16 जुलाई 2026
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रांची में भगवान जगन्नाथ की 335वीं रथयात्रा: जगन्नाथपुर से उमड़ा लाखों श्रद्धालुओं का जनसैलाब

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रांची में भगवान जगन्नाथ की 335वीं रथयात्रा: जगन्नाथपुर से उमड़ा लाखों श्रद्धालुओं का जनसैलाब

सारांश

रांची की 335 साल पुरानी रथयात्रा सिर्फ आस्था का उत्सव नहीं — यह झारखंड की सामासिक संस्कृति का जीवंत दस्तावेज़ है। 1691 में नागवंशी शासक ऐनीनाथ शाहदेव द्वारा स्थापित यह परंपरा आज लाखों श्रद्धालुओं और मुख्यमंत्री की उपस्थिति के साथ राज्य की साझा विरासत का प्रतीक बन चुकी है।

मुख्य बातें

16 जुलाई 2026 को रांची के जगन्नाथपुर मंदिर से भगवान जगन्नाथ की 335वीं ऐतिहासिक रथयात्रा निकाली गई।
भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा के विग्रहों को भव्य रथ पर मौसीबाड़ी तक ले जाया गया; नौ दिनों तक वहाँ दर्शन होंगे।
झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन आयोजन में शामिल हुए और सामाजिक समरसता का संदेश दिया।
रथयात्रा की शुरुआत वर्ष 1691 में नागवंशी शासक ऐनीनाथ शाहदेव ने की थी — यह देश की सबसे पुरानी रथयात्राओं में से एक है।
नौ दिवसीय मेले में झारखंड सहित पड़ोसी राज्यों से भी बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं के आने की उम्मीद है।

रांची के जगन्नाथपुर मंदिर से 16 जुलाई 2026 को भगवान जगन्नाथ की 335वीं ऐतिहासिक रथयात्रा श्रद्धा और सामाजिक समरसता के भव्य वातावरण में निकाली गई। 'जय जगन्नाथ' के उद्घोष, शंखनाद और भक्ति-गीतों के बीच भगवान जगन्नाथ, बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा के विग्रहों को भव्य रथ पर विराजमान कर मौसीबाड़ी के लिए रवाना किया गया। पारंपरिक पूजा-अर्चना और विशेष अनुष्ठानों के बाद आरंभ हुई इस यात्रा में लाखों श्रद्धालु सम्मिलित हुए।

मुख्य घटनाक्रम

रथयात्रा शुरू होते ही श्रद्धालुओं का उत्साह चरम पर पहुँच गया। हज़ारों भक्तों ने रथ की रस्सियाँ थामकर उसे जगन्नाथपुर मंदिर से लगभग आधा किलोमीटर दूर स्थित मौसीबाड़ी तक खींचा। रथ खींचने की इस परंपरा को श्रद्धालु विशेष पुण्य का कार्य मानते हैं। भगवान जगन्नाथ अब नौ दिनों तक मौसीबाड़ी में भक्तों को दर्शन देंगे, जिसके पश्चात घुरती रथयात्रा के साथ उनकी मुख्य मंदिर में वापसी होगी।

मुख्यमंत्री की भागीदारी

झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन भी इस आयोजन में सम्मिलित हुए। उन्होंने अपने संदेश में कहा कि महाप्रभु श्री जगन्नाथ, भगवान बलभद्र और माता सुभद्रा की कृपा सभी के जीवन में सुख, शांति, समृद्धि और उत्तम स्वास्थ्य का संचार करे। सोरेन ने यह भी कहा कि रथयात्रा सेवा, समरसता, आस्था और मानवता के मार्ग पर आगे बढ़ने की प्रेरणा देती है।

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

रांची की रथयात्रा देश की सबसे पुरानी रथयात्राओं में गिनी जाती है। इसकी नींव वर्ष 1691 में नागवंशी शासक ऐनीनाथ शाहदेव ने रखी थी। पुरी के श्री जगन्नाथ मंदिर से प्रेरित होकर उन्होंने जगन्नाथपुर पहाड़ी पर मंदिर का निर्माण कराया और उसी परंपरा के अनुरूप यहाँ रथयात्रा का आरंभ किया। गौरतलब है कि जगन्नाथपुर मंदिर की वास्तुकला और पूजा-पद्धति पुरी के जगन्नाथ मंदिर से काफ़ी हद तक मेल खाती है — यहाँ भी भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा की काष्ठ निर्मित प्रतिमाओं की पारंपरिक विधि से पूजा की जाती है।

