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सोन नदी जल समझौता: झारखंड को अतिरिक्त पानी नहीं, 1973 का बाणसागर आवंटन ही दोहराया — सरयू राय

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सोन नदी जल समझौता: झारखंड को अतिरिक्त पानी नहीं, 1973 का बाणसागर आवंटन ही दोहराया — सरयू राय

सारांश

सरयू राय का सीधा आरोप — 31 अगस्त का सोन नदी जल समझौता झारखंड के लिए कोई नई उपलब्धि नहीं है। 1973 के बाणसागर समझौते में तय 20 लाख एकड़ फीट पानी को ही नए रूप में पेश किया गया है, जबकि कनहर और उत्तर कोयल पर दशकों से लंबित परियोजनाएँ आज भी अधूरी हैं।

मुख्य बातें

सरयू राय ने दावा किया कि 31 अगस्त 2026 के सोन नदी जल समझौते से झारखंड को एक लोटा पानी भी अतिरिक्त नहीं मिला।
झारखंड का 20 लाख एकड़ फीट पानी का हिस्सा 1973 के बाणसागर समझौते में ही निर्धारित था।
इस आवंटन में कनहर नदी का 4.32 लाख और उत्तर कोयल का 15.627 लाख एकड़ फीट पानी शामिल है।
कदवन बांध का शिलान्यास 1980 में हुआ था, लेकिन परियोजना आज तक अधूरी है; मंडल बांध और ओरंगा योजना भी लंबित हैं।
राय ने झारखंड सरकार से केंद्र से विशेष सहायता पैकेज माँगने की अपील की।
जल विद्युत बंटवारे और झारखंड को मिलने वाले ठोस लाभ को लेकर समझौते में स्पष्टता का अभाव बताया गया।

जमशेदपुर पश्चिम के विधायक और झारखंड सरकार के पूर्व मंत्री सरयू राय ने 1 सितंबर 2026 को स्पष्ट किया कि 31 अगस्त को बिहार और झारखंड के बीच हुआ सोन नदी जल बंटवारा समझौता झारखंड को कोई नया जल आवंटन नहीं देता। उनके अनुसार, झारखंड के हिस्से का 20 लाख एकड़ फीट पानी वर्ष 1973 के बाणसागर समझौते में ही निर्धारित हो चुका था — नया समझौता उसी पुराने आवंटन की पुनरावृत्ति मात्र है।

बाणसागर समझौते की पृष्ठभूमि

राय ने विस्तार से बताया कि बाणसागर समझौते के तहत अविभाजित बिहार को इंद्रपुरी बराज पर 7.75 एमएएफ (मिलियन एकड़ फीट) पानी आवंटित किया गया था। इसमें से 5 एमएएफ पानी करीब 150 वर्ष पुराने सोन नहर क्षेत्र के लिए पहले से आरक्षित था। शेष 2.75 एमएएफ यानी 27.50 लाख एकड़ फीट में बिहार और झारखंड का हिस्सा तय होना था, जिसमें से झारखंड के लिए 20 लाख एकड़ फीट निर्धारित किया गया था।

उन्होंने सवाल उठाया कि 31 अगस्त के समझौते में झारखंड को दिया गया यह पानी नया कहाँ से आया। राय के अनुसार, इस आवंटन में मुख्य रूप से झारखंड की कनहर और उत्तर कोयल नदियों तथा उनकी सहायक नदियों का पानी शामिल है — साथ ही उन स्वतंत्र जलग्रहण क्षेत्रों का पानी भी, जो सीधे सोन नदी में मिलते हैं।

नदी-वार जल विभाजन का ब्यौरा

राय ने आँकड़े देते हुए बताया कि इस 20 लाख एकड़ फीट में कनहर नदी का करीब 4.32 लाख एकड़ फीट और उत्तर कोयल नदी का 15.627 लाख एकड़ फीट पानी शामिल है। बाणसागर समझौते के समय कनहर की कुल जल उपलब्धता करीब 24 लाख एकड़ फीट और उत्तर कोयल की 21 लाख एकड़ फीट आँकी गई थी।

उन्होंने यह भी बताया कि उत्तर कोयल की 21 लाख एकड़ फीट क्षमता में से 15.627 लाख एकड़ फीट पानी का उपयोग फिलहाल मोहम्मदगंज बराज से पलामू के हुसैनाबाद, हरिहरगंज और बिहार के नवीनगर की नहरों के ज़रिए हो रहा है। शेष 5.373 लाख एकड़ फीट पानी सीधे इंद्रपुरी बराज की ओर बह रहा है।

लंबित परियोजनाओं की दशकों पुरानी कहानी

राय ने बताया कि कनहर के पानी के उपयोग के लिए छत्तीसगढ़-झारखंड सीमा पर बाराडीह में बांध बनाने की योजना थी, जो अब तक साकार नहीं हुई। कदवन गांव के समीप बांध का शिलान्यास बिहार के तत्कालीन मुख्यमंत्री डॉ. जगन्नाथ मिश्र ने 1980 में किया था, लेकिन यह परियोजना आज तक अधूरी है।

उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि मंडल बांध का निर्माण नहीं हो सका, ओरंगा की प्रस्तावित योजना भी आगे नहीं बढ़ी, और छठी पंचवर्षीय योजना में पलामू की करीब आधा दर्जन जल संसाधन योजनाओं का उल्लेख था — वे भी अपूर्ण रहीं। राय के मुताबिक, मंडल बांध बनने के बाद ही इस शेष पानी का उपयोग बिहार और झारखंड की सहमति से किया जा सकेगा।

समझौते पर सवाल और माँगें

राय ने 31 अगस्त के समझौते को 'नई बोतल में पुरानी शराब' करार दिया। उनका कहना है कि संभवतः इसमें कदवन बांध के निर्माण का प्रावधान किया गया है, लेकिन इससे झारखंड को क्या ठोस लाभ मिलेगा और इसके बदले बिहार को झारखंड से क्या मिलेगा — यह स्पष्ट नहीं है। बांध से उत्पन्न होने वाली जल विद्युत के बंटवारे को लेकर भी समझौते में अस्पष्टता का उन्होंने दावा किया।

राय ने माँग की कि झारखंड सरकार को केंद्र से विशेष सहायता पैकेज लेना चाहिए, क्योंकि इन योजनाओं के दशकों तक लंबित रहने में केंद्र सरकार और केंद्रीय जल आयोग की भूमिका भी रही है। हालाँकि, उन्होंने पुराने विवाद पर नए सिरे से समझौते की पहल के लिए बिहार और झारखंड के मुख्यमंत्रियों को बधाई भी दी।

यह विवाद ऐसे समय में उभरा है जब झारखंड में जल संसाधन प्रबंधन और अंतर-राज्यीय नदी जल साझेदारी पर राजनीतिक बहस तेज़ हो रही है। आने वाले दिनों में झारखंड विधानसभा में इस मुद्दे पर और विमर्श की संभावना है।

संपादकीय दृष्टिकोण

और इस विफलता की जवाबदेही केंद्र, राज्य या केंद्रीय जल आयोग में से किस पर तय होगी। जब तक ये परियोजनाएँ कागज़ पर ही रहेंगी, तब तक कोई भी समझौता झारखंड के किसान तक पानी नहीं पहुँचाएगा।
RashtraPress
1 सितंबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

31 अगस्त का सोन नदी जल बंटवारा समझौता क्या है?
यह बिहार और झारखंड के बीच 31 अगस्त 2026 को हुआ एक अंतर-राज्यीय जल साझेदारी समझौता है, जिसमें सोन नदी के जल के उपयोग को लेकर दोनों राज्यों के बीच सहमति बनाई गई। सरयू राय के अनुसार, यह समझौता 1973 के बाणसागर समझौते में पहले से तय आवंटन की पुनरावृत्ति है, कोई नया जल आवंटन नहीं।
झारखंड को सोन नदी से कितना पानी आवंटित है?
बाणसागर समझौते के तहत झारखंड के लिए 20 लाख एकड़ फीट पानी निर्धारित किया गया था। इसमें कनहर नदी का 4.32 लाख एकड़ फीट और उत्तर कोयल नदी का 15.627 लाख एकड़ फीट शामिल है।
कदवन बांध और मंडल बांध क्यों नहीं बन सके?
कदवन बांध का शिलान्यास तत्कालीन बिहार के मुख्यमंत्री डॉ. जगन्नाथ मिश्र ने 1980 में किया था, लेकिन यह परियोजना आज तक पूरी नहीं हो सकी। सरयू राय के अनुसार, मंडल बांध और ओरंगा योजना समेत पलामू की करीब आधा दर्जन जल संसाधन परियोजनाएँ भी दशकों से लंबित हैं, जिसमें केंद्र और केंद्रीय जल आयोग की भी भूमिका रही है।
सरयू राय ने झारखंड सरकार से क्या माँग की है?
सरयू राय ने माँग की है कि झारखंड सरकार केंद्र सरकार से लंबित जल परियोजनाओं के लिए विशेष सहायता पैकेज की माँग करे। उनका तर्क है कि इन परियोजनाओं के दशकों तक अधूरे रहने में केंद्र और केंद्रीय जल आयोग की भूमिका भी है।
क्या नए समझौते में जल विद्युत बंटवारे का प्रावधान है?
सरयू राय के अनुसार, 31 अगस्त के समझौते में जल विद्युत बंटवारे को लेकर स्थिति स्पष्ट नहीं है। उन्होंने यह भी कहा कि कदवन बांध निर्माण से झारखंड को क्या ठोस लाभ मिलेगा और बिहार को झारखंड से क्या मिलेगा — यह भी समझौते में अस्पष्ट है।
राष्ट्र प्रेस
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