क्या जमीन से चलाए अटूट संघर्ष के बावजूद शिबू सोरेन झारखंड के पहले मुख्यमंत्री नहीं बन सके?

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क्या जमीन से चलाए अटूट संघर्ष के बावजूद शिबू सोरेन झारखंड के पहले मुख्यमंत्री नहीं बन सके?

सारांश

झारखंड आंदोलन के पुरोधा शिबू सोरेन ने संघर्ष के बाद भी मुख्यमंत्री पद से वंचित रह गए। यह कहानी है उनके संघर्ष और राजनीतिक जटिलताओं की जो उन्हें पहले मुख्यमंत्री बनने से रोकती हैं। जानिए कैसे और क्यों उनके प्रयासों का परिणाम उलटा पड़ा।

Key Takeaways

  • शिबू सोरेन का झारखंड आंदोलन में महत्वपूर्ण योगदान रहा।
  • राजनीतिक जटिलताओं ने उन्हें मुख्यमंत्री बनने से रोका।
  • आदिवासियों के अधिकारों के लिए उनकी आवाज़ आज भी गूंजती है।
  • झारखंड का गठन बिहार के बंटवारे के साथ हुआ।
  • उनकी संघर्ष की कहानी आज भी प्रेरणा देती है।

नई दिल्ली, 10 जनवरी (राष्ट्र प्रेस)। वर्ष 2000, भारतीय स्वतंत्रता के बाद बिहार के इतिहास का एक महत्वपूर्ण मोड़, जब बिहार का भूगोल बदलकर झारखंड एक स्वतंत्र राज्य के रूप में स्थापित हुआ। इस ऐतिहासिक निर्णय के पीछे जिन प्रमुख नामों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, उनमें शिबू सोरेन सबसे आगे रहे। संसद में आदिवासियों की आवाज़ और ज़मीन पर चलने वाला एक अटूट संघर्ष, यही झारखंड आंदोलन के इस पुरोधा की पहचान थी, जिन्हें जनता ने 'दशोम गुरु' का सम्मान दिया।

11 जनवरी 1944 को अविभाजित बिहार के हजारीबाग (वर्तमान झारखंड) में जन्मे शिबू सोरेन का झारखंड एक नए राज्य के गठन की दिशा में उनके लंबे संघर्ष का परिणाम था। उस समय केंद्र में अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार थी, छोटे राज्यों के गठन के प्रयास चल रहे थे और झारखंड मुक्ति मोर्चा ने अपने आंदोलन को निर्णायक मोड़ दिया। अंततः 2000 में जब बिहार का बंटवारा हुआ, तो इसके पीछे झारखंड मुक्ति मोर्चा की वह लंबी लड़ाई थी, जिसका नेतृत्व शिबू सोरेन कर रहे थे। लेकिन सवाल यह है कि इस आंदोलन के पुरोधा को राज्य का पहला मुख्यमंत्री बनने का अवसर क्यों नहीं मिला।

झारखंड आधिकारिक रूप से 15 नवंबर 2000 को बिहार से अलग होकर भारत का 28वां राज्य बना, लेकिन 2 अगस्त 2000 को जब झारखंड विधेयक लोकसभा में पारित हुआ, उसी दिन मुख्यमंत्री पद के लिए दावेदारी शुरू हुई। उस समय शिबू सोरेन भाजपा के नेतृत्व वाले एनडीए का हिस्सा थे और लंबे समय तक झारखंड के लिए संघर्ष करने के कारण उन्हें राज्य के पहले मुख्यमंत्री के लिए सबसे मजबूत दावेदार माना जा रहा था।

जब झारखंड विधेयक लोकसभा से पारित हुआ, तो शिबू सोरेन ने मुख्यमंत्री पद पर दावा करते हुए कहा कि उन्हें आश्वासन दिया गया था कि झारखंड बनने के बाद एनडीए उन्हें मुख्यमंत्री बनाएगा। इसी शर्त पर उन्होंने नीतीश कुमार की सरकार का समर्थन किया था, जबकि मार्च 2000 में बिहार में त्रिशंकु विधानसभा का गठन हुआ था।

