29 सितंबर 2026
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सूखा राहत के लिए आम नागरिक नहीं, बिचौलियों और ठेकेदारों से वसूली हो: शिवसेना (यूबीटी)

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सूखा राहत के लिए आम नागरिक नहीं, बिचौलियों और ठेकेदारों से वसूली हो: शिवसेना (यूबीटी)

सारांश

सूखे से जूझ रहे महाराष्ट्र में जब मुख्यमंत्री फडणवीस ने जनता से बचत दान करने को कहा, तो शिवसेना (यूबीटी) ने 'सामना' में पलटवार किया — आम नागरिक नहीं, ठेकेदार और बिचौलिए दें राहत का पैसा। दो दिनों में चार किसान आत्महत्याओं के बीच यह सियासी टकराव और तीखा हो गया है।

मुख्य बातें

शिवसेना (यूबीटी) ने 29 सितंबर 2026 को 'सामना' संपादकीय के जरिये मुख्यमंत्री फडणवीस के सूखा राहत दान-आग्रह को 'असंवेदनशील' करार दिया।
परभणी, यवतमाल, सोलापुर और हिंगोली में दो दिनों में चार किसानों ने आत्महत्या की — गंभीर कृषि संकट का संकेत।
पार्टी की माँग: बिल्डरों, SRA डेवलपर्स, वरिष्ठ नौकरशाहों और ठेकेदारों से अनिवार्य योगदान लिया जाए।
PM केयर फंड से महाराष्ट्र कृषि क्षेत्र के लिए ₹2,000 करोड़ से ₹4,000 करोड़ आवंटन की माँग।
कोंकण तटीय भूमि विवाद और शक्तिपीठ एक्सप्रेसवे में कथित वित्तीय अनियमितताओं का भी उल्लेख।
मंत्रियों के सांकेतिक वेतन-दान को पार्टी ने 'महज दिखावा' बताया।

शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) ने मंगलवार, 29 सितंबर 2026 को मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के उस आग्रह की तीखी आलोचना की, जिसमें उन्होंने नागरिकों से निजी समारोहों में कटौती कर अपनी बचत सूखा राहत कोष में दान करने को कहा था। पार्टी के मुखपत्र 'सामना' में प्रकाशित संपादकीय में यह कहा गया कि महंगाई और आर्थिक संकट से पहले से पीड़ित जनता की जेब पर बोझ डालने के बजाय सरकार को भ्रष्ट ठेकेदारों, कमीशन-एजेंटों और राजनीतिक बिचौलियों पर शिकंजा कसना चाहिए।

किसान आत्महत्याएँ और कृषि संकट

संपादकीय में बताया गया कि परभणी, यवतमाल, सोलापुर और हिंगोली जिलों में गंभीर सूखे की मार झेल रहे कर्जदार किसानों में से चार किसानों ने मात्र दो दिनों के भीतर आत्महत्या कर ली। पार्टी ने चेतावनी दी कि यदि राज्य सरकार की ओर से तत्काल और सीधी सहायता नहीं मिली, तो सूखाग्रस्त क्षेत्र 'कब्रिस्तान' में तब्दील हो सकते हैं और इसकी पूरी जिम्मेदारी मुख्यमंत्री तथा उनके प्रशासन पर होगी।

बिचौलियों और ठेकेदारों पर कार्रवाई की माँग

ठाकरे गुट ने तर्क दिया कि शादी और नामकरण जैसे छोटे पारिवारिक समारोहों में कटौती करने की अपील असंवेदनशील है। संपादकीय के अनुसार, सरकार को आंतरिक भ्रष्टाचार, रिश्वतखोरी और ठेकेदारों के कमीशन पर सख्ती कर राहत का धन जुटाना चाहिए।

पार्टी ने आरोप लगाया — 'राज्य सरकार कमीशन-एजेंटों और ठेकेदारों की सरकार बन गई है। हर तरफ लूट मची है। ठेकेदारों को सरकारी खजाने का पैसा देने और अपनी जेबें भरने के लिए गैर-जरूरी परियोजनाएं बनाई जा रही हैं। अगर मुख्यमंत्री इस लूट को भी रोक दें, तो इससे सूखा प्रभावित लोगों को फायदा होगा।'

बुनियादी ढाँचे में कथित वित्तीय अनियमितताएँ

संपादकीय में कथित तौर पर कोंकण क्षेत्र में तटीय भूमि की विवादास्पद बिक्री और शक्तिपीठ एक्सप्रेसवे से जुड़े भारी वित्तीय लेन-देन का उल्लेख किया गया। आलोचकों का कहना है कि जनता की गाढ़ी कमाई का पैसा अक्सर ठेकेदारों के हित में दूसरी जगहों पर लगाया जाता है।