सामाजिक समरसता की मिसाल

इस आयोजन की सबसे बड़ी विशेषता इसकी सामाजिक समरसता है। वर्षों से विभिन्न जातियों और समुदायों के लोग मंदिर और रथयात्रा की व्यवस्थाओं में अपनी पारंपरिक ज़िम्मेदारियाँ निभाते आ रहे हैं। यही परंपरा रांची की रथयात्रा को केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि झारखंड की साझा सांस्कृतिक विरासत और सामाजिक सौहार्द का प्रतीक बनाती है।

आगे क्या

रथयात्रा के साथ शुरू हुए नौ दिवसीय मेले में झारखंड सहित पड़ोसी राज्यों से भी बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं के पहुँचने की उम्मीद है। घुरती रथयात्रा के साथ भगवान जगन्नाथ की मुख्य मंदिर में वापसी इस उत्सव का समापन-बिंदु होगा, जो झारखंड की धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान को एक बार फिर रेखांकित करेगा।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन मुख्यधारा की कवरेज अक्सर इसकी सामाजिक संरचना की गहराई को नज़रअंदाज़ कर देती है — विभिन्न जातियों और समुदायों का पारंपरिक ज़िम्मेदारियों के साथ एकजुट होना झारखंड की बहुलतावादी पहचान का प्रमाण है। यह आयोजन राज्य की राजनीतिक सत्ता के लिए भी प्रतीकात्मक महत्त्व रखता है, जैसा कि मुख्यमंत्री की उपस्थिति से स्पष्ट है। असली प्रश्न यह है कि क्या यह सांस्कृतिक समरसता रोज़मर्रा के सामाजिक जीवन में भी उतनी ही मज़बूत है — उत्सव के बाहर भी।
RashtraPress
16 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

रांची की रथयात्रा कितनी पुरानी है और इसकी शुरुआत कैसे हुई?
रांची की रथयात्रा वर्ष 1691 में शुरू हुई थी, जब नागवंशी शासक ऐनीनाथ शाहदेव ने पुरी के श्री जगन्नाथ मंदिर से प्रेरित होकर जगन्नाथपुर पहाड़ी पर मंदिर का निर्माण कराया और रथयात्रा की परंपरा आरंभ की। यह देश की सबसे पुरानी रथयात्राओं में गिनी जाती है।
2026 की रांची रथयात्रा में क्या विशेष रहा?
16 जुलाई 2026 को निकली 335वीं रथयात्रा में लाखों श्रद्धालुओं ने भाग लिया और मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन भी आयोजन में शामिल हुए। हज़ारों भक्तों ने रथ की रस्सियाँ थामकर भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा के विग्रहों को जगन्नाथपुर मंदिर से मौसीबाड़ी तक खींचा।
भगवान जगन्नाथ मौसीबाड़ी में कितने दिन रहेंगे?
भगवान जगन्नाथ नौ दिनों तक मौसीबाड़ी में भक्तों को दर्शन देंगे। इसके बाद घुरती रथयात्रा के साथ उनकी जगन्नाथपुर मुख्य मंदिर में वापसी होगी।
रांची की रथयात्रा सामाजिक समरसता का प्रतीक कैसे है?
वर्षों से विभिन्न जातियों और समुदायों के लोग इस रथयात्रा की व्यवस्थाओं में अपनी पारंपरिक ज़िम्मेदारियाँ निभाते आ रहे हैं। यही साझेदारी इसे केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि झारखंड की सांस्कृतिक विरासत और सामाजिक सौहार्द का प्रतीक बनाती है।
रांची के जगन्नाथपुर मंदिर की विशेषता क्या है?
जगन्नाथपुर मंदिर की वास्तुकला और पूजा-पद्धति पुरी के जगन्नाथ मंदिर से काफ़ी हद तक मेल खाती है। यहाँ भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा की काष्ठ निर्मित प्रतिमाओं की पारंपरिक विधि से पूजा की जाती है और रथ खींचने को श्रद्धालु विशेष पुण्य का कार्य मानते हैं।
राष्ट्र प्रेस
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