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सुप्रीम कोर्ट ने फांसी पर रोक से इनकार किया, सरकार को विकल्प तलाशने की छूट

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सुप्रीम कोर्ट ने फांसी पर रोक से इनकार किया, सरकार को विकल्प तलाशने की छूट

सारांश

सर्वोच्च न्यायालय ने फांसी पर रोक से इनकार किया, लेकिन सरकार को मानवीय विकल्प तलाशने की छूट दी। 2017 की याचिका पर आया यह फैसला भारत में मृत्युदंड के तरीके पर बहस को नई दिशा देता है — न्यायालय ने 1983 के संविधान पीठ के फैसले को भी अछूता रखा।

मुख्य बातें

सर्वोच्च न्यायालय ने 18 अगस्त 2026 को फांसी द्वारा मृत्युदंड पर रोक लगाने से इनकार किया।
जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने फांसी की जगह कोई न्यायिक आदेश जारी नहीं किया।
1983 के 'दीना दयाल बनाम भारत सरकार' संविधान पीठ के फैसले पर पुनर्विचार से भी इनकार।
केंद्र सरकार को मृत्युदंड के मानवीय एवं वैज्ञानिक विकल्पों पर विचार करने की स्वतंत्रता दी गई।
वरिष्ठ अधिवक्ता मीनाक्षी अरोड़ा ने विशेषज्ञ समिति गठित करने का सुझाव दिया।
याचिका ऋषि मल्होत्रा द्वारा 2017 में दायर की गई थी, जिसमें सीआरपीसी धारा 354(5) को चुनौती दी गई थी।

सर्वोच्च न्यायालय ने मंगलवार, 18 अगस्त को देश में फांसी द्वारा मृत्युदंड के तरीके पर प्रतिबंध लगाने से स्पष्ट इनकार कर दिया। हालांकि, न्यायालय ने केंद्र सरकार और संबंधित पक्षों को फांसी के व्यावहारिक एवं वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित विकल्पों पर विचार-विमर्श करने की अनुमति दी।

मुख्य घटनाक्रम

जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की खंडपीठ ने फांसी को मृत्युदंड के तरीके के रूप में बदलने के लिए कोई न्यायिक आदेश जारी करने से मना कर दिया। यह सुनवाई वरिष्ठ अधिवक्ता ऋषि मल्होत्रा द्वारा 2017 में दायर एक याचिका पर हो रही थी, जिसमें भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) की पूर्ववर्ती धारा सीआरपीसी 354(5) के तहत फांसी के प्रावधान की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी गई थी।

खंडपीठ ने 'दीना दयाल बनाम भारत सरकार' मामले में 1983 की संविधान पीठ के उस ऐतिहासिक फैसले पर पुनर्विचार से भी इनकार कर दिया, जिसमें फांसी को संवैधानिक रूप से वैध ठहराया गया था। गौरतलब है कि यह मामला 'सबसे दुर्लभ मामलों' में दी जाने वाली मौत की सजा के संदर्भ में है।

याचिकाकर्ता के तर्क

याचिकाकर्ता ऋषि मल्होत्रा ने तर्क दिया कि 'गरिमा के साथ मरने का अधिकार' संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार का अभिन्न हिस्सा है। उन्होंने फांसी को 'क्रूर और बर्बर' प्रक्रिया करार दिया और इसके स्थान पर घातक इंजेक्शन जैसे विकल्पों को अपनाने की माँग की, जैसा कि कुछ अन्य देशों में प्रचलन में है। उन्होंने यह भी सुझाव दिया कि मृत्युदंड के दोषियों को सजा के तरीके को चुनने का विकल्प दिया जाना चाहिए।

विशेषज्ञ की राय

सुनवाई के दौरान न्यायालय ने 'प्रोजेक्ट 39ए' से जुड़ी वरिष्ठ अधिवक्ता मीनाक्षी अरोड़ा की राय भी माँगी। यह एक आपराधिक न्याय कार्यक्रम है जो मृत्युदंड के दोषियों को कानूनी सहायता एवं प्रतिनिधित्व प्रदान करता है। अरोड़ा ने सुझाव दिया कि इस मामले को एक विशेषज्ञ समिति को सौंपा जाए, क्योंकि घातक इंजेक्शन की विधि को पूर्णतः सफल नहीं पाया गया है।

