क्या सोमनाथ मंदिर केवल आस्था का स्थल है, या यह भारत के हजारों साल के इतिहास को समेटे हुए है?
सारांश
Key Takeaways
- सोमनाथ मंदिर केवल पूजा का स्थान नहीं है, बल्कि यह भारतीय सभ्यता का प्रतीक है।
- मंदिर ने कई बार पुनर्निर्माण का अनुभव किया है, जो इसकी जीवटता को दर्शाता है।
- यह मंदिर आस्था और आत्मविश्वास का प्रतीक है, जो हर चुनौती का सामना कर सकता है।
- सोमनाथ का इतिहास हमें सिखाता है कि हम कभी हार नहीं मान सकते।
नई दिल्ली, 5 जनवरी (राष्ट्र प्रेस)। सोमनाथ मंदिर केवल एक पत्थर का ढांचा या पूजा का स्थान नहीं है। यह भारत की प्राचीन सभ्यता की आत्मा का प्रतीक है, जिसे हजारों वर्षों में कई हमलों का सामना करना पड़ा, लेकिन इसे कभी पूरी तरह से नष्ट नहीं किया जा सका। सोमनाथ की कहानी आस्था, स्मृति, और समय के साथ एक सभ्यता के रिश्ते का अद्भुत वर्णन करती है। इसे बार-बार तोड़ने के प्रयास हुए, लेकिन हर बार यह पहले से अधिक मजबूती के साथ खड़ा हुआ।
वर्ष 2026 भारत के लिए एक महत्वपूर्ण वर्ष है। यह सोमनाथ मंदिर पर हुए पहले बड़े आक्रमण की एक हजारवीं वर्षगांठ है, जब 1026 ईस्वी में गजनी के महमूद ने इस पवित्र स्थल पर हमला किया था। इसके अलावा, यह 1951 में आधुनिक सोमनाथ मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा के 75 वर्ष पूरे होने का वर्ष है। इस विनाश से पुनर्जागरण की यात्रा भारत की जीवटता को दर्शाती है। इसी ऐतिहासिक अवसर पर, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने लेख में इस क्षण को याद किया और इसके महत्व को उजागर किया।
अगर हम सोमनाथ की कहानी पर गौर करें, तो यह संभवतः दुनिया के इतिहास में एकमात्र स्थान है जिसे बार-बार नष्ट किया गया, लेकिन हर बार इसे पुनर्जीवित किया गया। के.एम. मुंशी, जो स्वतंत्रता सेनानी और नेहरू मंत्रिमंडल के मंत्री भी रहे, ने अपनी प्रसिद्ध किताब 'सोमनाथ: द श्राइन इटरनल' में कहा है कि सोमनाथ उतना ही प्राचीन है जितना सृष्टि। उनकी किताब में लिखे घटनाक्रम दर्शाते हैं कि सोमनाथ को मिटाने का हर प्रयास विफल रहा है।
मुंशी ने बताया कि महमूद गजनवी 18 अक्टूबर 1025 को सोमनाथ की ओर बढ़ा और लगभग 80 दिन बाद, 6 जनवरी 1026 को उसने इस किलेबंद मंदिर पर आक्रमण किया। इस हमले में लगभग 50,000 लोग मंदिर की रक्षा करते हुए मारे गए। इसके बाद गजनवी ने मंदिर को लूटा, गर्भगृह को अपवित्र किया, और शिवलिंग को तोड़ दिया। लेकिन यह कहानी यहीं समाप्त नहीं होती।
1299 में अलाउद्दीन खिलजी के सेनापति अलाफ खान ने फिर से मंदिर को नष्ट किया और मूर्ति के टुकड़े दिल्ली ले गया। कुछ वर्षों बाद, हिंदू शासकों ने इसे पुनर्निर्मित किया। 1394 में गुजरात के गवर्नर मुजफ्फर खान ने मंदिर को तोड़ा। 1459 में महमूद बेगड़ा ने भी सोमनाथ को अपवित्र किया। फिर भी, मंदिर किसी न किसी रूप में हमेशा विद्यमान रहा।
