ई-कोर्ट्स मिशन से न्याय की रफ्तार तीन गुना: 2014 के बाद 1.25 करोड़ केस ऑनलाइन, 753 करोड़ पन्ने डिजिटल
सारांश
मुख्य बातें
भारत की ई-कोर्ट्स मिशन मोड परियोजना ने देश की पारंपरिक कागज-आधारित न्यायिक व्यवस्था को एक डिजिटल, पारदर्शी और ट्रैक करने योग्य न्याय-वितरण प्रणाली में रूपांतरित कर दिया है। सरकारी फैक्टशीट के आँकड़ों के अनुसार, 2014 के बाद से मामलों की फाइलिंग और निपटान दोनों में लगभग तीन गुना वृद्धि दर्ज की गई है और अदालतें अब हर वर्ष दर्ज होने वाले मामलों से अधिक मामलों का निपटारा कर रही हैं। यह उपलब्धि एक अरब से अधिक नागरिकों की सेवा करने वाली न्यायपालिका के लिए ऐतिहासिक मानी जा रही है।
मुख्य घटनाक्रम: तीन चरणों में बदलाव
पहले चरण (2011–2015) में 14,000 से अधिक अदालतों को कंप्यूटराइज़ किया गया और प्रौद्योगिकी-आधारित न्यायिक सेवाओं के लिए ज़रूरी नेटवर्क अवसंरचना तैयार की गई। यह पूरे मिशन की नींव थी।
दूसरे चरण (2015–2023) में नागरिक-केंद्रित सेवाओं का विस्तार हुआ — नेशनल ज्यूडिशियल डेटा ग्रिड, ई-फाइलिंग और ई-सेवा केंद्र शुरू किए गए। इस चरण में वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग अवसंरचना को पाँच गुना से अधिक बढ़ाया गया, जिससे अदालती कार्यवाही तक वर्चुअल पहुँच में उल्लेखनीय सुधार आया।
परियोजना अब तीसरे चरण (2023–2027) में है। इसका लक्ष्य रिकॉर्ड का बड़े पैमाने पर डिजिटाइज़ेशन, वर्चुअल सुनवाई का अधिकतम उपयोग और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), एनालिटिक्स तथा ऑप्टिकल कैरेक्टर रिकग्निशन (OCR) जैसी अत्याधुनिक तकनीकों को अपनाकर पेपरलेस एवं स्मार्ट अदालतें बनाना है।
डिजिटाइज़ेशन और ई-फाइलिंग के आँकड़े
सरकार द्वारा शुक्रवार, 7 अगस्त को जारी फैक्टशीट के अनुसार, अदालती रिकॉर्ड के 753 करोड़ से अधिक पन्नों को डिजिटल रूप दिया जा चुका है। यह डिजिटाइज़ेशन न केवल मूल्यवान दस्तावेज़ों को भौतिक क्षति से सुरक्षित करता है, बल्कि उनकी खोज और शोध को भी कहीं अधिक तेज़ और कुशल बनाता है।
ई-फाइलिंग प्लेटफॉर्म के माध्यम से अब तक 1.25 करोड़ से अधिक केस ऑनलाइन दाखिल किए जा चुके हैं — और यह सुविधा जिला अदालतों, उच्च न्यायालयों और सर्वोच्च न्यायालय तीनों स्तरों पर उपलब्ध है। यह प्रणाली अंग्रेज़ी के साथ-साथ क्षेत्रीय भाषाओं को भी सपोर्ट करती है, जिससे न्याय व्यवस्था अधिक समावेशी बनी है। ई-पेमेंट सिस्टम के ज़रिए कोर्ट फीस के रूप में ₹1,404 करोड़ और जुर्माने के रूप में ₹75 करोड़ के लेन-देन प्रोसेस किए जा चुके हैं।
वर्चुअल सुनवाई और लाइव-स्ट्रीमिंग
अदालतों, जेलों और अस्पतालों समेत 7,553 स्थानों पर वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग की सुविधा उपलब्ध कराई गई है। देश भर की अदालतों में इस माध्यम से 4.18 करोड़ से अधिक रिमोट सुनवाई हो चुकी हैं। गौरतलब है कि 11 उच्च न्यायालयों में अदालती कार्यवाही की लाइव-स्ट्रीमिंग भी शुरू हो चुकी है, जो न्यायिक पारदर्शिता की दिशा में एक बड़ा कदम है।
ट्रैफिक चालान के ऑनलाइन निपटारे के लिए 31 वर्चुअल कोर्ट स्थापित किए गए हैं, जिन्हें अब तक 11.33 करोड़ चालान प्राप्त हुए हैं और इनकी कुल राशि ₹1,135.79 करोड़ है।
'न्याय श्रुति' और अंतर-संचालनीय आपराधिक न्याय प्रणाली
'इंटर-ऑपरेबल क्रिमिनल जस्टिस सिस्टम' के अंतर्गत 2024 में शुरू की गई 'न्याय श्रुति' सुविधा एक महत्वपूर्ण कदम है। इसके ज़रिए आरोपी, गवाह, पुलिस अधिकारी, सरकारी वकील, वैज्ञानिक विशेषज्ञ और कैदी — सभी वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से वर्चुअली पेश होकर गवाही दे सकते हैं। इससे समय और संसाधनों की बचत के साथ-साथ मामलों के निपटारे में तेज़ी आई है।
आम जनता पर असर और आगे की राह
यह ऐसे समय में आया है जब भारत में लंबित मामलों की संख्या न्यायिक सुधारों की सबसे बड़ी चुनौती रही है। हज़ारों ई-सेवा केंद्र डिजिटल खाई को पाटने में सहायक हो रहे हैं, ताकि जो नागरिक तकनीक से परिचित नहीं हैं, वे भी इन सेवाओं का लाभ उठा सकें। तीसरे चरण (2023–2027) के पूर्ण क्रियान्वयन के साथ, AI-संचालित केस प्रबंधन और OCR-आधारित रिकॉर्ड खोज प्रणाली से न्याय-वितरण और अधिक तेज़ होने की उम्मीद है।