सोन नदी जल समझौता: झारखंड को अतिरिक्त पानी नहीं, 1973 का बाणसागर आवंटन ही दोहराया — सरयू राय
सारांश
मुख्य बातें
जमशेदपुर पश्चिम के विधायक और झारखंड सरकार के पूर्व मंत्री सरयू राय ने 1 सितंबर 2026 को स्पष्ट किया कि 31 अगस्त को बिहार और झारखंड के बीच हुआ सोन नदी जल बंटवारा समझौता झारखंड को कोई नया जल आवंटन नहीं देता। उनके अनुसार, झारखंड के हिस्से का 20 लाख एकड़ फीट पानी वर्ष 1973 के बाणसागर समझौते में ही निर्धारित हो चुका था — नया समझौता उसी पुराने आवंटन की पुनरावृत्ति मात्र है।
बाणसागर समझौते की पृष्ठभूमि
राय ने विस्तार से बताया कि बाणसागर समझौते के तहत अविभाजित बिहार को इंद्रपुरी बराज पर 7.75 एमएएफ (मिलियन एकड़ फीट) पानी आवंटित किया गया था। इसमें से 5 एमएएफ पानी करीब 150 वर्ष पुराने सोन नहर क्षेत्र के लिए पहले से आरक्षित था। शेष 2.75 एमएएफ यानी 27.50 लाख एकड़ फीट में बिहार और झारखंड का हिस्सा तय होना था, जिसमें से झारखंड के लिए 20 लाख एकड़ फीट निर्धारित किया गया था।
उन्होंने सवाल उठाया कि 31 अगस्त के समझौते में झारखंड को दिया गया यह पानी नया कहाँ से आया। राय के अनुसार, इस आवंटन में मुख्य रूप से झारखंड की कनहर और उत्तर कोयल नदियों तथा उनकी सहायक नदियों का पानी शामिल है — साथ ही उन स्वतंत्र जलग्रहण क्षेत्रों का पानी भी, जो सीधे सोन नदी में मिलते हैं।
नदी-वार जल विभाजन का ब्यौरा
राय ने आँकड़े देते हुए बताया कि इस 20 लाख एकड़ फीट में कनहर नदी का करीब 4.32 लाख एकड़ फीट और उत्तर कोयल नदी का 15.627 लाख एकड़ फीट पानी शामिल है। बाणसागर समझौते के समय कनहर की कुल जल उपलब्धता करीब 24 लाख एकड़ फीट और उत्तर कोयल की 21 लाख एकड़ फीट आँकी गई थी।
उन्होंने यह भी बताया कि उत्तर कोयल की 21 लाख एकड़ फीट क्षमता में से 15.627 लाख एकड़ फीट पानी का उपयोग फिलहाल मोहम्मदगंज बराज से पलामू के हुसैनाबाद, हरिहरगंज और बिहार के नवीनगर की नहरों के ज़रिए हो रहा है। शेष 5.373 लाख एकड़ फीट पानी सीधे इंद्रपुरी बराज की ओर बह रहा है।
लंबित परियोजनाओं की दशकों पुरानी कहानी
राय ने बताया कि कनहर के पानी के उपयोग के लिए छत्तीसगढ़-झारखंड सीमा पर बाराडीह में बांध बनाने की योजना थी, जो अब तक साकार नहीं हुई। कदवन गांव के समीप बांध का शिलान्यास बिहार के तत्कालीन मुख्यमंत्री डॉ. जगन्नाथ मिश्र ने 1980 में किया था, लेकिन यह परियोजना आज तक अधूरी है।
उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि मंडल बांध का निर्माण नहीं हो सका, ओरंगा की प्रस्तावित योजना भी आगे नहीं बढ़ी, और छठी पंचवर्षीय योजना में पलामू की करीब आधा दर्जन जल संसाधन योजनाओं का उल्लेख था — वे भी अपूर्ण रहीं। राय के मुताबिक, मंडल बांध बनने के बाद ही इस शेष पानी का उपयोग बिहार और झारखंड की सहमति से किया जा सकेगा।
समझौते पर सवाल और माँगें
राय ने 31 अगस्त के समझौते को 'नई बोतल में पुरानी शराब' करार दिया। उनका कहना है कि संभवतः इसमें कदवन बांध के निर्माण का प्रावधान किया गया है, लेकिन इससे झारखंड को क्या ठोस लाभ मिलेगा और इसके बदले बिहार को झारखंड से क्या मिलेगा — यह स्पष्ट नहीं है। बांध से उत्पन्न होने वाली जल विद्युत के बंटवारे को लेकर भी समझौते में अस्पष्टता का उन्होंने दावा किया।
राय ने माँग की कि झारखंड सरकार को केंद्र से विशेष सहायता पैकेज लेना चाहिए, क्योंकि इन योजनाओं के दशकों तक लंबित रहने में केंद्र सरकार और केंद्रीय जल आयोग की भूमिका भी रही है। हालाँकि, उन्होंने पुराने विवाद पर नए सिरे से समझौते की पहल के लिए बिहार और झारखंड के मुख्यमंत्रियों को बधाई भी दी।
यह विवाद ऐसे समय में उभरा है जब झारखंड में जल संसाधन प्रबंधन और अंतर-राज्यीय नदी जल साझेदारी पर राजनीतिक बहस तेज़ हो रही है। आने वाले दिनों में झारखंड विधानसभा में इस मुद्दे पर और विमर्श की संभावना है।