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एसडीपीआई ने कर्नाटक में उर्दू को आधिकारिक भाषा दर्जा देने की मांग की, सीएम को लिखा पत्र

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एसडीपीआई ने कर्नाटक में उर्दू को आधिकारिक भाषा दर्जा देने की मांग की, सीएम को लिखा पत्र

सारांश

तुलु को मंगलुरु-उडुपी में आधिकारिक दर्जा मिलते ही एसडीपीआई ने पूरे कर्नाटक में उर्दू के लिए वही अधिकार माँग लिया। अध्यक्ष मजीद ने सीएम शिवकुमार को खुला पत्र लिखकर संविधान के अनुच्छेद 345 और 3,934 सरकारी उर्दू स्कूलों का हवाला दिया — भाषा की राजनीति एक बार फिर कर्नाटक में गरमाई।

मुख्य बातें

एसडीपीआई ने सोमवार, 21 सितंबर 2026 को कर्नाटक में उर्दू को आधिकारिक भाषा का दर्जा देने की माँग की।
एसडीपीआई अध्यक्ष अब्दुल मजीद ने मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार को खुला पत्र लिखा।
राज्य में 3,934 सरकारी उर्दू माध्यम विद्यालय और 302 सरकारी सहायता प्राप्त उर्दू विद्यालय संचालित हैं ( 2024-25 के आँकड़े)।
माँग तुलु को मंगलुरु और उडुपी में अतिरिक्त आधिकारिक भाषा की मंजूरी के बाद आई।
पार्टी ने संविधान के अनुच्छेद 345 और तेलंगाना के बहुभाषी शासन मॉडल का हवाला दिया।

सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ इंडिया (एसडीपीआई) ने कर्नाटक सरकार से पूरे राज्य में उर्दू को आधिकारिक भाषा का दर्जा देने की माँग की है। यह माँग उस समय सामने आई है जब कर्नाटक मंत्रिमंडल ने मंगलुरु और उडुपी जिलों में प्रशासनिक उद्देश्यों के लिए तुलु को अतिरिक्त आधिकारिक भाषा के रूप में मंजूरी दी। एसडीपीआई के कर्नाटक अध्यक्ष अब्दुल मजीद ने सोमवार को मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार को एक खुला पत्र लिखकर यह माँग रखी।

मांग का आधार और तर्क

मजीद ने अपने पत्र में कहा कि उर्दू कर्नाटक में लंबे समय से मौजूद है और राज्य की भाषाई व सांस्कृतिक विविधता में उसका महत्वपूर्ण योगदान रहा है। उन्होंने उर्दू की साहित्यिक परंपरा, समाचार पत्रों, शैक्षणिक संस्थानों और सांस्कृतिक-ऐतिहासिक विरासत का उल्लेख करते हुए तर्क दिया कि इस भाषा की जड़ें राज्य में गहरी हैं।

2011 की जनगणना के आँकड़ों का हवाला देते हुए मजीद ने बताया कि उर्दू कर्नाटक में प्रमुख मातृभाषाओं में से एक है। उन्होंने 2024-25 के स्कूली शिक्षा आँकड़ों का भी उल्लेख किया, जिनके अनुसार राज्य में 3,934 सरकारी उर्दू माध्यम विद्यालय और 302 सरकारी सहायता प्राप्त उर्दू माध्यम विद्यालय संचालित हैं।

उर्दू माध्यम विद्यालयों की स्थिति

एसडीपीआई अध्यक्ष ने उर्दू माध्यम विद्यालयों में छात्र नामांकन की लगातार गिरती संख्या पर चिंता जताई और सरकार से इन संस्थानों को पर्याप्त बुनियादी ढाँचा, शैक्षिक सुविधाएँ और आवश्यक संसाधन उपलब्ध कराकर मजबूत करने का आग्रह किया।

पार्टी ने कहा, 'कर्नाटक एक बहुभाषी राज्य है और एक भाषा के अधिकारों का सम्मान करना दूसरी भाषा के अधिकारों को नकारने का कारण नहीं बनना चाहिए।' मजीद ने यह भी स्पष्ट किया कि कन्नड़ प्रमुख भाषा के रूप में अपना उचित स्थान बनाए रखेगी और उर्दू को मान्यता देने से उसका दर्जा कम नहीं होगा।

तुलु के साथ समानता का तर्क

मजीद ने तर्क दिया कि यदि तटीय कर्नाटक में गहरी सांस्कृतिक और ऐतिहासिक जड़ों वाली तुलु को अतिरिक्त आधिकारिक दर्जा मिल सकता है, तो यही सिद्धांत उर्दू पर भी लागू होना चाहिए, क्योंकि उर्दू बोलने वालों की संख्या काफी अधिक है और राज्य में उसकी एक स्थापित शैक्षिक व साहित्यिक उपस्थिति है।

