सुप्रीम कोर्ट ने फांसी की व्यवस्था खत्म करने की याचिका खारिज की, केंद्र को विकल्प तलाशने की छूट
सारांश
मुख्य बातें
सर्वोच्च न्यायालय ने 18 अगस्त 2026 को मौत की सजा पाए दोषियों को फांसी देने की मौजूदा व्यवस्था को असंवैधानिक घोषित करने की माँग वाली जनहित याचिका खारिज कर दी। पीठ ने स्पष्ट किया कि वर्तमान परिस्थितियों में फांसी की प्रक्रिया को संविधान के विरुद्ध नहीं माना जा सकता, हालाँकि केंद्र सरकार को यह स्वतंत्रता दी गई कि वह भविष्य में मृत्युदंड लागू करने के वैकल्पिक तरीकों पर विचार कर सकती है।
याचिका की पृष्ठभूमि
यह जनहित याचिका अधिवक्ता ऋषि मल्होत्रा ने दाखिल की थी। याचिका में तर्क दिया गया था कि किसी व्यक्ति को फांसी पर लटकाकर उसकी मृत्यु तक प्रतीक्षा करना न तो मानवीय है और न ही गरिमापूर्ण। याचिकाकर्ता ने माँग की थी कि मृत्युदंड लागू करने के लिए ऐसा तरीका अपनाया जाए जिसमें दोषी को न्यूनतम पीड़ा हो और उसकी मानवीय गरिमा बनी रहे। याचिका में लेथल इंजेक्शन सहित कई वैकल्पिक तरीकों का उल्लेख किया गया था।
सुनवाई में उठे प्रमुख बिंदु
मामले की सुनवाई जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने की। सुनवाई के दौरान प्रोजेक्ट 39ए की ओर से भी वैकल्पिक तरीकों पर दलीलें प्रस्तुत की गईं और अन्य देशों में मृत्युदंड लागू करने के अनुभवों का हवाला दिया गया। हालाँकि, यह भी स्वीकार किया गया कि फांसी के प्रस्तावित विकल्पों में भी व्यावहारिक, चिकित्सकीय और मानवीय चुनौतियाँ मौजूद हैं।
अदालत ने सुनवाई के दौरान एक महत्त्वपूर्ण पहलू — फांसी देने वाले जल्लाद पर पड़ने वाले मानसिक प्रभाव — पर भी ध्यान दिया। यह ऐसे समय में आया है जब मृत्युदंड की मानवीयता को लेकर वैश्विक बहस तेज हो रही है।
केंद्र सरकार का पक्ष
केंद्र सरकार की ओर से अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमण उपस्थित हुए। सरकार ने अदालत को बताया कि मृत्युदंड लागू करने के वैकल्पिक तरीकों पर विशेषज्ञ स्तर पर विचार किया जा सकता है। इसका अर्थ यह है कि भविष्य में सरकार वैज्ञानिक और चिकित्सकीय आधार पर फांसी के विकल्प तलाश सकती है, भले ही न्यायालय ने मौजूदा व्यवस्था को असंवैधानिक मानने से इनकार कर दिया।
कानूनी संदर्भ और महत्त्व
गौरतलब है कि भारत में मृत्युदंड की संवैधानिकता को सर्वोच्च न्यायालय पहले भी बरकरार रख चुका है। बचन सिंह बनाम पंजाब राज्य (1980) के ऐतिहासिक फैसले में स्थापित 'दुर्लभतम में दुर्लभ' सिद्धांत आज भी मृत्युदंड देने का आधार है। यह याचिका उस व्यापक बहस का हिस्सा है जो मृत्युदंड की विधि पर केंद्रित है, न कि उसकी संवैधानिकता पर।
आगे की राह
न्यायालय के इस निर्णय के बाद अब गेंद केंद्र सरकार के पाले में है। यदि सरकार वैकल्पिक तरीकों पर विशेषज्ञ समिति गठित करती है, तो यह भारत में मृत्युदंड की प्रक्रिया में एक ऐतिहासिक बदलाव की शुरुआत हो सकती है। फिलहाल, फांसी की मौजूदा व्यवस्था कानूनी रूप से वैध बनी रहेगी।