सुप्रीम कोर्ट ने राहुल गांधी के खिलाफ सावरकर मानहानि मामला रद्द किया, मंजूरी न लेना बना आधार
सारांश
मुख्य बातें
सर्वोच्च न्यायालय ने 15 अगस्त 2026 की पूर्व संध्या पर, 14 अगस्त को, कांग्रेस सांसद राहुल गांधी के विरुद्ध हिंदुत्व विचारक वीर सावरकर पर की गई टिप्पणियों से जुड़े आपराधिक मानहानि मामले में निचली अदालत की कार्यवाही को रद्द कर दिया। जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस शील नागू की खंडपीठ ने यह फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया कि मुकदमा चलाने के लिए कानून के अंतर्गत अनिवार्य पूर्व-अनुमति नहीं ली गई थी।
मामले की पृष्ठभूमि
यह विवाद 2022 में भारत जोड़ो यात्रा के दौरान महाराष्ट्र में राहुल गांधी द्वारा दिए गए एक बयान से उपजा था, जिसमें उन्होंने वीर सावरकर को 'अंग्रेजों का नौकर' बताया था और आरोप लगाया था कि सावरकर 'अंग्रेजों से पेंशन लेते थे।' इन टिप्पणियों को लेकर वकील नृपेंद्र पांडे ने निचली अदालत में शिकायत दर्ज कराई थी।
पांडे ने राहुल गांधी पर भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 153ए (दुश्मनी को बढ़ावा देना) और धारा 505 (सार्वजनिक उपद्रव) के तहत आरोप लगाए थे। उनका दावा था कि ये टिप्पणियाँ समाज में वैमनस्य फैलाने के इरादे से की गई थीं। शिकायत में यह भी उल्लेख था कि महात्मा गांधी ने पहले सावरकर को देशभक्त माना था।
मुख्य घटनाक्रम
जून 2023 में मजिस्ट्रेट कोर्ट ने पांडे की शिकायत खारिज कर दी। इसके बाद पांडे ने सेशंस कोर्ट में अपील की, जिसने याचिका स्वीकार कर मामला पुनः मजिस्ट्रेट कोर्ट को भेज दिया। दिसंबर 2024 में निचली अदालत ने प्रथम दृष्टया मामला मानते हुए राहुल गांधी को समन जारी किया।
राहुल गांधी ने इस समन को चुनौती दी, किंतु 4 अप्रैल 2025 को इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने उन्हें कोई राहत देने से इनकार कर दिया। इसके बाद उन्होंने सर्वोच्च न्यायालय में अपील की, जहाँ अंततः उन्हें राहत मिली।
सर्वोच्च न्यायालय का आधार
खंडपीठ ने अपने आदेश में रेखांकित किया कि आईपीसी की धारा 153ए और 505 के तहत मुकदमा चलाने के लिए सक्षम प्राधिकारी से अनिवार्य पूर्व-अनुमति लेना आवश्यक है, जो इस मामले में नहीं ली गई। इस प्रक्रियागत चूक को निर्णायक मानते हुए अदालत ने राहुल गांधी के विरुद्ध जारी समन और समस्त आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर दिया।
गौरतलब है कि यह निर्णय गुण-दोष के आधार पर नहीं, बल्कि प्रक्रियागत अनियमितता के आधार पर आया है — अर्थात टिप्पणियों की वैधता या अवैधता पर सर्वोच्च न्यायालय ने कोई राय नहीं दी।
राजनीतिक परिप्रेक्ष्य
यह फैसला ऐसे समय में आया है जब भारत जोड़ो यात्रा से उपजे कई विवाद अभी भी अदालतों में विचाराधीन हैं। कांग्रेस ने इस निर्णय को अपनी नैतिक जीत बताया है, जबकि आलोचकों का कहना है कि मूल विवाद — सावरकर की ऐतिहासिक भूमिका पर बहस — अभी भी जारी है।
आगे क्या
सर्वोच्च न्यायालय के इस आदेश के बाद निचली अदालत में यह मामला समाप्त हो गया है। हालाँकि, शिकायतकर्ता के पास उचित अनुमति लेकर नए सिरे से कार्यवाही शुरू करने का विकल्प कानूनी रूप से खुला रह सकता है। राहुल गांधी के विरुद्ध अन्य अदालतों में लंबित मामलों पर इस फैसले का कोई सीधा प्रभाव नहीं पड़ेगा।