यूपी के पूर्व डीजीपी विक्रम सिंह और एके जैन ने सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का समर्थन किया, हिंसक तत्वों पर सख्त कार्रवाई की वकालत
सारांश
मुख्य बातें
उत्तर प्रदेश के दो पूर्व पुलिस महानिदेशकों (डीजीपी) — विक्रम सिंह और एके जैन — ने 28 जुलाई 2026 को सीजेपी (कॉकरोच जनता पार्टी) के प्रदर्शन और पुलिस कार्रवाई को लेकर सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिए गए हालिया निर्देशों का खुलकर समर्थन किया। दोनों वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों ने स्पष्ट किया कि शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन संविधान प्रदत्त लोकतांत्रिक अधिकार है, किंतु हिंसा, कानून-व्यवस्था को भंग करने और आपराधिक गतिविधियों में लिप्त तत्वों को किसी भी परिस्थिति में छूट नहीं दी जा सकती।
विक्रम सिंह का बयान: कानून से ऊपर कोई नहीं
नोएडा में पूर्व डीजीपी विक्रम सिंह ने कहा कि सर्वोच्च न्यायालय ने अपने आदेश में यह स्पष्ट कर दिया है कि हिंसा में संलिप्त या आपराधिक गतिविधियों में शामिल लोगों के प्रति दोहरा मापदंड नहीं अपनाया जाएगा और न ही उन्हें किसी प्रकार का संरक्षण मिलेगा। उन्होंने कहा, 'न्यायालय का यह निर्देश कानून के शासन को मजबूत करने वाला है।'
विक्रम सिंह ने सीजेपी की उस कथित प्रतिक्रिया पर कड़ी आपत्ति जताई, जिसमें कहा गया था कि यदि प्रशासनिक आदेश के माध्यम से सभी मामले वापस नहीं लिए गए तो पुनः धरना दिया जाएगा। उन्होंने इसे सर्वोच्च न्यायालय की अवमानना करार देते हुए कहा कि इस प्रकार की भाषा यह संकेत देती है कि कुछ लोग स्वयं को कानून से ऊपर समझते हैं। उनके अनुसार, लोकतंत्र में सर्वोच्च न्यायालय के आदेश सभी के लिए बाध्यकारी हैं और यदि किसी पक्ष को अदालत का निर्णय अस्वीकार्य है, तो उसके पास पुनर्विचार याचिका या अन्य वैधानिक उपाय उपलब्ध हैं — सड़कों पर उतरकर दबाव बनाना उचित नहीं है।
उन्होंने शासन-प्रशासन और पुलिस से भी अपील की कि वे हर संभावित परिस्थिति के लिए तैयार रहें, लेकिन कानून-व्यवस्था बनाए रखते हुए संयम बरतें और अनावश्यक बल प्रयोग से बचें, क्योंकि पुलिस जनता की शत्रु नहीं है।
एके जैन का बयान: आपराधिक तत्वों को राहत देना खतरनाक
लखनऊ में पूर्व डीजीपी एके जैन ने सर्वोच्च न्यायालय की उस टिप्पणी का स्वागत किया जिसमें अदालत ने कहा कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन संविधान प्रदत्त अधिकार है और अत्यधिक बल प्रयोग के मामलों में कार्रवाई होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि अदालत का निर्णय संतुलित और सुविचारित है।
एके जैन ने चेतावनी दी कि यदि प्रदर्शन की आड़ में शामिल आपराधिक तत्वों को बिना जाँच के राहत दे दी जाती है, तो इससे भविष्य में गलत संदेश जाएगा। उनके अनुसार, हत्या, दुष्कर्म, नारकोटिक्स जैसे गंभीर मामलों में आरोपी या हिस्ट्रीशीटर यदि प्रदर्शनों में शामिल होकर हिंसा फैलाते हैं और उनके विरुद्ध कार्रवाई नहीं होती, तो इससे असामाजिक तत्वों का मनोबल बढ़ेगा।
फेशियल रिकग्निशन और आपराधिक तत्वों की पहचान
पूर्व डीजीपी एके जैन ने दावा किया कि फेशियल रिकग्निशन सिस्टम के आधार पर दिल्ली पुलिस की रिपोर्ट में लगभग 2,800 ऐसे लोगों की पहचान की गई है, जो विभिन्न आपराधिक मामलों में आरोपी या हिस्ट्रीशीटर बताए गए हैं। उन्होंने इसे गंभीर जाँच का विषय बताते हुए सवाल उठाया कि लंबे समय तक शांतिपूर्ण ढंग से चलता छात्र आंदोलन अचानक हिंसक कैसे हो गया और उसमें ऐसे तत्व कैसे घुस गए।
सख्त कार्रवाई और भविष्य की नजीर
दोनों पूर्व डीजीपी ने एकमत होकर कहा कि यदि किसी आंदोलन में बाहरी आपराधिक तत्व घुसकर पथराव, हिंसा और कानून-व्यवस्था को प्रभावित करते हैं, तो उनके विरुद्ध कठोर कार्रवाई की जानी चाहिए ताकि भविष्य के लिए एक स्पष्ट नजीर स्थापित हो सके। यह ऐसे समय में आया है जब देशभर में प्रदर्शनों के दौरान पुलिस की भूमिका और न्यायिक निगरानी को लेकर व्यापक बहस छिड़ी हुई है। गौरतलब है कि सर्वोच्च न्यायालय ने अपने हालिया निर्देशों में दोनों पक्षों — प्रदर्शनकारियों के अधिकार और कानून-व्यवस्था की जिम्मेदारी — को संतुलित करने का प्रयास किया है।
विशेषज्ञों के अनुसार, इस प्रकरण से यह स्पष्ट संदेश जाना चाहिए कि लोकतांत्रिक विरोध के नाम पर हिंसा और अराजकता को किसी भी स्थिति में स्वीकार नहीं किया जाएगा।