों के त्वरित निपटारे के उद्देश्य से की गई थी। गौरतलब है कि यह इस योजना का तीसरा विस्तार है। यह ऐसे समय में आया है जब देश में महिलाओं और बच्चों के खिलाफ यौन अपराधों के मामलों में न्याय में देरी एक गंभीर सामाजिक चिंता बनी हुई है।
आगे की राह
सरकार का मानना है कि योजना के इस विस्तार से पीड़ितों को समयबद्ध न्याय उपलब्ध कराने और लंबित मामलों के बोझ को कम करने में मदद मिलेगी। 2.45 लाख से अधिक लंबित मामलों को देखते हुए, अतिरिक्त जिलों को शामिल करना और अदालतों की संख्या 850 तक बढ़ाना इस दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।