शिबू सोरेन राजनीति के अनुभवी खिलाड़ी बन चुके थे। उन्हें पता था कि भाजपा उन्हें मुख्यमंत्री का पद आसानी से नहीं देगी। उस समय कांग्रेस और लालू प्रसाद यादव की पार्टी ने भी इस स्थिति को भांप लिया था। अनुज कुमार सिन्हा ने अपनी किताब 'दिशोम गुरु शिबू सोरेन' में लिखा है, "राजद नेता लालू प्रसाद जानते थे कि विधेयक पारित हो गया है, लेकिन भाजपा सत्ता में नहीं आनी चाहिए, इसलिए उन्होंने शिबू सोरेन को मुख्यमंत्री पद का प्रस्ताव दिया।"

यूपीए अपनी योजना के अनुसार काम कर रहा था। उनका पहला कार्य था झारखंड मुक्ति मोर्चा को एनडीए से बाहर ले आना। किताब में आगे लिखा है, "कांग्रेस की प्रमुख नेता मोहसिना किदवई ने कहा था कि उनकी प्राथमिकता भाजपा को सत्ता में आने से रोकना है।"

हालांकि, झारखंड की राजनीति ने एक नया मोड़ ले लिया था। शिबू सोरेन को मुख्यमंत्री की दावेदारी के लिए दबाव बनाने का मौका मिल चुका था। 8 अगस्त

वापस दिल्ली लौटने पर शिबू सोरेन ने कहा कि "झारखंड राज्य को राजग ने ही बनाया है, इसलिए मुख्यमंत्री वही होगा जिसने बलिदान दिया है।" इसके बाद भाजपा नेताओं के बयानों का दौर शुरू हुआ। पहले कुशाभाऊ ठाकरे और फिर सुशील मोदी के बयानों ने स्पष्ट किया कि एनडीए की तरफ से शिबू सोरेन मुख्यमंत्री नहीं होंगे।

5 नवंबर का दिन निर्णायक साबित हुआ, एक दिन पहले गुरुजी और वाजपेयी की मुलाकात हुई थी। झामुमो ने तय कर लिया था कि निर्णय जो भी हो, समर्थन वापसी पर निर्णय 7 नवंबर को पटना में होने वाली कार्यकारिणी की बैठक में लिया जाएगा।

आखिरकार, 9 नवंबरबाबूलाल मरांडी को भाजपा विधायक दल का नेता चुन लिया गया और इसी के साथ सारी अटकलें समाप्त हो गईं। बाबूलाल मरांडी को झारखंड के पहले मुख्यमंत्री के रूप में राज्यपाल प्रभात कुमार ने शपथ दिलाई और इस तरह शिबू सोरेन झारखंड के पहले मुख्यमंत्री नहीं बन सके।

Point of View

यह स्पष्ट है कि शिबू सोरेन का झारखंड आंदोलन में योगदान अविस्मरणीय है। हालांकि, राजनीतिक परिस्थितियों और दलगत स्वार्थों ने उन्हें मुख्यमंत्री बनने से रोका। यह घटना हमें यह सिखाती है कि राजनीति में कभी-कभी संघर्ष का परिणाम उल्टा भी हो सकता है।
NationPress
11/01/2026

Frequently Asked Questions

शिबू सोरेन का झारखंड आंदोलन में क्या योगदान था?
शिबू सोरेन ने झारखंड राज्य के गठन के लिए लंबा संघर्ष किया और वे झारखंड मुक्ति मोर्चा के प्रमुख नेता थे।
शिबू सोरेन को क्यों नहीं बनाया गया झारखंड का पहला मुख्यमंत्री?
भाजपा ने उन्हें मुख्यमंत्री पद के लिए चुनने से इंकार कर दिया, जबकि अन्य राजनीतिक दलों ने उनके खिलाफ रणनीति बनाई।
झारखंड का गठन कब हुआ?
झारखंड आधिकारिक रूप से 15 नवंबर 2000 को बिहार से अलग हुआ।
शिबू सोरेन को 'दशोम गुरु' क्यों कहा जाता है?
आदिवासियों के अधिकारों की रक्षा के लिए उनके संघर्ष के कारण उन्हें 'दशोम गुरु' का सम्मान दिया गया।
क्या शिबू सोरेन कांग्रेस के साथ गठबंधन में थे?
नहीं, उस समय वे भाजपा के नेतृत्व वाले एनडीए का हिस्सा थे।
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