सुप्रीम कोर्ट का ओबीसी क्रीमी लेयर पर नया निर्णय, सैलरी से नहीं होगा निर्धारण
सारांश
Key Takeaways
- क्रीमी लेयर का निर्धारण केवल माता-पिता की सैलरी पर निर्भर नहीं होगा।
- आय की सीमा 8 लाख रुपए प्रति वर्ष से कम होनी चाहिए।
- कृषि आय को क्रीमी लेयर से बाहर रखा जाएगा।
- सरकारी और निजी क्षेत्र के कर्मचारियों के बच्चों के साथ समान व्यवहार किया जाएगा।
- इस फैसले का प्रभाव ओबीसी उम्मीदवारों के लिए सकारात्मक होगा।
नई दिल्ली, 12 मार्च (राष्ट्र प्रेस)। सुप्रीम कोर्ट ने ओबीसी के नॉन-क्रीमी लेयर (एनसीएल) के निर्धारण में एक महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। 11 मार्च को कोर्ट ने स्पष्ट किया कि क्रीमी लेयर का निर्धारण केवल माता-पिता की सैलरी या आय पर निर्भर नहीं करेगा, बल्कि 1993 के मूल दिशानिर्देशों के अनुसार पद की स्थिति और अन्य महत्वपूर्ण फैक्टर्स को भी ध्यान में लिया जाएगा।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि यदि माता-पिता सरकारी नौकरी में ग्रुप सी या ग्रुप डी (क्लास III या IV) में कार्यरत हैं, तो उनकी सैलरी को क्रीमी लेयर के निर्धारण में नहीं जोड़ा जाएगा। इसके साथ ही, कृषि से होने वाली आय को भी पूरी तरह बाहर रखा जाएगा। क्रीमी लेयर का निर्धारण करने के लिए केवल 'अन्य स्रोतों' (जैसे व्यवसाय, संपत्ति, किराया आदि) से परिवार की कुल आय तीन लगातार वर्षों में औसतन 8 लाख रुपए प्रति वर्ष से कम होनी चाहिए।
इस निर्णय में कोर्ट ने 2004 के कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग के उस पत्र के पैरा 9 को अमान्य घोषित कर दिया है, जिसमें निजी क्षेत्र या पीएसयू कर्मचारियों की सैलरी को क्रीमी लेयर में शामिल करने की बात कही गई थी। कोर्ट ने इसे भेदभावपूर्ण बताया और कहा कि सरकारी कर्मचारियों के बच्चों के साथ और निजी/पीएसयू कर्मचारियों के बच्चों के साथ भिन्न व्यवहार नहीं किया जा सकता। जब तक पीएसयू या प्राइवेट पोस्ट को सरकारी ग्रुप थर्ड या फोर्थ के साथ समकक्षता नहीं दी जाती, तब तक केवल 1993 के मूल आदेश (ओएम) लागू रहेंगे।
यह फैसला उन हजारों ओबीसी उम्मीदवारों के लिए एक बड़ी राहत है, जिन्हें पहले सैलरी या अन्य गलत व्याख्या के कारण क्रीमी लेयर मानकर आरक्षण से वंचित रखा गया था। ऐसे लोग सरकारी नौकरी में हैं, लेकिन सही कैडर या पद में नहीं पहुंच पाए। कोर्ट ने इस निर्णय को रेट्रोस्पेक्टिव (पिछली तारीख से) लागू करने का निर्देश दिया है। डीओपीटी को इस फैसले को लागू करने के लिए 6 महीने का समय दिया गया है। आवश्यकता पड़ने पर सुपरन्यूमरेरी पोस्ट्स (अतिरिक्त पद) बनाए जाएंगे, ताकि अन्य श्रेणी के कर्मचारियों की सीनियरिटी प्रभावित न हो।
आगे चलकर सिविल सर्विसेज परीक्षा में वैध ओबीसी-एनसीएल सर्टिफिकेट (जिला मजिस्ट्रेट या तहसीलदार द्वारा जारी) को प्राथमिकता दी जाएगी और केवल सैलरी आधारित रिजेक्शन बंद हो जाएगा।
इस निर्णय से ओबीसी आरक्षण का असली उद्देश्य बहाल होगा, जो पिछड़े वर्ग के वास्तविक जरूरतमंदों तक लाभ पहुंचाने का है। रोहित नाथन (सीएसई-2012) और केतन बैच (सीएसई-2015) जैसे कई मामलों में डीओपीटी को 6 महीने में दोबारा जांच कर ओबीसी-एनसीएल स्टेटस बहाल करना होगा।