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फिल्म 'सतलुज' OTT से हटी: SAD उपाध्यक्ष रोमाना बोले — हर गाँव में होगी स्पेशल स्क्रीनिंग

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फिल्म 'सतलुज' OTT से हटी: SAD उपाध्यक्ष रोमाना बोले — हर गाँव में होगी स्पेशल स्क्रीनिंग

सारांश

फिल्म 'सतलुज' के OTT से हटाए जाने के बाद SAD ने मोर्चा खोल दिया है। सुखबीर बादल के निर्देश पर पार्टी कार्यकर्ता अब इसे हर गाँव तक ले जाएंगे — 1984 के इतिहास को युवाओं तक पहुँचाने की यह कोशिश एक बड़े सियासी और सांस्कृतिक संघर्ष का रूप लेती दिख रही है।

मुख्य बातें

SAD उपाध्यक्ष परमबंस सिंह रोमाना ने 9 जुलाई को फिल्म 'सतलुज' के OTT से हटाए जाने पर कड़ी आपत्ति जताई।
सुखबीर सिंह बादल ने SAD कार्यकर्ताओं को निर्देश दिया कि फिल्म की स्पेशल स्क्रीनिंग पंजाब के हर गाँव में आयोजित की जाए।
फिल्म में 1984 के दरबार साहिब हमले और सिख-विरोधी दंगों के बाद युवाओं पर कथित पुलिस अत्याचार को दर्शाया गया है।
वरिष्ठ अधिवक्ता राजविंदर बैंस ने मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालरा के दस्तावेज़ी कार्य का हवाला दिया।
कांग्रेस नेता परगट सिंह ने फिल्म की स्क्रीनिंग के पक्ष में बयान दिया।

शिरोमणि अकाली दल (SAD) के उपाध्यक्ष परमबंस सिंह रोमाना ने 9 जुलाई 2026 को फिल्म 'सतलुज' को ओटीटी प्लेटफॉर्म से हटाए जाने पर कड़ी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने घोषणा की कि SAD के कार्यकर्ता और नेता इस फिल्म को पंजाब के हर गाँव तक पहुँचाएंगे और विशेष स्क्रीनिंग आयोजित करेंगे।

SAD का रुख और घोषणा

रोमाना ने कहा, 'शिरोमणि अकाली दल के अध्यक्ष सुखबीर सिंह बादल ने पहले ही दिन इस फिल्म को ओटीटी से हटाए जाने की निंदा की थी। इसी कड़ी में बादल ने घोषणा की है कि SAD के कार्यकर्ता और नेता इस फिल्म को हर गाँव तक ले जाएंगे और स्पेशल स्क्रीनिंग करेंगे, ताकि पंजाब के युवाओं को इतिहास में हुई घटनाओं की सच्चाई पता चल सके।'

फिल्म में क्या दिखाया गया है

रोमाना के अनुसार, फिल्म 'सतलुज' 1984 में दरबार साहिब पर हुए हमले और उसके बाद दिल्ली तथा अन्य शहरों में हुए सिख-विरोधी दंगों के दौर को चित्रित करती है। फिल्म में आरोप लगाया गया है कि इन घटनाओं के लिए कांग्रेस पार्टी जिम्मेदार थी। इसके अलावा, फिल्म में यह भी दिखाया गया है कि कथित तौर पर उन घटनाओं का विरोध करने वाले युवाओं को पुलिस ने हिरासत में लिया, प्रताड़ित किया, कथित फर्जी मुठभेड़ों में मारा और उनके शवों को पंजाब की नदियों में फेंक दिया।

मानवाधिकार कार्यकर्ता की राय

वरिष्ठ अधिवक्ता और मानवाधिकार कार्यकर्ता राजविंदर बैंस ने इस मामले पर कहा कि मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालरा ने तथ्य सामने रखे थे कि श्मशान घाटों के रिकॉर्ड में युवाओं के नाम दर्ज हैं और अधिकारी इससे इनकार नहीं कर सके। बैंस ने बताया कि 'फरवरी से सितंबर तक का समय एक खींचतान का दौर था — वे प्रेस कॉन्फ्रेंस करते थे और पुलिस उनका जवाब देती थी।'

