संजय राउत की संसद पर टिप्पणी से शिवसेना प्रवक्ता संजय निरुपम नाराज़, कहा — 'संवैधानिक संस्थाओं की पवित्रता से न करें खिलवाड़'
सारांश
मुख्य बातें
शिवसेना प्रवक्ता संजय निरुपम ने 23 सितंबर 2026 को मुंबई में शिवसेना (यूबीटी) के सांसद संजय राउत की संसद को लेकर की गई विवादित टिप्पणी की कड़ी निंदा की। निरुपम ने स्पष्ट कहा कि राजनेताओं और राजनीति पर आलोचना स्वीकार्य है, परंतु भारत की संवैधानिक संस्थाओं की गरिमा के साथ किसी भी प्रकार का समझौता नहीं होना चाहिए।
राउत की टिप्पणी पर निरुपम का सख्त रुख
निरुपम ने कहा, 'संजय राउत जिस संसद के सदस्य हैं, उसी संसद पर आपत्तिजनक और घटिया टिप्पणी करना शर्मनाक है। भारत के पवित्र संविधान से बनी इस संस्था की अवमानना किसी भी लोकतांत्रिक व्यक्ति को स्वीकार्य नहीं होनी चाहिए।' उन्होंने राउत से गुज़ारिश की कि वे कम से कम संसद को विवाद से बाहर रखें और संवैधानिक संस्थाओं की पवित्रता बनाए रखना सभी की सामूहिक ज़िम्मेदारी है।
मुस्लिम पर्सनल लॉ और सुप्रीम कोर्ट नोटिस पर निरुपम का बयान
इसी प्रेस वार्ता में शिवसेना के प्रवक्ता निरुपम ने मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत बिना वसीयत के उत्तराधिकार के नियमों को चुनौती देने वाली याचिका पर सर्वोच्च न्यायालय के नोटिस जारी करने का विषय भी उठाया। उन्होंने कहा, 'मुस्लिम पर्सनल लॉ कई मामलों में पुरुषों और महिलाओं के बीच भेदभाव करता है, जो एक सच्चाई है। भारत का संविधान स्पष्ट रूप से कहता है कि लिंग के आधार पर कोई भेदभाव नहीं होगा।'
निरुपम ने विशेष रूप से दो नियमों को संविधान के विरुद्ध बताया — पहला, बिना वसीयत के उत्तराधिकार से संबंधित नियम और दूसरा, विरासत में मिली संपत्ति के बंटवारे में पुरुषों व महिलाओं के बीच असमानता। उनके अनुसार, ये दोनों प्रावधान भारत के संवैधानिक ढाँचे के अनुरूप नहीं हैं।
चुनाव आयोग के कामकाज पर उठाए सवाल
निरुपम ने चुनाव आयोग के कामकाज पर प्रकाशित एक जाँच रिपोर्ट का भी उल्लेख किया, जिसमें दावा किया गया है कि तीनों इलेक्शन कमिश्नरों के बीच कुछ मामलों में मतभेद रहे, फिर भी असहमतियों के बावजूद फ़ैसले लिए गए। रिपोर्ट के अनुसार, दो इलेक्शन कमिश्नरों ने पिछले कुछ महीनों में करीब 13-14 पत्र लिखे।
इस पर निरुपम ने कहा कि चुनाव आयोग को संचालित करने वाला संस्थागत एवं कानूनी ढाँचा बिल्कुल स्पष्ट है — सभी निर्णय सर्वसम्मति से होने चाहिए और यदि सहमति न बने तो बहुमत के आधार पर फ़ैसला लिया जाना चाहिए।
विशेषज्ञ क्या कहते हैं
यह घटनाक्रम ऐसे समय में आया है जब महाराष्ट्र की राजनीति में शिवसेना के दोनों धड़ों — शिवसेना (यूबीटी) और शिवसेना (शिंदे गुट) — के बीच वैचारिक और सार्वजनिक बयानबाज़ी का टकराव लगातार तेज़ हो रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि संवैधानिक संस्थाओं को लेकर इस तरह की सार्वजनिक बहस आगामी चुनावी माहौल को और अधिक ध्रुवीकृत कर सकती है।
आगे क्या
फिलहाल संजय राउत की ओर से इस प्रतिक्रिया पर कोई आधिकारिक जवाब सामने नहीं आया है। मुस्लिम पर्सनल लॉ से जुड़ी याचिका पर सर्वोच्च न्यायालय की अगली सुनवाई इस मुद्दे को और अधिक राजनीतिक महत्व दे सकती है। चुनाव आयोग के आंतरिक मतभेदों से जुड़ी रिपोर्ट पर भी विपक्षी दलों की प्रतिक्रिया आने की संभावना है।