तुलु भाषा राष्ट्रीय मान्यता मिशन 2026-2035: PM मोदी को सौंपा गया ₹450 करोड़ का प्रस्ताव
सारांश
मुख्य बातें
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को 1 अक्टूबर 2026 को 'तुलु भाषा राष्ट्रीय मान्यता और विकास मिशन 2026-2035' शुरू करने का एक विस्तृत प्रस्ताव सौंपा गया। इस प्रस्ताव में तुलु भाषा को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने, उसे डिजिटाइज़ करने और उसकी सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण के लिए ₹450 करोड़ के अनुमानित बजट का खाका प्रस्तुत किया गया है। प्रस्ताव में प्रधानमंत्री कार्यालय से अंतर-मंत्रालयी जांच शुरू करने के निर्देश जारी करने का अनुरोध भी किया गया है।
प्रस्ताव किसने और क्यों पेश किया
कर्नाटक राज्य नीति और योजना आयोग के सदस्य एस. मोहनदास हेगड़े ने यह प्रस्ताव तैयार कर PM मोदी को सौंपा। प्रस्ताव में 2011 की जनगणना के आंकड़ों का हवाला देते हुए बताया गया है कि तुलु बोलने वाले मूल वक्ताओं की संख्या 18,46,849 है, और यह भाषा भारत के साथ-साथ विदेशों में भी प्रचलित है।
प्रस्ताव में तुलु के भाषाई इतिहास, पांडुलिपियों, शिलालेखों, मौखिक परंपराओं और तुलु-तिगलारी लिपि पर व्यवस्थित शोध की मांग की गई है। साथ ही यह भी स्पष्ट किया गया है कि स्थापित ऐतिहासिक साक्ष्यों को विवादित दावों और सांस्कृतिक परंपराओं से अलग रखा जाएगा।
तुलु नाडु के इतिहास पर विशेष शोध की मांग
प्रस्ताव में तुलु नाडु के इतिहास पर एक समर्पित शोध परियोजना की माँग की गई है। इसमें अलुपा राजवंश, बरकुर, तुलुवा राजवंश और विजयनगर साम्राज्य के बीच ऐतिहासिक संबंधों की पड़ताल करने का प्रस्ताव है।
दस्तावेज़ में एक 'दोहरी-लिपि सामंजस्य मॉडल' का भी सुझाव दिया गया है, जिसके तहत कन्नड़ समकालीन प्रशासन और सार्वजनिक शिक्षा का माध्यम बनी रहेगी, जबकि तुलु-तिगलारी लिपि का उपयोग पांडुलिपि संरक्षण, शिलालेखों और विद्वतापूर्ण शोध के लिए किया जाएगा।
कर्नाटक सरकार का हालिया कदम और संदर्भ
यह प्रस्ताव ऐसे समय में आया है जब मंगलुरु में 18 सितंबर 2026 को हुई कर्नाटक कैबिनेट की बैठक में दक्षिण कन्नड़ और उडुपी जिलों में प्रशासनिक कार्यों के लिए तुलु को राज्य की दूसरी अतिरिक्त आधिकारिक भाषा का दर्जा देने का निर्णय लिया जा चुका है। राज्य सरकार ने इसके अनुवाद, प्रशिक्षण और कार्यान्वयन उपायों के लिए सालाना ₹82 लाख आवंटित करने की भी घोषणा की है।
गौरतलब है कि तुलु भाषा को आठवीं अनुसूची में शामिल करने की माँग दशकों से उठती रही है, और यह प्रस्ताव उस दीर्घकालिक आंदोलन को एक नई नीतिगत दिशा देने का प्रयास है।
तीन नीतिगत रास्ते और बजट रूपरेखा
प्रस्ताव में तीन नीतिगत विकल्प सुझाए गए हैं — संवैधानिक मान्यता, शास्त्रीय भाषा का दर्जा पाने के लिए पात्रता की जांच, और 10 वर्षीय राष्ट्रीय मिशन का संचालन। विस्तृत परियोजना रिपोर्ट के लिए ₹450 करोड़ के अनुमानित बजट का प्रस्ताव है।
इसमें भाषा प्रौद्योगिकी, पांडुलिपि संरक्षण, शिलालेख अध्ययन और शिक्षा से जुड़ी मौजूदा केंद्रीय योजनाओं के साथ तालमेल बिठाने का भी सुझाव दिया गया है, ताकि समानांतर खर्च से बचा जा सके।
आगे क्या होगा
प्रस्ताव में प्रधानमंत्री कार्यालय से अनुरोध किया गया है कि वह संबंधित मंत्रालयों को इसकी अंतर-मंत्रालयी जांच के लिए उचित निर्देश जारी करे। यदि केंद्र इस प्रस्ताव पर अनुकूल प्रतिक्रिया देता है, तो तुलु भाषा का दर्जा संवैधानिक स्तर तक पहुँचने की दिशा में यह एक ऐतिहासिक कदम होगा।