एसडीपीआई ने संविधान के अनुच्छेद 345 का हवाला दिया, जो राज्य विधानमंडल को किसी भी आधिकारिक उद्देश्य के लिए राज्य में प्रचलित भाषाओं को कानून के माध्यम से अपनाने का अधिकार देता है। पार्टी ने बहुभाषी शासन के उदाहरण के रूप में तेलंगाना का उल्लेख किया, जहाँ उर्दू को दूसरी आधिकारिक भाषा की मान्यता प्राप्त है।

एसडीपीआई की समग्र माँगें

एसडीपीआई ने सरकार से भाषाई अल्पसंख्यकों के शैक्षिक अधिकारों की रक्षा करने और उर्दू माध्यम स्कूलों को पर्याप्त शिक्षक, बुनियादी ढाँचा व सुविधाएँ सुनिश्चित करने का आग्रह किया। पार्टी ने स्पष्ट किया कि यह माँग तुलु की मान्यता के विरुद्ध नहीं, बल्कि उर्दू भाषी समुदाय के लिए समान भाषाई और शैक्षिक अधिकार सुनिश्चित करने के उद्देश्य से है।

यह माँग ऐसे समय में आई है जब कर्नाटक में भाषा-नीति को लेकर विमर्श नए सिरे से शुरू हो गया है। राज्य सरकार का इस माँग पर रुख अभी सामने नहीं आया है और आगे की राजनीतिक प्रतिक्रिया का इंतजार है।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन असली सवाल यह है कि क्या कर्नाटक सरकार इस तर्क को राजनीतिक रूप से वहन कर सकती है — खासकर जब कन्नड़ भावना हमेशा संवेदनशील रही है। यह ध्यान देने योग्य है कि 3,934 सरकारी उर्दू स्कूलों और नामांकन गिरावट का ज़िक्र केवल भाषाई गौरव का नहीं, बल्कि ठोस नीतिगत विफलता का मामला है जिस पर सरकार को जवाब देना होगा। तेलंगाना मॉडल का हवाला प्रासंगिक है, पर कर्नाटक की राजनीतिक भूगोल और कन्नड़ अस्मिता की जटिलताएँ अलग हैं। सरकार की चुप्पी बता रही है कि यह माँग सियासी तौर पर असुविधाजनक इलाके में है।
RashtraPress
21 सितंबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

एसडीपीआई ने कर्नाटक में उर्दू को आधिकारिक भाषा का दर्जा देने की माँग क्यों की?
एसडीपीआई ने यह माँग कर्नाटक मंत्रिमंडल द्वारा मंगलुरु और उडुपी में तुलु को अतिरिक्त आधिकारिक भाषा की मंजूरी दिए जाने के बाद की। पार्टी का तर्क है कि उर्दू बोलने वालों की संख्या अधिक है और राज्य में उसकी स्थापित शैक्षिक व साहित्यिक उपस्थिति है, इसलिए तुलु जैसा ही सिद्धांत उर्दू पर भी लागू होना चाहिए।
कर्नाटक में उर्दू माध्यम विद्यालयों की वर्तमान स्थिति क्या है?
2024-25 के स्कूली शिक्षा आँकड़ों के अनुसार, कर्नाटक में 3,934 सरकारी उर्दू माध्यम विद्यालय और 302 सरकारी सहायता प्राप्त उर्दू माध्यम विद्यालय हैं। एसडीपीआई ने चेतावनी दी है कि इन विद्यालयों में नामांकन लगातार घट रहा है और तत्काल ध्यान देने की आवश्यकता है।
एसडीपीआई ने अपनी माँग के लिए किस संवैधानिक प्रावधान का हवाला दिया?
एसडीपीआई ने संविधान के अनुच्छेद 345 का हवाला दिया, जो राज्य विधानमंडल को किसी भी आधिकारिक उद्देश्य के लिए राज्य में प्रचलित एक या अधिक भाषाओं को कानून के माध्यम से अपनाने का अधिकार देता है।
तेलंगाना का उदाहरण इस माँग में कैसे प्रासंगिक है?
एसडीपीआई अध्यक्ष मजीद ने तेलंगाना को बहुभाषी शासन के उदाहरण के रूप में पेश किया, जहाँ उर्दू को दूसरी आधिकारिक भाषा के रूप में मान्यता दी गई है। उनका कहना है कि कर्नाटक भी अपनी भाषाई विविधता के अनुरूप ऐसा प्रशासनिक ढाँचा विकसित कर सकता है।
क्या यह माँग कन्नड़ भाषा के विरुद्ध है?
एसडीपीआई ने स्पष्ट किया है कि उनकी माँग कन्नड़ के विरुद्ध नहीं है। पार्टी के अनुसार कन्नड़ प्रमुख भाषा के रूप में अपना स्थान बनाए रखेगी और आबादी के बड़े हिस्से द्वारा बोली जाने वाली उर्दू जैसी भाषाओं को मान्यता देने से कन्नड़ का दर्जा कम नहीं होगा।
राष्ट्र प्रेस
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