तमिलनाडु को समग्र शिक्षा अभियान में 9,432 ICT लैब की मंजूरी, दक्षिण में शीर्ष — पर केंद्रीय फंड अटका
सारांश
मुख्य बातें
तमिलनाडु ने केंद्र प्रायोजित समग्र शिक्षा अभियान (SSA) के अंतर्गत डिजिटल शिक्षा अवसंरचना विस्तार में दक्षिण भारत के सभी राज्यों को पीछे छोड़ दिया है। 2021-22 से 2025-26 के बीच राज्य को 9,432 ICT लैब और 8,967 स्मार्ट क्लासरूम की स्वीकृति मिली है — जो किसी भी दक्षिणी राज्य से कहीं अधिक है। हालाँकि, राज्य के अधिकारियों का कहना है कि स्वीकृत राशि वास्तव में जारी नहीं की गई, जिससे तमिलनाडु को अपने स्वयं के बजट से यह ढाँचा खड़ा करना पड़ रहा है।
मंजूरी के आँकड़े: दक्षिण में सबसे बड़ा लाभार्थी
संसद में प्रस्तुत आँकड़ों के आधार पर तमिलनाडु सरकार द्वारा तैयार किए गए विवरण के अनुसार, 2021-22 और 2025-26 के बीच राज्य को 9,432 ICT लैब की स्वीकृति मिली — जो दूसरे स्थान पर रहे तेलंगाना से लगभग चार गुना अधिक है। अकेले 2025-26 शैक्षणिक वर्ष में तमिलनाडु को 2,166 ICT लैब की मंजूरी दी गई, जबकि तेलंगाना को 1,242 लैब की स्वीकृति मिली।
स्मार्ट क्लासरूम के मामले में भी यही तस्वीर है। 2024-25 में योजना शुरू होने के बाद से तमिलनाडु को 8,967 स्मार्ट क्लासरूम की मंजूरी मिली है — जो कर्नाटक, केरल, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना को मिली संख्या से लगभग दोगुनी है।
वित्तीय स्वीकृति और फंड की वास्तविकता
वित्तीय आँकड़े भी तमिलनाडु के पक्ष में हैं — कागज़ पर। केंद्र ने 2025-26 के लिए राज्य को ₹167 करोड़ की स्वीकृति दी, जबकि 2021-22 से 2025-26 के बीच कुल स्वीकृत राशि ₹655.25 करोड़ रही। परंतु राज्य अधिकारियों का कहना है कि यह राशि वास्तव में हस्तांतरित नहीं हुई है।
तमिलनाडु में समग्र शिक्षा की प्रोजेक्ट डायरेक्टर एम. आरती ने कहा कि राज्य पिछले तीन वर्षों से केंद्रीय सहायता के बिना अपने बजट से इस कार्यक्रम को चला रहा है। उन्होंने बताया कि इस देरी से कामकाज में गंभीर दिक्कतें आ रही हैं — विशेष रूप से लैब इंस्ट्रक्टर के वेतन जैसे नियमित खर्चों को पूरा करने में, जो प्रतिवर्ष कई करोड़ रुपये का बोझ डालते हैं।
NEP विवाद: फंड रोकने का कारण
राज्य के अधिकारियों के अनुसार, केंद्र ने राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) को लागू न करने का हवाला देते हुए तमिलनाडु का फंड रोक दिया है। यह ऐसे समय में आया है जब तमिलनाडु सरकार ने NEP के कुछ प्रावधानों — विशेष रूप से त्रिभाषा सूत्र — पर सार्वजनिक रूप से आपत्ति जताई है। गौरतलब है कि यह टकराव केवल शिक्षा नीति तक सीमित नहीं है, बल्कि केंद्र-राज्य वित्तीय संबंधों की व्यापक बहस का हिस्सा बन गया है।
यह पहली बार नहीं है कि किसी राज्य ने केंद्रीय शिक्षा योजनाओं में नीतिगत अनुपालन को फंड-रोक से जोड़े जाने पर आपत्ति जताई हो। आलोचकों का कहना है कि केंद्रीय योजनाओं में शर्तें जोड़ना संघीय ढाँचे पर दबाव डालता है।
आगे की राह
तमिलनाडु का यह मामला उस बड़े सवाल को रेखांकित करता है कि क्या केंद्र प्रायोजित योजनाओं में स्वीकृति और वास्तविक फंड वितरण के बीच की खाई को पाटने की कोई व्यवस्था है। राज्य द्वारा अपने संसाधनों से ICT अवसंरचना का रखरखाव करते रहना एक अस्थायी समाधान है — जब तक केंद्र और राज्य के बीच NEP को लेकर गतिरोध बना रहेगा, तब तक स्कूलों में डिजिटल शिक्षा का भविष्य अनिश्चित बना रहेगा।