संभल में कोर्ट के आदेश पर ढही 'अवैध' ईदगाह और मस्जिद, ₹5 करोड़ की सरकारी जमीन मुक्त
सारांश
मुख्य बातें
उत्तर प्रदेश के संभल जिले में 14 जुलाई 2026 को जिला प्रशासन ने तहसीलदार कोर्ट के आदेश पर असमोली पुलिस स्टेशन क्षेत्र में सरकारी कब्रिस्तान की जमीन पर कथित तौर पर अवैध रूप से बनी एक ईदगाह और एक मस्जिद को ध्वस्त कर दिया। अधिकारियों के अनुसार, यह कार्रवाई उत्तर प्रदेश राजस्व संहिता की धारा 67 के तहत दर्ज मामले में सुनवाई के बाद कब्जे को गैर-कानूनी घोषित किए जाने के बाद की गई।
मुख्य घटनाक्रम
प्रशासन ने सबसे पहले ईदगाह की 25 फुट ऊँची मीनार को गिराया, इसके बाद शेष ढाँचे को दोपहर तक ध्वस्त किया गया। कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए उत्तर प्रदेश पुलिस, प्रोविंशियल आर्म्ड कांस्टेबुलरी (PAC) और रैपिड एक्शन फोर्स (RAF) के 100 से अधिक जवानों को तैनात किया गया था। स्थानीय लोगों को मौके पर इकट्ठा होने से रोकने के लिए भारी सुरक्षा घेरा बनाया गया।
प्रशासन का पक्ष
संभल के जिला मजिस्ट्रेट अंकित खंडेलवाल ने बताया, 'गाँव में कब्रिस्तान के लिए आरक्षित सरकारी जमीन पर गैर-कानूनी कब्जे की कोशिश की जा रही थी। उत्तर प्रदेश राजस्व संहिता की धारा 67 के तहत तहसीलदार की अदालत में सुनवाई के बाद कब्जे को गैर-कानूनी घोषित किया गया।' उन्होंने आगे कहा कि जमीन पर प्लॉट विकसित करने की कोशिश के संकेत भी मिले थे। प्रशासन के अनुसार, लगभग 10.5 बीघा जमीन को कब्जे से मुक्त कराया गया है, जो हाईवे के किनारे स्थित है और जिसकी कीमत कम से कम ₹5 करोड़ आँकी गई है। अब इस जमीन का उपयोग सरकारी और जन-कल्याण कार्यों के लिए किया जाएगा।
ऑल इंडिया शिया पर्सनल लॉ बोर्ड की आलोचना
ऑल इंडिया शिया पर्सनल लॉ बोर्ड ने इस कार्रवाई की कड़ी आलोचना की। बोर्ड के महासचिव मौलाना यासूब अब्बास ने कहा, 'संभल में ग्राम सभा की जमीन पर बनी ईदगाह को गिराना गलत है। यह तय करना अदालत का काम है कि यह कानूनी है या गैर-कानूनी। मैं इसे गिराए जाने की कड़ी निंदा करता हूँ।' गौरतलब है कि बोर्ड ने जिला कलेक्टर के एकतरफा फैसले पर सवाल उठाते हुए न्यायिक समीक्षा की माँग की है।
कानूनी और प्रशासनिक पृष्ठभूमि
यह ध्यान देने योग्य है कि संभल पहले से ही धार्मिक-प्रशासनिक विवादों के केंद्र में रहा है। तत्कालीन जिला मजिस्ट्रेट के पास दर्ज शिकायत के बाद जमीन की पैमाइश कराई गई, जिसमें ढाँचों को सरकारी भूमि पर अनाधिकृत रूप से बना पाया गया। इसके बाद तहसीलदार की अदालत ने उत्तर प्रदेश राजस्व संहिता के प्रावधानों के तहत दोनों ढाँचों को गिराने का आदेश दिया। प्रशासन का कहना है कि यह कार्रवाई पूरी तरह विधिसम्मत प्रक्रिया के तहत की गई।
आगे की स्थिति
मुक्त कराई गई 10.5 बीघा जमीन फिलहाल प्रशासन के कब्जे में है। अधिकारियों ने संकेत दिया है कि इसका उपयोग सार्वजनिक कल्याण परियोजनाओं के लिए किया जाएगा। आलोचकों का कहना है कि मामले की उच्च न्यायालय स्तर पर कानूनी समीक्षा की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।