चाबहार बंदरगाह भारत-ईरान सहयोग का 'सुनहरा द्वार': ईरानी विदेश मंत्री अराघची

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चाबहार बंदरगाह भारत-ईरान सहयोग का 'सुनहरा द्वार': ईरानी विदेश मंत्री अराघची

सारांश

ब्रिक्स बैठक के बाद नई दिल्ली में ईरानी विदेश मंत्री अराघची ने चाबहार को मध्य एशिया और यूरोप का 'सुनहरा द्वार' करार दिया और भारत से काम जारी रखने की अपील की। अमेरिकी प्रतिबंधों ने विकास धीमा किया है, लेकिन दोनों देशों का दस वर्षीय समझौता और 25 करोड़ डॉलर की प्रतिबद्धता इस रणनीतिक परियोजना को जीवंत रखती है।

मुख्य बातें

ईरानी विदेश मंत्री सैयद अब्बास अराघची ने 15 मई 2026 को नई दिल्ली में चाबहार बंदरगाह को भारत-ईरान सहयोग का प्रतीक और मध्य एशिया व यूरोप का 'सुनहरा द्वार' बताया।
अमेरिकी प्रतिबंधों के कारण बंदरगाह विकास की गति धीमी; IFCA के तहत संचालन पक्षों पर प्रतिबंध का खतरा।
भारत और ईरान के बीच दस वर्षीय संचालन समझौता लागू; भारत ने 25 करोड़ डॉलर की ऋण सुविधा की प्रतिबद्धता जताई है।
चाबहार को ईरान के रेलवे नेटवर्क से जोड़ने के लिए 700 किलोमीटर लंबी रेल लाइन बनाकर ज़ाहेदान से जोड़ने की योजना।
अराघची ने कहा कि भारत फारस की खाड़ी के सभी देशों का मित्र है और क्षेत्रीय शांति व कूटनीति में बड़ी भूमिका निभा सकता है।

ईरान के विदेश मंत्री सैयद अब्बास अराघची ने शुक्रवार, 15 मई 2026 को नई दिल्ली में कहा कि चाबहार बंदरगाह भारत और ईरान के बीच रणनीतिक सहयोग का जीवंत प्रतीक है और यह मध्य एशिया, काकेशस तथा यूरोप तक पहुँच का 'सुनहरा द्वार' बनेगा। उन्होंने विश्वास जताया कि भारत इस बंदरगाह पर अपना काम जारी रखेगा, भले ही अमेरिकी प्रतिबंधों के कारण विकास की गति कुछ धीमी हुई है।

मुख्य घटनाक्रम

नई दिल्ली में आयोजित ब्रिक्स विदेश मंत्रियों की बैठक के बाद मीडिया से बातचीत में अराघची ने कहा, 'चाबहार बंदरगाह भारत और ईरान के सहयोग का एक प्रतीक है और हमें खुशी है कि इसके विकास में भारतीयों ने अहम भूमिका निभाई है। यह अभी अमेरिका के प्रतिबंधों की वजह से थोड़ा धीमा हो गया है, लेकिन मुझे पूरा विश्वास है कि यह बंदरगाह भारत के लिए मध्य एशिया, काकेशस और आगे यूरोप तक पहुँच का एक सुनहरा द्वार बनेगा।'

उन्होंने यह भी जोड़ा, 'यह एक बहुत ही रणनीतिक बंदरगाह है, जो हमारे लिए, भारत के लिए और कई अन्य देशों के लिए महत्वपूर्ण है। मेरा मानना है कि भारत अपनी अच्छी छवि के साथ इस क्षेत्र में शांति, कूटनीति और सुरक्षा को बढ़ावा देने में बड़ी भूमिका निभा सकता है।'

अमेरिकी प्रतिबंधों का असर

गौरतलब है कि पिछले सितंबर में भारत के विदेश मंत्रालय (MEA) ने कहा था कि वह अमेरिका के उस फैसले के प्रभाव की समीक्षा कर रहा है, जिसमें चाबहार परियोजना से जुड़ी प्रतिबंध छूट समाप्त करने की बात कही गई थी। अमेरिका ने 2018 में दी गई इस छूट को वापस लेने की घोषणा की थी। अमेरिकी विदेश विभाग के अनुसार, इस निर्णय के बाद बंदरगाह संचालन से जुड़े पक्षों पर 'ईरान फ्रीडम एंड काउंटर-प्रोलिफरेशन एक्ट' (IFCA) के तहत प्रतिबंध लग सकते हैं।

भारत-ईरान का दीर्घकालिक समझौता

भारत और ईरान ने चाबहार बंदरगाह के संचालन के लिए दस वर्षीय समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं। इस करार के अंतर्गत भारत ने बंदरगाह के बुनियादी ढाँचे के विकास हेतु 25 करोड़ डॉलर की ऋण सुविधा देने की प्रतिबद्धता जताई है। यह ऐसे समय में आया है जब भारत अपनी कनेक्टिविटी रणनीति में मध्य एशिया को केंद्रीय स्थान दे रहा है।

