संजय निरुपम का विपक्ष पर हमला: झारखंड के छात्रों को नजरअंदाज, संसद में हंगामे से जनता का नुकसान
सारांश
मुख्य बातें
शिवसेना प्रवक्ता संजय निरुपम ने 13 अगस्त को मुंबई में कांग्रेस और विपक्षी दलों पर दोहरे मापदंड अपनाने का आरोप लगाते हुए कहा कि झारखंड में सप्ताहों से सड़कों पर उतरे छात्रों की अनदेखी करना विपक्ष की चयनात्मक राजनीति को उजागर करता है। उन्होंने यह भी कहा कि संसद में लगातार हंगामे से सरकार नहीं, बल्कि देश की आम जनता को नुकसान हो रहा है।
झारखंड के छात्रों की अनदेखी का आरोप
निरुपम ने जंतर-मंतर पर जारी छात्र प्रदर्शन और झारखंड में चल रहे छात्र आंदोलन की तुलना करते हुए कहा कि विपक्ष केंद्र सरकार से पेपर लीक और भर्ती अनियमितताओं पर सवाल तो पूछता है, लेकिन जहाँ उसकी अपनी सरकार है, वहाँ के छात्रों की पीड़ा पर चुप्पी साधे हुए है।
उन्होंने कहा कि झारखंड में छात्र पिछले कई सप्ताहों से सड़कों पर प्रदर्शन और आमरण अनशन कर रहे हैं। बातचीत के बजाय उन पर लाठीचार्ज और आंसू गैस का इस्तेमाल किया जा रहा है। निरुपम ने स्पष्ट कहा कि जंतर-मंतर के प्रदर्शनकारियों को इसलिए ज्यादा तवज्जो दी जा रही है क्योंकि उनका आंदोलन केंद्र सरकार के खिलाफ राजनीतिक हथियार बन सकता है।
जेपीएससी विवाद और सीबीआई जांच की मांग
निरुपम ने झारखंड लोक सेवा आयोग (जेपीएससी) से जुड़े कथित विवादों का उल्लेख करते हुए कहा कि यदि परीक्षाओं में गड़बड़ी, भर्तियों में अनियमितता और भाई-भतीजावाद के आरोप लग रहे हैं, तो सरकार को छात्रों के साथ बैठकर उनके सवालों का जवाब देना चाहिए। उन्होंने सीबीआई जांच की छात्रों की मांग और जेपीएससी से जुड़े अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की अपील को भी उचित बताया।
उन्होंने कांग्रेस से सीधे अपील की कि यदि पार्टी वास्तव में छात्रों के हितों को लेकर गंभीर है, तो झारखंड में बैठकर उनकी समस्याओं का समाधान करे, न कि महज़ राजनीतिक बयानबाज़ी करे।
एक्यूआईएस और दिल्ली विस्फोट की चर्चा
संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की रिपोर्ट में अल-कायदा इन इंडियन सबकॉन्टिनेंट (एक्यूआईएस) के कथित संबंधों को नवंबर 2025 में दिल्ली के लाल किले के पास हुए बम धमाकों से जोड़े जाने पर निरुपम ने कहा कि यह आतंकवाद के बदलते स्वरूप का खतरनाक संकेत है।
उन्होंने दावा किया कि आतंकी नेटवर्क अब सामान्य पेशेवरों — जैसे डॉक्टरों या विश्वविद्यालय से जुड़े लोगों — की आड़ में काम कर सकते हैं। निरुपम ने केंद्र सरकार से एक्यूआईएस के खिलाफ कड़ी कार्रवाई और उसके पूरे नेटवर्क की व्यापक जांच की मांग की।
संसद में हंगामे पर तीखी आलोचना
निरुपम ने संसद की कार्यवाही बाधित होने पर विपक्ष को आड़े हाथों लिया। उन्होंने कहा कि संसद सत्र सरकार से सवाल पूछने और जनता के मुद्दे उठाने का सबसे महत्वपूर्ण मंच है, लेकिन लगातार हंगामे से यह अवसर बर्बाद किया जा रहा है।
उन्होंने एक विरोधाभास की ओर ध्यान दिलाया — विपक्ष ने पहले कहा कि गृह मंत्री के सदन में आकर जवाब देने तक संसद नहीं चलने दी जाएगी, लेकिन जब गृह मंत्री ने जवाब देने की इच्छा जताई तो उनके इस्तीफे की मांग शुरू कर दी गई। निरुपम ने इसे गैर-जिम्मेदाराना रवैया बताते हुए कहा कि इससे सरकारी धन का नुकसान होता है और अंतिम असर देश की जनता पर पड़ता है।
मराठी भाषा नियम और ऑटो चालकों का मुद्दा
महाराष्ट्र सरकार ने 1 मई से ऑटो-रिक्शा और टैक्सी चालकों के लिए मराठी में संवाद करने का सरकारी आदेश लागू किया था। निरुपम के अनुसार, करीब 1.35 लाख ऑटो चालकों ने बोलचाल की मराठी सीखने का प्रशिक्षण लिया और उन्हें प्रमाणपत्र भी दिए गए।
सरकार ने इस अभियान के लिए 15 अगस्त तक की समयसीमा तय की थी और इसके बाद मराठी में संवाद न कर पाने वाले चालकों के परमिट और लाइसेंस पर कार्रवाई का संकेत दिया गया। निरुपम ने परिवहन मंत्री प्रताप सरनाईक से आग्रह किया कि जो चालक किसी कारण से भाषा नहीं सीख पाए, उनके परमिट तुरंत रद्द करने के बजाय अभियान को कुछ और समय दिया जाए और पहले यह आकलन किया जाए कि कितने चालक अभी भी सीखने की प्रक्रिया में हैं।
गौरतलब है कि यह विवाद ऐसे समय में उठा है जब महाराष्ट्र में भाषा और पहचान के मुद्दे राजनीतिक रूप से संवेदनशील बने हुए हैं। आने वाले दिनों में सरकार का अगला कदम यह तय करेगा कि यह नीति समावेशी रहती है या विवादास्पद बनती है।