न्यायिक बुनियादी ढाँचे और ई-कोर्ट आधुनिकीकरण के लिए ₹2,010 करोड़ आवंटित, 775 फास्ट ट्रैक कोर्ट सक्रिय
सारांश
मुख्य बातें
केंद्र सरकार ने देश की न्याय वितरण प्रणाली को सशक्त करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए ₹2,010 करोड़ का बजटीय प्रावधान किया है। इस राशि का उपयोग न्यायिक बुनियादी ढाँचे के विस्तार, अदालतों के डिजिटल रूपांतरण और न्यायिक क्षमता निर्माण कार्यक्रमों के लिए किया जाएगा। 26 जुलाई 2026 को लोकसभा में एक लिखित प्रश्न के उत्तर में केंद्रीय कानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने यह जानकारी साझा की।
आवंटन का विवरण
केंद्रीय बजट 2026 में जिला और अधीनस्थ न्यायालयों की आधारभूत सुविधाओं के विकास की केंद्रीय प्रायोजित योजना के अंतर्गत ₹810 करोड़ न्यायिक बुनियादी ढाँचे के लिए निर्धारित किए गए हैं। इसके अतिरिक्त, ई-कोर्ट परियोजना के तीसरे चरण के लिए ₹1,200 करोड़ का प्रावधान किया गया है, जो अदालतों के डिजिटल परिवर्तन के साथ-साथ न्यायिक अधिकारियों और कर्मचारियों के प्रशिक्षण पर खर्च होगी।
मामलों के निपटारे को प्रभावित करने वाले कारक
कानून मंत्री मेघवाल ने स्पष्ट किया कि बजटीय आवंटन मात्र से न्यायिक गति सुनिश्चित नहीं होती। उन्होंने कहा कि मामलों की जटिलता, जाँच की गुणवत्ता, साक्ष्यों की समय पर उपलब्धता, न्यायालय प्रक्रियाओं का अनुपालन, पक्षकारों की सक्रिय भागीदारी और वकीलों की पैरवी — ये सभी पहलू मामलों के शीघ्र निपटारे को प्रभावित करते हैं। यह स्वीकारोक्ति महत्वपूर्ण है क्योंकि यह केवल धन के प्रवाह से परे व्यापक सुधारों की आवश्यकता को रेखांकित करती है।
फास्ट ट्रैक स्पेशल कोर्ट की स्थिति
सरकार ने अक्टूबर 2019 में बलात्कार और बच्चों के विरुद्ध यौन अपराधों के लंबित मामलों के त्वरित निपटारे के लिए फास्ट ट्रैक स्पेशल कोर्ट की केंद्रीय प्रायोजित योजना शुरू की थी। इसमें पॉक्सो अधिनियम, 2012 के तहत दर्ज मामलों की सुनवाई के लिए विशेष ई-पॉक्सो अदालतें भी शामिल हैं। इस योजना को दो बार विस्तार दिया जा चुका है — अंतिम विस्तार 31 मार्च 2026 तक था, जिसे अब अस्थायी रूप से 30 सितंबर 2026 तक बढ़ा दिया गया है।
उच्च न्यायालयों से प्राप्त जानकारी के अनुसार, 30 अप्रैल 2026 तक देश के 29 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में कुल 775 फास्ट ट्रैक स्पेशल कोर्ट कार्यरत थीं, जिनमें 398 ई-पॉक्सो अदालतें भी सम्मिलित हैं। मूल लक्ष्य 790 अदालतें स्थापित करने का था।
आम नागरिकों पर असर
सरकार का मानना है कि न्यायिक बुनियादी ढाँचे का विस्तार, डिजिटलीकरण और विशेष अदालतों की संख्या में वृद्धि मिलकर न्याय वितरण प्रणाली को अधिक सुलभ, तेज और प्रभावी बनाएगी। यह ऐसे समय में आया है जब भारत की अदालतों में करोड़ों मामले लंबित हैं और न्याय में देरी एक गंभीर सामाजिक चिंता बनी हुई है।
आगे की राह
ई-कोर्ट परियोजना के तीसरे चरण के तहत डिजिटल अवसंरचना को और मजबूत किए जाने की उम्मीद है। राज्यों और न्यायपालिका के साथ समन्वय में चल रही इन पहलों की सफलता काफी हद तक राज्य सरकारों के सहयोग और ज़मीनी क्रियान्वयन पर निर्भर करेगी।