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न्यायिक बुनियादी ढाँचे और ई-कोर्ट आधुनिकीकरण के लिए ₹2,010 करोड़ आवंटित, 775 फास्ट ट्रैक कोर्ट सक्रिय

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न्यायिक बुनियादी ढाँचे और ई-कोर्ट आधुनिकीकरण के लिए ₹2,010 करोड़ आवंटित, 775 फास्ट ट्रैक कोर्ट सक्रिय

सारांश

सरकार ने न्यायिक ढाँचे के लिए ₹810 करोड़ और ई-कोर्ट के तीसरे चरण के लिए ₹1,200 करोड़ — कुल ₹2,010 करोड़ — आवंटित किए हैं। 29 राज्यों में 775 फास्ट ट्रैक कोर्ट सक्रिय हैं, जिनमें 398 ई-पॉक्सो अदालतें शामिल हैं। यह कदम करोड़ों लंबित मामलों के बोझ तले दबी न्याय व्यवस्था को गति देने की कोशिश है।

मुख्य बातें

केंद्र सरकार ने न्यायिक बुनियादी ढाँचे और ई-कोर्ट आधुनिकीकरण के लिए कुल ₹2,010 करोड़ आवंटित किए।
जिला और अधीनस्थ न्यायालयों की आधारभूत सुविधाओं के लिए ₹810 करोड़ और ई-कोर्ट के तीसरे चरण के लिए ₹1,200 करोड़ निर्धारित।
30 अप्रैल 2026 तक 29 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में 775 फास्ट ट्रैक स्पेशल कोर्ट कार्यरत, जिनमें 398 ई-पॉक्सो अदालतें शामिल।
फास्ट ट्रैक कोर्ट योजना को अस्थायी रूप से 30 सितंबर 2026 तक बढ़ाया गया; मूल लक्ष्य 790 अदालतें था।
कानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने लोकसभा में स्वीकार किया कि मामलों का शीघ्र निपटारा केवल बजट पर नहीं, बल्कि जाँच गुणवत्ता, साक्ष्य और पक्षकारों की भागीदारी पर भी निर्भर है।

केंद्र सरकार ने देश की न्याय वितरण प्रणाली को सशक्त करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए ₹2,010 करोड़ का बजटीय प्रावधान किया है। इस राशि का उपयोग न्यायिक बुनियादी ढाँचे के विस्तार, अदालतों के डिजिटल रूपांतरण और न्यायिक क्षमता निर्माण कार्यक्रमों के लिए किया जाएगा। 26 जुलाई 2026 को लोकसभा में एक लिखित प्रश्न के उत्तर में केंद्रीय कानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने यह जानकारी साझा की।

आवंटन का विवरण

केंद्रीय बजट 2026 में जिला और अधीनस्थ न्यायालयों की आधारभूत सुविधाओं के विकास की केंद्रीय प्रायोजित योजना के अंतर्गत ₹810 करोड़ न्यायिक बुनियादी ढाँचे के लिए निर्धारित किए गए हैं। इसके अतिरिक्त, ई-कोर्ट परियोजना के तीसरे चरण के लिए ₹1,200 करोड़ का प्रावधान किया गया है, जो अदालतों के डिजिटल परिवर्तन के साथ-साथ न्यायिक अधिकारियों और कर्मचारियों के प्रशिक्षण पर खर्च होगी।

मामलों के निपटारे को प्रभावित करने वाले कारक

कानून मंत्री मेघवाल ने स्पष्ट किया कि बजटीय आवंटन मात्र से न्यायिक गति सुनिश्चित नहीं होती। उन्होंने कहा कि मामलों की जटिलता, जाँच की गुणवत्ता, साक्ष्यों की समय पर उपलब्धता, न्यायालय प्रक्रियाओं का अनुपालन, पक्षकारों की सक्रिय भागीदारी और वकीलों की पैरवी — ये सभी पहलू मामलों के शीघ्र निपटारे को प्रभावित करते हैं। यह स्वीकारोक्ति महत्वपूर्ण है क्योंकि यह केवल धन के प्रवाह से परे व्यापक सुधारों की आवश्यकता को रेखांकित करती है।

फास्ट ट्रैक स्पेशल कोर्ट की स्थिति

सरकार ने अक्टूबर 2019 में बलात्कार और बच्चों के विरुद्ध यौन अपराधों के लंबित मामलों के त्वरित निपटारे के लिए फास्ट ट्रैक स्पेशल कोर्ट की केंद्रीय प्रायोजित योजना शुरू की थी। इसमें पॉक्सो अधिनियम, 2012 के तहत दर्ज मामलों की सुनवाई के लिए विशेष ई-पॉक्सो अदालतें भी शामिल हैं। इस योजना को दो बार विस्तार दिया जा चुका है — अंतिम विस्तार 31 मार्च 2026 तक था, जिसे अब अस्थायी रूप से 30 सितंबर 2026 तक बढ़ा दिया गया है।

