राज्यसभा में केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों के अधिकारियों की सेवा शर्तों पर महत्वपूर्ण चर्चा
सारांश
Key Takeaways
- सेवा शर्तों पर गंभीर चर्चा हुई।
- अधिकारियों को न्यायालय का सहारा लेना पड़ रहा है।
- पदोन्नति में असमानता की समस्या है।
- बड़े बलों की भूमिका और कार्यक्षमता पर असर।
- सरकार से उचित समाधान की मांग।
नई दिल्ली, 30 मार्च (राष्ट्र प्रेस)। राज्यसभा में केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों के अधिकारियों एवं जवानों की सेवा शर्तों पर गहन चर्चा हुई। समाजवादी पार्टी के सांसद रामगोपाल यादव ने कहा कि स्थिति इतनी गंभीर हो गई है कि कॉन्स्टेबल से लेकर वरिष्ठ अधिकारियों तक को न्याय पाने के लिए अदालतों का सहारा लेना पड़ रहा है।
उन्होंने प्रश्न उठाया कि एक अनुशासित बल के कर्मियों को आखिर क्यों न्यायालय का रास्ता अपनाना पड़ा। उन्होंने इसके पीछे सरकार द्वारा उनकी समस्याओं पर ध्यान न देने और सेवा शर्तों में मौजूद कई विसंगतियों को जिम्मेदार ठहराया। रामगोपाल यादव उस समय राज्यसभा में केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल (सामान्य प्रशासन) विधेयक पर चर्चा कर रहे थे।
उन्होंने बताया कि पदोन्नति की प्रक्रिया में बड़ी असमानता है। प्रतियोगी परीक्षा से चयनित सहायक कमांडेंट अधिकारी कई वर्षों तक पदोन्नति से वंचित रह जाते हैं। कई अधिकारी पंद्रह से बीस वर्षों तक भी आगे नहीं बढ़ पाते, जिससे उनमें गहरी निराशा उत्पन्न होती है और कई लोग समय से पहले सेवा छोड़ने के लिए मजबूर हो जाते हैं।
सपा सांसद ने कहा कि यह स्थिति न केवल उनके मनोबल को प्रभावित करती है, बल्कि पूरे बल की कार्यक्षमता पर भी नकारात्मक असर डालती है। उन्होंने विभिन्न बलों की भूमिका का उल्लेख करते हुए कहा कि बॉर्डर सिक्योरिटी फोर्स सीमाओं की रक्षा करती है, सेंट्रल रिजर्व पुलिस फोर्स आंतरिक सुरक्षा संभालती है, इंडो तिब्बतन बॉर्डर पुलिस कठिन हिमालयी क्षेत्रों में तैनात रहती है, सशस्त्र सीमा बल सीमावर्ती क्षेत्रों की सुरक्षा करता है और सेंट्रल इंडस्ट्रियल सिक्योरिटी फोर्स महत्वपूर्ण संस्थानों एवं हवाई अड्डों की सुरक्षा करता है।
उन्होंने कहा कि यही बल देश की सुरक्षा के लिए अपनी जान तक न्यौछावर करते हैं, लेकिन उनके साथ न्याय नहीं हो रहा है। बहस के दौरान उन्होंने सरकार द्वारा लाए गए विधेयक पर भी सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि उच्च पदों पर मुख्य रूप से इंडियन पुलिस सर्विस (आईपीएस) अधिकारियों का वर्चस्व बना रहेगा, जिससे इन बलों के अधिकारियों के लिए अवसर सीमित हो जाएंगे। इससे उनके सम्मान और मनोबल दोनों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।
उन्होंने कहा कि इन बलों में नीचे से लेकर ऊपर तक असंतोष बढ़ रहा है। यदि समय रहते इस पर ध्यान नहीं दिया गया तो इसके गंभीर परिणाम सामने आ सकते हैं, क्योंकि यही जवान देश की सुरक्षा के लिए सबसे आगे खड़े रहते हैं और संकट की स्थिति में अपनी जान जोखिम में डालते हैं। अपने वक्तव्य के अंत में उन्होंने सरकार से आग्रह किया कि इस विषय पर गंभीरता से विचार किया जाए। मौजूदा विधेयक पर पुनर्विचार किया जाए और आवश्यक होने पर इसे पुन: परीक्षण के लिए भेजा जाए। साथ ही, उन्होंने कहा कि देश की सर्वोच्च अदालत के निर्देशों का सम्मान करते हुए ऐसा समाधान निकाला जाना चाहिए, जिससे इन बलों के कर्मियों को न्याय मिल सके और देश की सुरक्षा व्यवस्था और अधिक सुदृढ़ हो सके।