सरकार की स्थिति और आगे का रास्ता

सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि भविष्य में केंद्र सरकार फांसी के विकल्पों पर स्वतंत्र रूप से विचार कर सकती है — विशेषकर ऐसे विकल्प जो मृत्युदंड के दोषियों की मानवीय गरिमा सुनिश्चित करें और उन्हें न्यूनतम पीड़ा दें। यह ऐसे समय में आया है जब वैश्विक स्तर पर मृत्युदंड के तरीकों को लेकर बहस तेज हो रही है और कई देश फांसी को समाप्त कर चुके हैं। भारत में यह प्रश्न न्यायिक, नैतिक और विधायी — तीनों स्तरों पर खुला बना हुआ है।

संपादकीय दृष्टिकोण

न क्रांतिकारी बदलाव। न्यायालय ने 1983 के फैसले को छेड़े बिना सरकार के दरवाज़े खुले छोड़ दिए, जो व्यावहारिक दृष्टि से समझदारी है, लेकिन यह सवाल अनुत्तरित रहता है कि क्या विधायिका इस 'छूट' का उपयोग करेगी। घातक इंजेक्शन की विफलताओं के वैश्विक साक्ष्य और विशेषज्ञ समिति की सिफारिश को देखते हुए, यह मामला न्यायिक दरवाज़े से बाहर निकलकर नीतिगत जड़ता की परीक्षा बन गया है। जब तक केंद्र सरकार ठोस कदम नहीं उठाती, यह 'छूट' महज़ एक औपचारिकता बनकर रह जाएगी।
RashtraPress
19 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

सुप्रीम कोर्ट ने फांसी पर रोक लगाने से क्यों इनकार किया?
सर्वोच्च न्यायालय ने 1983 के 'दीना दयाल बनाम भारत सरकार' संविधान पीठ के फैसले को आधार मानते हुए फांसी को संवैधानिक रूप से वैध माना और उस पर पुनर्विचार से इनकार किया। न्यायालय ने कहा कि यह विषय विधायिका और कार्यपालिका के विवेकाधिकार में आता है, इसलिए न्यायिक आदेश जारी करना उचित नहीं होगा।
याचिकाकर्ता ऋषि मल्होत्रा ने क्या माँग की थी?
वरिष्ठ अधिवक्ता ऋषि मल्होत्रा ने 2017 में दायर याचिका में सीआरपीसी धारा 354(5) के तहत फांसी के प्रावधान को असंवैधानिक घोषित करने की माँग की थी। उन्होंने घातक इंजेक्शन जैसे विकल्पों को अपनाने और दोषियों को सजा का तरीका चुनने का अधिकार देने की भी अपील की।
क्या भारत में फांसी की जगह कोई और तरीका अपनाया जा सकता है?
सर्वोच्च न्यायालय ने केंद्र सरकार को वैज्ञानिक एवं मानवीय दृष्टि से प्रमाणित विकल्पों पर विचार करने की स्वतंत्रता दी है। हालांकि, 'प्रोजेक्ट 39ए' की वरिष्ठ अधिवक्ता मीनाक्षी अरोड़ा ने बताया कि घातक इंजेक्शन भी पूरी तरह सफल नहीं रहा है और इसके लिए एक विशेषज्ञ समिति गठित करने का सुझाव दिया।
'दीना दयाल बनाम भारत सरकार' का मामला क्या है?
यह 1983 का सर्वोच्च न्यायालय की संविधान पीठ का ऐतिहासिक फैसला है, जिसमें फांसी को मृत्युदंड के तरीके के रूप में संवैधानिक रूप से वैध ठहराया गया था। यह फैसला आज भी भारत में मृत्युदंड के क्रियान्वयन का कानूनी आधार है।
'प्रोजेक्ट 39ए' क्या है और इस मामले में इसकी भूमिका क्या रही?
'प्रोजेक्ट 39ए' एक आपराधिक न्याय कार्यक्रम है जो मृत्युदंड के दोषियों को कानूनी सहायता और प्रतिनिधित्व प्रदान करता है। सुनवाई के दौरान सर्वोच्च न्यायालय ने इससे जुड़ी वरिष्ठ अधिवक्ता मीनाक्षी अरोड़ा की राय माँगी, जिन्होंने विशेषज्ञ समिति गठित करने का सुझाव दिया।
राष्ट्र प्रेस
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