कांग्रेस नेता का पक्ष

कांग्रेस नेता परगट सिंह ने भी इस विषय पर बुधवार को अपनी राय रखी। उन्होंने कहा, 'असली कहानियों पर बनी फिल्में लोगों को इतिहास समझने में मदद करती हैं और उन घटनाओं को सामने लाती हैं जहाँ सत्ता का दुरुपयोग हो सकता है। आज की पीढ़ी को ऐसी घटनाओं के बारे में जानना चाहिए — मेरी राय में यह फिल्म दिखाई जानी चाहिए।' गौरतलब है कि कांग्रेस के एक नेता का यह बयान उनकी पार्टी पर लगे आरोपों के संदर्भ में उल्लेखनीय है।

आगे क्या होगा

SAD के इस ऐलान के बाद अब यह देखना होगा कि पंजाब में इन स्क्रीनिंग्स को प्रशासनिक स्तर पर कोई चुनौती मिलती है या नहीं। फिल्म के ओटीटी से हटाए जाने के कारण अभी तक आधिकारिक तौर पर स्पष्ट नहीं किए गए हैं।

संपादकीय दृष्टिकोण

बल्कि 1984 की स्मृति को लेकर चल रही दीर्घकालिक राजनीतिक लड़ाई का नया अध्याय है। दिलचस्प यह है कि कांग्रेस के एक नेता ने भी फिल्म दिखाए जाने का समर्थन किया — यह उस पार्टी के लिए असहज स्थिति है जिस पर फिल्म में सीधे आरोप लगाए गए हैं। OTT से हटाने के आधिकारिक कारण अभी सार्वजनिक नहीं हुए, जो इस पूरे मामले में पारदर्शिता की कमी को उजागर करता है।
RashtraPress
9 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

फिल्म 'सतलुज' को OTT से क्यों हटाया गया?
फिल्म 'सतलुज' को ओटीटी प्लेटफॉर्म से हटाए जाने के आधिकारिक कारण अभी तक सार्वजनिक नहीं किए गए हैं। SAD ने इस कदम की निंदा की है और इसे ऐतिहासिक सच्चाई को दबाने की कोशिश बताया है।
फिल्म 'सतलुज' में क्या दिखाया गया है?
फिल्म 'सतलुज' 1984 में दरबार साहिब पर हुए हमले और उसके बाद दिल्ली व अन्य शहरों में हुए सिख-विरोधी दंगों पर आधारित है। इसमें यह भी दिखाया गया है कि कथित तौर पर विरोध करने वाले युवाओं को पुलिस ने हिरासत में लिया, प्रताड़ित किया और कथित फर्जी मुठभेड़ों में मारकर नदियों में फेंक दिया।
SAD ने 'सतलुज' विवाद पर क्या कदम उठाया है?
शिरोमणि अकाली दल के अध्यक्ष सुखबीर सिंह बादल ने पार्टी कार्यकर्ताओं को निर्देश दिया है कि वे पंजाब के हर गाँव में फिल्म की स्पेशल स्क्रीनिंग आयोजित करें। SAD उपाध्यक्ष परमबंस सिंह रोमाना ने इसकी घोषणा 9 जुलाई को की।
जसवंत सिंह खालरा का इस मामले से क्या संबंध है?
जसवंत सिंह खालरा एक मानवाधिकार कार्यकर्ता थे जिन्होंने श्मशान घाटों के रिकॉर्ड के आधार पर पंजाब में कथित पुलिस अत्याचारों के तथ्य सामने रखे थे। वरिष्ठ अधिवक्ता राजविंदर बैंस ने उनके इस दस्तावेज़ी कार्य का उल्लेख फिल्म के संदर्भ में किया।
कांग्रेस का 'सतलुज' फिल्म पर क्या रुख है?
कांग्रेस नेता परगट सिंह ने व्यक्तिगत रूप से फिल्म की स्क्रीनिंग का समर्थन किया और कहा कि असली घटनाओं पर बनी फिल्में युवाओं को इतिहास समझने में मदद करती हैं। हालाँकि, फिल्म में कांग्रेस पार्टी पर 1984 की घटनाओं के लिए सीधे आरोप लगाए गए हैं।
राष्ट्र प्रेस
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