शुभांशु शुक्ला ने बताया माइक्रोग्रैविटी में हेयरकट का अनोखा किस्सा, NASA की निकोल एयर्स बनीं 'स्पेस बार्बर'
सारांश
मुख्य बातें
ग्रुप कैप्टन शुभांशु शुक्ला ने अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन (ISS) पर माइक्रोग्रैविटी में बाल कटवाने के अपने अनूठे अनुभव को साझा किया है — जो रोज़मर्रा की एक साधारण दिखने वाली प्रक्रिया को अंतरिक्ष में कितनी जटिल चुनौती बना देती है, यह दर्शाता है। भारतीय वायुसेना के पायलट और गगनयान मिशन के लिए चुने गए चार भारतीयों में शामिल शुक्ला ने इंस्टाग्राम पर यह दिलचस्प विवरण पोस्ट किया।
मिशन की अवधि बढ़ी, बाल भी बढ़े
शुक्ला ने बताया कि क्वारंटाइन में जाने से पहले उन्होंने पृथ्वी पर बाल कटवा लिए थे। उनकी योजना थी कि 14 दिन के क्वारंटाइन और 14 दिन के मिशन के दौरान बाल संभल जाएँगे। लेकिन मिशन की अवधि बढ़ती गई — 28 दिन की मूल योजना पहले 32 दिन के क्वारंटाइन में बदली, और फिर ISS पर 18 दिन और जुड़ गए। इतने लंबे समय में बाल इस हद तक बढ़ गए कि हेयरकट अनिवार्य हो गया।
निकोल एयर्स बनीं 'स्पेस बार्बर'
शुक्ला ने बताया कि NASA की अंतरिक्ष यात्री निकोल एयर्स, जिन्हें कॉलसाइन 'वेपर' से जाना जाता है, ने उनकी मदद की। एक अनुभवी फाइटर पायलट और वॉलीबॉल खिलाड़ी के रूप में पहचानी जाने वाली निकोल ने इस अवसर पर एक कुशल 'स्पेस बार्बर' की भूमिका भी निभाई और पूरे आत्मविश्वास के साथ काम संभाला।
माइक्रोग्रैविटी में हेयरकट की तकनीक
शुक्ला के अनुसार, माइक्रोग्रैविटी में बाल काटना सरल नहीं है — कटे हुए बाल हवा में तैरने लगते हैं और अगर वे उपकरणों या वेंटिलेशन सिस्टम में चले जाएँ तो समस्या हो सकती है। इसीलिए विशेष वैक्यूम-युक्त क्लिपर इस्तेमाल किए जाते हैं, जो कटे बालों को तुरंत अंदर खींच लेते हैं। शुक्ला ने खुद असिस्टेंट की भूमिका निभाई और वैक्यूम संभालकर हर बाल को पकड़ा।
अंतरराष्ट्रीय टीमवर्क का प्रतीक
शुक्ला ने इस पूरे अनुभव को अंतरराष्ट्रीय टीमवर्क का एक जीवंत उदाहरण बताया। पृथ्वी से लगभग 400 किलोमीटर ऊपर, पृथ्वी की कक्षा में तैरते हुए एक 'परफेक्ट हेयरकट' हो गया। उन्होंने इसे अपनी 'बकेट लिस्ट' का वह आइटम बताया जिसके बारे में उन्हें पहले कभी सोचा भी नहीं था।
अंतरिक्ष में रोज़मर्रा की ज़िंदगी
2025 में 18 दिन के सफल मिशन के बाद भारत लौटे शुक्ला इसरो के मानव अंतरिक्ष मिशन के प्रमुख चेहरों में से एक हैं। वह अक्सर अंतरिक्ष जीवन से जुड़े अनुभव साझा करते हैं, जो आम लोगों को यह समझने में मदद करते हैं कि शून्य गुरुत्वाकर्षण में रोज़मर्रा के काम किस तरह बिल्कुल अलग हो जाते हैं। यह किस्सा इसी कड़ी में एक और यादगार अध्याय जोड़ता है और भारत के बढ़ते अंतरिक्ष कार्यक्रम को एक मानवीय चेहरा देता है।