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खैबर पख्तूनख्वा के गुरुद्वारे में सिख दंपति की हत्या: मानवाधिकार संगठनों ने उठाए अल्पसंख्यक सुरक्षा पर गंभीर सवाल

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खैबर पख्तूनख्वा के गुरुद्वारे में सिख दंपति की हत्या: मानवाधिकार संगठनों ने उठाए अल्पसंख्यक सुरक्षा पर गंभीर सवाल

सारांश

मर्दान के गुरुद्वारे में सिख सेवादार दंपति की हत्या महज एक अपराध नहीं — यह पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों पर हिंसा के उस चक्र की अगली कड़ी है जो 2022 के पेशावर से होते हुए आज मर्दान तक पहुंचा है। एचआरसीपी और वीओपीएम दोनों ने इसे एक पैटर्न करार दिया है जहाँ हमलावर अज्ञात रहते हैं और न्याय मिलना दुर्लभ है।

मुख्य बातें

खैबर पख्तूनख्वा के मर्दान स्थित गुरुद्वारे में अज्ञात हमलावरों ने 70 वर्षीय सिख सेवादार जगन्नाथ और उनकी पत्नी की गोली मारकर हत्या की।
पाकिस्तान के मानवाधिकार आयोग (एचआरसीपी) ने घटना की कड़ी निंदा की और 2014 के सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के क्रियान्वयन पर सख्त निगरानी की मांग की।
रिपोर्टों के अनुसार कथित हमलावर गुरुद्वारे की सुरक्षा व्यवस्था से जुड़ा था — एचआरसीपी ने इस पहलू की विशेष जांच की मांग की।
वीओपीएम ने इसे पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों पर हिंसा के व्यापक पैटर्न का हिस्सा बताया, जिसमें 2022 के पेशावर हमले का भी उल्लेख किया।
एचआरसीपी ने मर्दान डीपीओ द्वारा शुरुआती चरण में घटना को 'व्यक्तिगत दुश्मनी' बताने पर भी सवाल उठाए।

पाकिस्तान के खैबर पख्तूनख्वा प्रांत के मर्दान स्थित एक गुरुद्वारे में अज्ञात हमलावरों ने 70 वर्षीय सिख सेवादार जगन्नाथ और उनकी पत्नी की गोली मारकर हत्या कर दी। इस जघन्य वारदात के बाद पाकिस्तान के मानवाधिकार आयोग (एचआरसीपी) और अल्पसंख्यक अधिकार संगठन वॉइस ऑफ पाकिस्तान माइनॉरिटी (वीओपीएम) ने कड़ी निंदा करते हुए देश में धार्मिक अल्पसंख्यकों की सुरक्षा को लेकर गंभीर चिंता जताई है।

घटनाक्रम: कैसे हुई वारदात

यह हमला मर्दान के बाबू मोहल्ला, ख्वाजा गंज बाजार क्षेत्र में स्थित गुरुद्वारे के अंदर हुआ। कथित तौर पर अज्ञात हमलावरों ने गुरुद्वारे में घुसकर गोलीबारी की, जिसमें जगन्नाथ और उनकी पत्नी की मौके पर ही मृत्यु हो गई। वारदात को अंजाम देने के बाद हमलावर फरार हो गए और अब तक उनकी गिरफ्तारी नहीं हुई है।

एचआरसीपी ने अपने बयान में यह भी रेखांकित किया कि रिपोर्टों के अनुसार कथित हमलावर स्थल की सुरक्षा व्यवस्था से जुड़ा हुआ था — एक ऐसा तथ्य जो इस मामले को और अधिक गंभीर बनाता है।

एचआरसीपी की प्रतिक्रिया और जांच पर सवाल

पाकिस्तान के मानवाधिकार आयोग (एचआरसीपी) ने इस घटना की कड़ी निंदा करते हुए कहा, 'यह घटना न केवल धार्मिक अल्पसंख्यकों और उनके पूजा स्थलों की सुरक्षा को लेकर गंभीर सवाल खड़े करती है, बल्कि उन परिस्थितियों पर भी प्रश्न उठाती है जिनमें यह हमला हुआ। ऐसी रिपोर्ट्स कि कथित हमलावर स्थल की सुरक्षा व्यवस्था से जुड़ा हुआ था, विशेष जांच की मांग करती हैं और धार्मिक अल्पसंख्यकों की सुरक्षा संबंधी 2014 के सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के क्रियान्वयन में अधिक सख्त जांच-पड़ताल और निगरानी की आवश्यकता को रेखांकित करती हैं।'

आयोग ने मर्दान के जिला पुलिस अधिकारी (डीपीओ) द्वारा शुरुआती चरण में इस घटना को 'व्यक्तिगत दुश्मनी' से जोड़ने पर भी आपत्ति जताई। एचआरसीपी ने स्पष्ट पूछा कि जांच के इतने प्रारंभिक चरण में इतने आत्मविश्वास के साथ ऐसे मकसद का निष्कर्ष किस आधार पर निकाला गया।

वीओपीएम का बयान: 'यह एक पैटर्न है'

