4 नवंबर 2026
LIVE
Get it on Google Play Download on the App Store

दिल्ली सरकार की मंजूरी: सीजेपी की रत्ना सिंह पर जज-विरोधी पोस्ट को लेकर आपराधिक अवमानना कार्यवाही

शेयर करें:
ऑडियो वॉइस लोड हो रही है…
दिल्ली सरकार की मंजूरी: सीजेपी की रत्ना सिंह पर जज-विरोधी पोस्ट को लेकर आपराधिक अवमानना कार्यवाही

सारांश

दिल्ली सरकार ने सीजेपी की कानूनी प्रमुख रत्ना सिंह के खिलाफ आपराधिक अवमानना कार्यवाही की मंजूरी दी — साकेत कोर्ट के जज पर 'आका की सेवा' करने का आरोप लगाने वाली एक्स पोस्ट के बाद। अब दिल्ली उच्च न्यायालय इस पर स्वतंत्र रूप से विचार करेगा।

मुख्य बातें

दिल्ली सरकार के अतिरिक्त स्थायी वकील अमोल सिन्हा ने सीजेपी की कानूनी प्रमुख रत्ना सिंह के खिलाफ आपराधिक अवमानना कार्यवाही की अनुमति दी।
मंजूरी न्यायालय अवमानना अधिनियम, 1971 की धारा 15(2) के तहत दी गई है।
रत्ना सिंह पर साकेत कोर्ट के न्यायिक मजिस्ट्रेट के खिलाफ एक्स पर 'आका की सेवा' जैसी आपत्तिजनक टिप्पणियाँ करने का आरोप है।
अधिवक्ता कौशिक चटर्जी ने यह कार्यवाही शुरू करने का अनुरोध किया था।
सरकारी वकील ने स्पष्ट किया कि यह प्रथम दृष्टया मंजूरी है; अंतिम निर्णय दिल्ली उच्च न्यायालय करेगा।

दिल्ली सरकार के अतिरिक्त स्थायी वकील (आपराधिक) अमोल सिन्हा ने 4 नवंबर 2026 को 'कॉकरोच जनता पार्टी' (सीजेपी) की कानूनी मामलों की प्रमुख रत्ना सिंह के खिलाफ आपराधिक अवमानना कार्यवाही शुरू करने की अनुमति प्रदान कर दी। यह मंजूरी न्यायालय अवमानना अधिनियम, 1971 की धारा 15(2) के तहत दी गई है, जो साकेत कोर्ट के एक न्यायिक मजिस्ट्रेट के खिलाफ सोशल मीडिया पर की गई टिप्पणियों से संबंधित है।

मामले की पृष्ठभूमि

अधिवक्ता कौशिक चटर्जी ने रत्ना सिंह के खिलाफ आपराधिक अवमानना कार्यवाही शुरू करने का अनुरोध किया था। यह शिकायत एक्स (पूर्व में ट्विटर) पर की गई उन पोस्टों पर आधारित है, जिनमें रत्ना सिंह ने साकेत कोर्ट के न्यायिक मजिस्ट्रेट पर गंभीर आरोप लगाए थे।

प्रश्नगत पोस्टों को प्रथम दृष्टया न्यायालय अवमानना के दायरे में माना गया है, जिसके आधार पर सहमति प्रदान की गई।

रत्ना सिंह की विवादास्पद पोस्ट

रत्ना सिंह ने एक्स पर लिखा था: 'जज अपने आका की सेवा कर रहे हैं। पूरी सुनवाई के दौरान वे 4 बार ब्रेक/मीटिंग के लिए गए। बिना किसी कानूनी आधार के आदेश दिया गया।'

एक अन्य पोस्ट में उन्होंने कथित तौर पर लिखा: 'दिल्ली पुलिस अपने आका के आदेश का पालन कर रही है। जज भी अपने आका के आदेश का पालन कर रहे हैं।' इन पोस्टों में न्यायिक अधिकारी पर बाहरी दबाव या गलत इरादों का आरोप लगाया गया, जिसे अधिकारियों ने न्यायपालिका की गरिमा के प्रतिकूल माना।

सरकारी वकील का विधिक विश्लेषण

अतिरिक्त स्थायी वकील अमोल सिन्हा ने अपने जवाब में कहा कि न्यायिक आदेशों की निष्पक्ष आलोचना की जा सकती है — यह बात सर्वोच्च न्यायालय ने 'पी.एन. दुदा बनाम वी.पी. शिव शंकर' (1988) मामले में भी स्वीकार की है। उन्होंने कहा कि असंतुष्ट पक्ष कानूनी विकल्पों के जरिए फैसले को चुनौती दे सकता है।