उच्च न्यायालयों से प्राप्त जानकारी के अनुसार, 30 अप्रैल 2026 तक देश के 29 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में कुल 775 फास्ट ट्रैक स्पेशल कोर्ट कार्यरत थीं, जिनमें 398 ई-पॉक्सो अदालतें भी सम्मिलित हैं। मूल लक्ष्य 790 अदालतें स्थापित करने का था।

आम नागरिकों पर असर

सरकार का मानना है कि न्यायिक बुनियादी ढाँचे का विस्तार, डिजिटलीकरण और विशेष अदालतों की संख्या में वृद्धि मिलकर न्याय वितरण प्रणाली को अधिक सुलभ, तेज और प्रभावी बनाएगी। यह ऐसे समय में आया है जब भारत की अदालतों में करोड़ों मामले लंबित हैं और न्याय में देरी एक गंभीर सामाजिक चिंता बनी हुई है।

आगे की राह

ई-कोर्ट परियोजना के तीसरे चरण के तहत डिजिटल अवसंरचना को और मजबूत किए जाने की उम्मीद है। राज्यों और न्यायपालिका के साथ समन्वय में चल रही इन पहलों की सफलता काफी हद तक राज्य सरकारों के सहयोग और ज़मीनी क्रियान्वयन पर निर्भर करेगी।

संपादकीय दृष्टिकोण

010 करोड़ का यह आवंटन स्वागतयोग्य है, लेकिन असली सवाल यह है कि क्रियान्वयन की रफ्तार बजट की रफ्तार से मेल खाएगी या नहीं — ई-कोर्ट के पहले दो चरण भी बड़े वादों के साथ आए थे, पर अदालतों में लंबित मामलों की संख्या करोड़ों में बनी रही। फास्ट ट्रैक कोर्ट योजना का बार-बार विस्तार — अब तीसरी बार — यह दर्शाता है कि लक्ष्य पूरे होने में संरचनात्मक बाधाएँ हैं जिन्हें धन से नहीं, नीतिगत सुधारों से दूर करना होगा। कानून मंत्री का यह स्वीकार करना कि मामलों का निपटारा 'कई अन्य कारकों' पर निर्भर है, असल में उस व्यापक सुधार की जरूरत को रेखांकित करता है जो अभी एजेंडे से गायब है।
RashtraPress
26 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

सरकार ने न्यायिक बुनियादी ढाँचे के लिए कितना बजट आवंटित किया है?
केंद्रीय बजट 2026 में न्यायिक बुनियादी ढाँचे के लिए कुल ₹2,010 करोड़ आवंटित किए गए हैं — जिसमें जिला और अधीनस्थ न्यायालयों के लिए ₹810 करोड़ और ई-कोर्ट परियोजना के तीसरे चरण के लिए ₹1,200 करोड़ शामिल हैं। यह जानकारी कानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने 26 जुलाई 2026 को लोकसभा में दी।
ई-कोर्ट परियोजना का तीसरा चरण क्या है?
ई-कोर्ट परियोजना का तीसरा चरण अदालतों के डिजिटल रूपांतरण की अगली कड़ी है, जिसके लिए ₹1,200 करोड़ निर्धारित किए गए हैं। इस राशि का उपयोग अदालती प्रक्रियाओं के डिजिटलीकरण के साथ-साथ न्यायिक अधिकारियों और कर्मचारियों के प्रशिक्षण और क्षमता निर्माण के लिए होगा।
भारत में कितनी फास्ट ट्रैक स्पेशल कोर्ट काम कर रही हैं?
30 अप्रैल 2026 तक देश के 29 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में 775 फास्ट ट्रैक स्पेशल कोर्ट कार्यरत हैं, जिनमें 398 विशेष ई-पॉक्सो अदालतें भी शामिल हैं। मूल लक्ष्य 790 अदालतें स्थापित करने का था।
फास्ट ट्रैक स्पेशल कोर्ट योजना को क्यों बढ़ाया गया?
अक्टूबर 2019 में शुरू हुई इस योजना को दो बार पहले ही बढ़ाया जा चुका है और इसका अंतिम विस्तार 31 मार्च 2026 तक था। लक्ष्यों की पूर्ण प्राप्ति न होने के कारण इसे अब अस्थायी रूप से 30 सितंबर 2026 तक और बढ़ा दिया गया है।
क्या बजट बढ़ने से अदालतों में लंबित मामले जल्दी निपटेंगे?
कानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल के अनुसार, मामलों का शीघ्र निपटारा केवल बजटीय प्रावधान पर नहीं, बल्कि मामलों की जटिलता, जाँच की गुणवत्ता, साक्ष्यों की उपलब्धता, न्यायालय प्रक्रियाओं के अनुपालन और वकीलों की पैरवी जैसे कई कारकों पर भी निर्भर करता है। इसलिए बजट वृद्धि एक आवश्यक, लेकिन पर्याप्त शर्त नहीं है।
राष्ट्र प्रेस
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