अल्पसंख्यक अधिकारों के लिए सक्रिय संगठन वॉइस ऑफ पाकिस्तान माइनॉरिटी (वीओपीएम) ने इस हत्याकांड को एक व्यापक और चिंताजनक प्रवृत्ति का हिस्सा बताया। संगठन ने कहा, 'यह केवल दो व्यक्तियों पर हमला नहीं था; यह पाकिस्तान में धार्मिक अल्पसंख्यकों की सुरक्षा के उस कमजोर वादे पर हमला था। अधिकारियों ने इसे लक्षित हमला बताया है, लेकिन बार-बार होने वाली हिंसा के सामने इस तरह की भाषा अब सामान्य और लगभग यांत्रिक हो चुकी है।'

वीओपीएम ने आगे कहा कि इस पैटर्न में हमेशा अल्पसंख्यक पीड़ित होते हैं, धार्मिक स्थल असुरक्षित रहते हैं, हमलावर अज्ञात बने रहते हैं और जांच का वही ढर्रा चलता है जो शायद ही कभी न्याय दिला पाता है। संगठन ने 2022 के पेशावर हमले से लेकर वर्तमान मर्दान घटना तक इस चक्र के जारी रहने पर गहरी चिंता व्यक्त की।

व्यापक संदर्भ: अल्पसंख्यकों पर हिंसा का सिलसिला

गौरतलब है कि पाकिस्तान में धार्मिक अल्पसंख्यकों — जिनमें सिख, हिंदू और ईसाई समुदाय शामिल हैं — पर हमलों की घटनाएं लंबे समय से चिंता का विषय रही हैं। 2014 में पाकिस्तान के सर्वोच्च न्यायालय ने अल्पसंख्यकों की सुरक्षा के लिए विशेष निर्देश दिए थे, लेकिन मानवाधिकार संगठनों का कहना है कि उनका क्रियान्वयन अब तक अपर्याप्त रहा है। यह ऐसे समय में आया है जब अंतरराष्ट्रीय मंचों पर पाकिस्तान में अल्पसंख्यक सुरक्षा को लेकर दबाव बढ़ रहा है।

आगे की राह: क्या होगा अब

एचआरसीपी ने पाकिस्तानी अधिकारियों से मांग की है कि मामले की सभी संभावित दिशाओं में निष्पक्ष और गहन जांच की जाए और दोषियों को कानून के अनुसार जवाबदेह ठहराया जाए। मानवाधिकार संगठनों की यह मांग है कि 2014 के सर्वोच्च न्यायालय के आदेश का कड़ाई से पालन सुनिश्चित किया जाए ताकि भविष्य में इस तरह की घटनाओं को रोका जा सके।

संपादकीय दृष्टिकोण

दरअसल उस संस्थागत प्रवृत्ति पर उंगली उठाता है जो सांप्रदायिक हिंसा को 'सामान्य अपराध' में बदल देती है। 2014 के सर्वोच्च न्यायालय के आदेश के एक दशक बाद भी यदि गुरुद्वारों के भीतर सेवादार सुरक्षित नहीं हैं, तो यह कागज़ी आश्वासनों की सीमा को स्पष्ट करता है। असली परीक्षा यह है कि क्या इस बार जांच उस बिंदु तक पहुंचती है जहाँ दोषी सलाखों के पीछे जाएं — या यह भी उन अनगिनत मामलों की सूची में जुड़ जाए जो फाइलों में दब गए।
RashtraPress
6 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

खैबर पख्तूनख्वा के गुरुद्वारे में सिख दंपति की हत्या कैसे हुई?
अज्ञात हमलावरों ने पाकिस्तान के मर्दान स्थित बाबू मोहल्ला, ख्वाजा गंज बाजार क्षेत्र के गुरुद्वारे में घुसकर 70 वर्षीय सिख सेवादार जगन्नाथ और उनकी पत्नी को गोली मार दी। वारदात के बाद हमलावर मौके से फरार हो गए।
एचआरसीपी ने इस मामले में क्या मांग की है?
पाकिस्तान के मानवाधिकार आयोग (एचआरसीपी) ने मामले की सभी संभावित दिशाओं में गहन जांच और दोषियों को कानून के तहत जवाबदेह ठहराने की मांग की है। आयोग ने 2014 के सर्वोच्च न्यायालय के अल्पसंख्यक सुरक्षा आदेश के कड़े क्रियान्वयन पर भी जोर दिया है।
क्या इस हमले में कोई विशेष संदेह है?
रिपोर्टों के अनुसार कथित हमलावर गुरुद्वारे की सुरक्षा व्यवस्था से जुड़ा हुआ था, जिसे एचआरसीपी ने विशेष जांच का विषय बताया है। हालांकि अभी तक किसी की गिरफ्तारी नहीं हुई है और जांच जारी है।
वीओपीएम ने इस घटना को किस रूप में देखा?
वॉइस ऑफ पाकिस्तान माइनॉरिटी (वीओपीएम) ने इसे पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों पर हिंसा के व्यापक और चिंताजनक पैटर्न का हिस्सा बताया। संगठन ने 2022 के पेशावर हमले से लेकर मर्दान तक इस चक्र के जारी रहने पर गहरी चिंता जताई।
पाकिस्तान में अल्पसंख्यक सुरक्षा के लिए क्या कानूनी व्यवस्था है?
2014 में पाकिस्तान के सर्वोच्च न्यायालय ने धार्मिक अल्पसंख्यकों की सुरक्षा के लिए विशेष निर्देश जारी किए थे। मानवाधिकार संगठनों का कहना है कि एक दशक बाद भी इन निर्देशों का क्रियान्वयन अपर्याप्त बना हुआ है।
राष्ट्र प्रेस
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