रेल संपर्क की योजना

इसके अतिरिक्त, भारत और ईरान मिलकर चाबहार बंदरगाह को ईरान के रेलवे नेटवर्क से जोड़ने की योजना पर काम कर रहे हैं। इसके लिए करीब 700 किलोमीटर लंबी रेल लाइन बनाकर इसे ज़ाहेदान शहर से जोड़ा जाएगा, जो अफगानिस्तान और मध्य एशिया के लिए एक महत्वपूर्ण प्रवेश बिंदु है।

क्षेत्रीय महत्व और भारत की भूमिका

अराघची ने यह भी रेखांकित किया कि भारत फारस की खाड़ी के लगभग सभी देशों — चाहे वे खाड़ी के उत्तर में हों या दक्षिण में — का मित्र है। उन्होंने कहा कि ईरान इस क्षेत्र में भारत की किसी भी सकारात्मक और रचनात्मक भूमिका की सराहना करता है। चाबहार के पूर्ण विकास से न केवल भारत, बल्कि यूरोप और मध्य एशिया को भी हिंद महासागर तक वैकल्पिक पहुँच मिलेगी।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन ज़मीनी हकीकत अधिक जटिल है — अमेरिकी IFCA प्रतिबंधों की वापसी के बाद भारत की निजी कंपनियाँ और वित्तीय संस्थाएँ चाबहार से जुड़े लेनदेन को लेकर सतर्क हो गई हैं। भारत के लिए यह परियोजना पाकिस्तान को दरकिनार कर अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक पहुँचने का एकमात्र व्यावहारिक विकल्प है — इसलिए रणनीतिक दाँव बहुत ऊँचे हैं। विडंबना यह है कि जिस परियोजना को अमेरिका ने कभी पाकिस्तान के विकल्प के रूप में प्रोत्साहित किया था, उसी पर अब वाशिंगटन का दबाव सबसे अधिक है। बिना स्पष्ट प्रतिबंध-छूट के भारत की 'काम जारी रखने' की क्षमता सीमित रहेगी, और अराघची की उम्मीदें नई दिल्ली की राजनयिक कुशलता पर उतनी ही निर्भर हैं जितनी उसकी रणनीतिक इच्छाशक्ति पर।
RashtraPress
15 मई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

चाबहार बंदरगाह को 'सुनहरा द्वार' क्यों कहा जा रहा है?
ईरानी विदेश मंत्री अराघची के अनुसार, चाबहार बंदरगाह भारत को पाकिस्तान को दरकिनार करते हुए मध्य एशिया, काकेशस और यूरोप तक सीधी पहुँच देता है। साथ ही यूरोप और मध्य एशिया के लिए यह हिंद महासागर तक पहुँचने का वैकल्पिक मार्ग भी बनता है।
अमेरिकी प्रतिबंधों से चाबहार परियोजना पर क्या असर पड़ा है?
अमेरिका ने 2018 में दी गई प्रतिबंध छूट वापस ले ली है, जिससे बंदरगाह विकास की गति धीमी पड़ गई है। अमेरिकी विदेश विभाग के अनुसार, IFCA के तहत बंदरगाह संचालन से जुड़े पक्षों पर प्रतिबंध लग सकते हैं। भारत के विदेश मंत्रालय ने कहा था कि वह इस फैसले के प्रभाव की समीक्षा कर रहा है।
भारत और ईरान के बीच चाबहार को लेकर क्या समझौता है?
दोनों देशों ने चाबहार बंदरगाह के संचालन के लिए दस वर्षीय समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं। इसके तहत भारत ने बुनियादी ढाँचे के विकास के लिए 25 करोड़ डॉलर की ऋण सुविधा देने की प्रतिबद्धता जताई है।
चाबहार को रेलवे से जोड़ने की क्या योजना है?
भारत और ईरान चाबहार बंदरगाह को ईरान के रेलवे नेटवर्क से जोड़ने की योजना पर काम कर रहे हैं। इसके लिए करीब 700 किलोमीटर लंबी रेल लाइन बनाकर इसे ज़ाहेदान शहर से जोड़ा जाएगा, जो अफगानिस्तान सीमा के निकट है।
चाबहार बंदरगाह भारत के लिए रणनीतिक रूप से क्यों महत्वपूर्ण है?
चाबहार भारत को पाकिस्तान की भूमि सीमा से बचते हुए अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक व्यापार व पारगमन का सीधा मार्ग देता है। यह भारत की 'कनेक्ट सेंट्रल एशिया' नीति का केंद्रीय स्तंभ है और चीन के ग्वादर बंदरगाह के मुकाबले एक रणनीतिक विकल्प भी।
राष्ट्र प्रेस
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