दिलजीत की 'सतलुज' पर बैन: सिख नेता बोले — 'कश्मीर फाइल्स चल सकती है तो सतलुज क्यों नहीं?'
सारांश
मुख्य बातें
पंजाबी सुपरस्टार दिलजीत दोसांझ की फिल्म 'सतलुज' उस वक्त विवाद के केंद्र में आ गई जब इसे ओटीटी प्लेटफॉर्म पर रिलीज़ के महज 48 घंटों के भीतर हटा दिया गया। इस फैसले के विरोध में शिरोमणि अकाली दल (दिल्ली इकाई) ने 8 जुलाई, बुधवार को फिल्म की स्पेशल स्क्रीनिंग आयोजित की, जिसमें बड़ी संख्या में दर्शक शामिल हुए।
क्या है पूरा विवाद
सिख समुदाय से जुड़े ऐतिहासिक विषयों पर आधारित इस फिल्म को ओटीटी पर आने के दो दिन के भीतर ही हटा लिया गया। अकाली नेताओं का आरोप है कि सरकार के वरिष्ठ अधिकारियों की 'गलत सलाह' पर यह निर्णय लिया गया। उनके अनुसार, फिल्म की समीक्षा के लिए बनाई गई पाँच सदस्यीय समिति में कोई सिख प्रतिनिधि नहीं था और महज तीन दिन की समीक्षा के बाद बैन लागू कर दिया गया।
सिख नेताओं की तीखी प्रतिक्रिया
शिरोमणि अकाली दल दिल्ली प्रदेश अध्यक्ष परमजीत सिंह सरना ने कहा, 'सिखों पर जो जुल्म हुए, उन पर एक फिल्म बनाई गई। पिछले 30 साल में ऐसी कोई फिल्म नहीं बनी। यह लोकतांत्रिक देश है, लोगों को यह जानना चाहिए कि सिखों पर किसने जुल्म किया। सरकार को खुद यह काम करना चाहिए था ताकि लोगों को सच्चाई पता चले।'
सरना ने समिति की संरचना पर सवाल उठाते हुए कहा, 'जिस कमेटी में सिख सदस्य ही नहीं हैं, उस कमेटी का क्या फायदा?' उन्होंने दृढ़ता से कहा कि जो सिख जिंदा रहेगा, वह यह फिल्म ज़रूर देखेगा।
वरिष्ठ अकाली नेता मंजीत सिंह जी.के. ने 'कश्मीर फाइल्स' और 'केरला स्टोरी' का उदाहरण देते हुए तीखा सवाल किया, 'कश्मीर फाइल्स और केरला स्टोरी जैसी फिल्में चल सकती हैं तो सतलुज क्यों नहीं चल सकती? यह साफ तौर पर सिखों के इतिहास को दबाने की कोशिश है।'
घर-घर फिल्म दिखाने का संकल्प
मंजीत सिंह जी.के. ने चेतावनी दी कि अगर गुरुद्वारों से फिल्म दिखाने की माँग आई, तो वे वहाँ भी स्क्रीनिंग करेंगे। अकाली दल के नेताओं ने फिल्म को 'घर-घर' पहुँचाने का संकल्प लिया है और कहा है कि जहाँ से भी माँग आएगी, वहाँ स्क्रीनिंग की जाएगी।
व्यापक संदर्भ और आगे की राह
यह ऐसे समय में आया है जब सिख समुदाय से जुड़े ऐतिहासिक मुद्दे राजनीतिक रूप से संवेदनशील बने हुए हैं। गौरतलब है कि फिल्म को सालों की देरी के बाद रिलीज़ की अनुमति मिली थी। आलोचकों का कहना है कि बिना पारदर्शी प्रक्रिया के लगाया गया यह बैन अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर सवाल खड़े करता है। अब देखना यह होगा कि सरकार इस बढ़ते दबाव पर क्या रुख अपनाती है और क्या फिल्म को दोबारा प्लेटफॉर्म पर जगह मिलती है।