सूखा राहत के लिए सुझाए गए वैकल्पिक उपाय

पार्टी ने राज्य सरकार के सामने कई ठोस प्रस्ताव रखे। इनमें राजनीतिक सहयोगियों के लिए निर्धारित बकाया राशि को सीधे सूखा राहत कोष में स्थानांतरित करना, मुंबई के बड़े बिल्डरों, स्लम रिहैबिलिटेशन अथॉरिटी (SRA) के डेवलपर्स और वरिष्ठ नौकरशाहों से अनिवार्य योगदान लेना शामिल है। इसके अलावा केंद्र सरकार से पीएम केयर फंड में से ₹2,000 करोड़ से ₹4,000 करोड़ की राशि महाराष्ट्र के कृषि क्षेत्र के लिए आवंटित करने की माँग भी की गई।

पार्टी ने यह भी कहा कि मंत्रियों द्वारा एक महीने का वेतन दान करने जैसे सांकेतिक कदम, सत्ताधारी नेताओं के पास उपलब्ध भारी संसाधनों को देखते हुए महज दिखावे से अधिक कुछ नहीं हैं।

राजनीतिक खर्च और दल-बदल पर निशाना

संपादकीय में राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता और हॉर्स-ट्रेडिंग पर भी तीखा प्रहार किया गया। सत्ताधारी गठबंधन से माँग की गई कि चुनाव प्रचार और दल-बदल के लिए रखे गए फंड को तत्काल प्रभाव से सूखाग्रस्त किसानों की मदद में लगाया जाए। शिवसेना (यूबीटी) ने नेतृत्व से आग्रह किया कि भ्रष्ट अधिकारियों, ठेकेदारों और राजनीतिक बिचौलियों की मिलीभगत तोड़कर राज्य के 11 करोड़ नागरिकों को वास्तविक राहत प्रदान की जाए।

संपादकीय दृष्टिकोण

बल्कि उस सवाल में है जो वह उठाता है: क्या राज्य के बजट और विकास परियोजनाओं में पारदर्शिता सुनिश्चित किए बिना आपदा राहत टिकाऊ हो सकती है? दो दिनों में चार किसान आत्महत्याएँ बताती हैं कि संकट प्रतीक्षा नहीं कर रहा। PM केयर फंड से ₹4,000 करोड़ की माँग महत्वपूर्ण है, लेकिन यह भी जाँचने योग्य है कि राज्य सरकार ने खुद के पास उपलब्ध आपदा राहत कोषों का कितना उपयोग किया है।
RashtraPress
29 सितंबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

शिवसेना (यूबीटी) ने मुख्यमंत्री फडणवीस के सूखा राहत आग्रह का विरोध क्यों किया?
शिवसेना (यूबीटी) ने कहा कि महंगाई और आर्थिक संकट से पहले से पीड़ित जनता से बचत दान करने को कहना असंवेदनशील है। पार्टी का तर्क है कि राज्य सरकार को पहले ठेकेदारों, बिचौलियों और भ्रष्ट अधिकारियों पर शिकंजा कसकर राहत का धन जुटाना चाहिए।
महाराष्ट्र में सूखे से कितने किसानों ने आत्महत्या की?
'सामना' संपादकीय के अनुसार, परभणी, यवतमाल, सोलापुर और हिंगोली जिलों में मात्र दो दिनों के भीतर चार किसानों ने आत्महत्या की। ये किसान गंभीर सूखे और कर्ज के बोझ तले दबे हुए थे।
शिवसेना (यूबीटी) ने सूखा राहत के लिए क्या वैकल्पिक उपाय सुझाए हैं?
पार्टी ने मुंबई के बड़े बिल्डरों, SRA डेवलपर्स और वरिष्ठ नौकरशाहों से अनिवार्य योगदान, राजनीतिक सहयोगियों की बकाया राशि को सूखा राहत कोष में स्थानांतरित करने और PM केयर फंड से ₹2,000 करोड़ से ₹4,000 करोड़ आवंटित करने की माँग की है।
शक्तिपीठ एक्सप्रेसवे और कोंकण भूमि विवाद का सूखा राहत से क्या संबंध है?
शिवसेना (यूबीटी) के संपादकीय में इन परियोजनाओं में कथित वित्तीय अनियमितताओं का उल्लेख कर यह तर्क दिया गया कि जनता का पैसा ठेकेदारों के लिए खर्च होने के बजाय सूखा राहत पर लगाया जाना चाहिए। पार्टी ने आरोप लगाया कि गैर-जरूरी परियोजनाएँ बनाकर सरकारी खजाने की लूट हो रही है।
क्या मंत्रियों का वेतन दान सूखा राहत के लिए पर्याप्त है?
शिवसेना (यूबीटी) ने साफ कहा कि मंत्रियों द्वारा एक महीने का वेतन दान करना महज सांकेतिक और दिखावे का कदम है। पार्टी के अनुसार, सत्ताधारी नेताओं के पास उपलब्ध भारी संसाधनों को देखते हुए यह कदम राज्य के 11 करोड़ नागरिकों की जरूरतों के लिए नाकाफी है।
राष्ट्र प्रेस
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