औरंगजेब के शासन काल में भी सोमनाथ को नहीं बख्शा गया। 1669 में उसने मंदिर को गिराने का आदेश दिया और 1702 में इसे पूरी तरह से नष्ट करने का फरमान जारी किया। 1706 में यहां मस्जिद का निर्माण किया गया। इसके बावजूद, श्रद्धा खत्म नहीं हुई। 1783 में रानी अहिल्याबाई होलकर ने पास में एक नया मंदिर बनवाया और शिवलिंग को सुरक्षित रखने के लिए उसे गुप्त रूप से जमीन के नीचे स्थापित किया।
यह रक्त, बलिदान, और आस्था की कहानी दर्शाती है कि कैसे सोमनाथ भारत के पुनर्जन्म का प्रतीक बन गया। जिन्होंने इसे समाप्त करने की कोशिश की, वे केवल इतिहास की किताबों में नाम बनकर रह गए, लेकिन सोमनाथ आज भी पूरे गर्व के साथ खड़ा है।
इस संपूर्ण कहानी में अल-बरूनी की गवाही भी महत्वपूर्ण है। वह 11वीं सदी का फारसी विद्वान था, जो महमूद गजनवी के साथ भारत आया और करीब 13 साल तक यहीं रहा। उसने किताब-उल-हिंद नाम की रचना की, जिसमें भारत की संस्कृति, धर्म, और विज्ञान का ईमानदारी से वर्णन किया गया है। अल-बरूनी ने महमूद द्वारा मथुरा और सोमनाथ में की गई लूट और तबाही का उल्लेख किया है। उसने लिखा कि इन आक्रमणों ने स्थानीय लोगों में मुसलमानों के प्रति नफरत को जन्म दिया।
अल-बरूनी ने यह भी बताया कि सोमनाथ केवल एक मंदिर नहीं था, बल्कि एक प्रमुख सांस्कृतिक और आर्थिक केंद्र था। यहां सोने के कलश, रत्नजड़ित मूर्तियां, अपार धन, और विद्वानों, कलाकारों, एवं व्यापारियों की मौजूदगी थी। यह मंदिर समुद्री व्यापार का एक बड़ा केंद्र भी था, जो भारत को अफ्रीका और चीन से जोड़ता था।
1890 के दशक में जब स्वामी विवेकानंद सोमनाथ पहुंचे, तो वे भी इसकी कहानी से गहराई से प्रभावित हुए। उन्होंने कहा था कि ऐसे मंदिर भारत के इतिहास को किताबों से कहीं अधिक गहराई से समझाते हैं। उन्होंने यह भी कहा कि ये मंदिर सौ बार टूटे और सौ बार फिर खड़े हुए, और हर बार पहले से ज्यादा मजबूत बनकर उभरे।
आजादी के बाद सोमनाथ का पुनर्निर्माण आधुनिक भारत की आत्मा से जुड़ा प्रश्न बन गया। सरदार वल्लभभाई पटेल ने 13 नवंबर 1947 को सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण की घोषणा की। उनके लिए यह कोई धार्मिक राजनीति नहीं, बल्कि सदियों की अपमानजनक गुलामी से उबरने का प्रतीक था। के.एम. मुंशी ने इसमें उनका पूरा साथ दिया।
हालांकि, इस निर्णय का विरोध भी हुआ। तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू सोमनाथ के पुनर्निर्माण और उद्घाटन से असहज थे। उन्होंने इसे 'हिंदू पुनरुत्थानवाद' बताया और कहा कि इससे विदेशों में भारत की छवि खराब होगी।
इसके बावजूद, राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद ने उद्घाटन किया और कहा कि अपनी सभ्यता और विरासत का सम्मान करना धर्मनिरपेक्षता के खिलाफ नहीं, बल्कि आत्मसम्मान की निशानी है।
आज सोमनाथ केवल एक मंदिर नहीं है, बल्कि एक जीवित संदेश है। यह बताता है कि जिन सभ्यताओं की जड़ें आस्था और आत्मविश्वास में होती हैं, उन्हें तलवारों और तोपों से खत्म नहीं किया जा सकता। हर गिरावट के बाद उठ खड़े होने की जो ताकत भारत ने दिखाई है, वही सोमनाथ की असली पहचान है। यही कारण है कि सोमनाथ केवल इतिहास नहीं, बल्कि आज और भविष्य की भी प्रेरणा है।