हालांकि, सिन्हा ने स्पष्ट किया कि 'किसी न्यायिक फैसले की शुद्धता पर सवाल उठाने और उस फैसले को देने वाले न्यायिक अधिकारी पर बाहरी दबाव या गलत इरादों का आरोप लगाने के बीच एक स्पष्ट अंतर है।' उनके अनुसार, रत्ना सिंह की पोस्टें इसी दूसरी और अस्वीकार्य श्रेणी में आती हैं।

आगे की कानूनी प्रक्रिया

सरकारी वकील ने यह भी स्पष्ट किया कि यह मंजूरी केवल प्रथम दृष्टया आरोपों तक सीमित है और इसे आपराधिक अवमानना का अंतिम निर्णय नहीं माना जाना चाहिए। दिल्ली उच्च न्यायालय इस पर स्वतंत्र रूप से विचार करेगा।

गौरतलब है कि यह मामला ऐसे समय में सामने आया है जब सोशल मीडिया पर न्यायिक टिप्पणियों की सीमाओं पर राष्ट्रीय स्तर पर बहस जारी है। आने वाले दिनों में उच्च न्यायालय की सुनवाई इस विवाद की दिशा तय करेगी।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन न्यायिक अधिकारी पर 'बाहरी आका' का आरोप लगाना उस रेखा को पार करना है — और यही इस मामले का केंद्रीय सवाल है। एक्स जैसे प्लेटफॉर्म पर सार्वजनिक रूप से की गई ऐसी टिप्पणियाँ, जो व्यापक दर्शकों तक पहुँचती हैं, न्यायालय की संस्थागत विश्वसनीयता पर असर डाल सकती हैं। उच्च न्यायालय का फैसला यह तय करेगा कि आलोचना और अवमानना के बीच की विभाजन रेखा डिजिटल युग में कहाँ खींची जाएगी।
RashtraPress
4 नवंबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

रत्ना सिंह के खिलाफ आपराधिक अवमानना कार्यवाही क्यों शुरू की गई?
रत्ना सिंह ने एक्स पर साकेत कोर्ट के न्यायिक मजिस्ट्रेट के खिलाफ पोस्ट कर उन पर 'आका की सेवा' करने और बाहरी निर्देशों पर काम करने का आरोप लगाया था। इन टिप्पणियों को प्रथम दृष्टया न्यायालय अवमानना माना गया, जिसके बाद दिल्ली सरकार ने कार्यवाही की मंजूरी दी।
न्यायालय अवमानना अधिनियम, 1971 की धारा 15(2) क्या है?
न्यायालय अवमानना अधिनियम, 1971 की धारा 15(2) के तहत उच्च न्यायालय आपराधिक अवमानना की कार्यवाही तब शुरू कर सकता है जब राज्य सरकार या महाधिवक्ता की लिखित सहमति मिले। इस धारा का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि अवमानना के गंभीर मामलों में उचित प्राधिकरण की मंजूरी के बाद ही कार्यवाही हो।
क्या न्यायाधीशों की आलोचना करना कानूनी है?
हाँ, सर्वोच्च न्यायालय ने 'पी.एन. दुदा बनाम वी.पी. शिव शंकर' (1988) मामले में माना है कि न्यायिक कामकाज की निष्पक्ष आलोचना की जा सकती है। हालांकि, न्यायिक अधिकारी पर बाहरी दबाव या गलत इरादों का आरोप लगाना अवमानना के दायरे में आ सकता है — यही अंतर इस मामले में निर्णायक है।
इस मामले में आगे क्या होगा?
दिल्ली सरकार की मंजूरी मिलने के बाद अब दिल्ली उच्च न्यायालय इस मामले पर स्वतंत्र रूप से विचार करेगा। सरकारी वकील ने स्पष्ट किया है कि यह मंजूरी केवल प्रथम दृष्टया प्रकृति की है और अंतिम निर्णय उच्च न्यायालय का होगा।
सीजेपी (कॉकरोच जनता पार्टी) क्या है?
सीजेपी यानी 'कॉकरोच जनता पार्टी' एक संगठन है, जिसकी कानूनी मामलों की प्रमुख रत्ना सिंह हैं। इस मामले में उनकी एक्स पोस्ट के आधार पर आपराधिक अवमानना कार्यवाही शुरू की गई है।
राष्ट्र प्रेस
सिलसिला

जुड़े बिंदु

इस ख़बर के पीछे की कड़ियाँ — सबसे नई पहले।

8 बिंदु
  1. नवीनतम 2 सप्ताह पहले
  2. 2 सप्ताह पहले
  3. 3 सप्ताह पहले
  4. 3 सप्ताह पहले
  5. 3 महीने पहले
  6. 5 महीने पहले
  7. 5 महीने पहले
  8. 5 महीने पहले