उमर खालिद और शरजील इमाम की सुप्रीम कोर्ट जमानत याचिका: मौलाना शहाबुद्दीन बोले — फैसला दलीलों पर निर्भर
सारांश
मुख्य बातें
दिल्ली दंगों के मामले में यूएपीए के तहत वर्षों से जेल में बंद उमर खालिद और शरजील इमाम की सर्वोच्च न्यायालय में दाखिल नई जमानत याचिकाओं पर ऑल इंडिया मुस्लिम जमात के अध्यक्ष मौलाना शहाबुद्दीन ने 5 नवंबर 2026 को बरेली से प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि दोनों आरोपियों को सर्वोच्च न्यायालय में जमानत अर्जी दाखिल करने का पूरा कानूनी अधिकार है, हालाँकि जमानत मिलेगी या नहीं, यह अदालत में पेश दलीलों और सबूतों पर निर्भर करेगा।
मामले की पृष्ठभूमि
फरवरी 2020 के दिल्ली दंगों को मौलाना शहाबुद्दीन ने 'बेहद भयावह घटना' बताया। इस मामले में उमर खालिद और शरजील इमाम को आरोपी बनाया गया था। दोनों ने पहले जिला अदालत, फिर दिल्ली उच्च न्यायालय में जमानत के लिए अर्जियाँ दायर कीं, परंतु दोनों ही स्तरों पर याचिकाएँ खारिज हो गईं। अब दोनों ने सर्वोच्च न्यायालय का दरवाज़ा खटखटाया है।
याचिका के तीन प्रमुख आधार
दिल्ली में उमर खालिद के पिता सैयद कासिम रसूल इलियास ने बताया कि सर्वोच्च न्यायालय में जमानत याचिका दाखिल कर दी गई है। उन्होंने कहा कि याचिका के तीन प्रमुख आधार हैं। सर्वोच्च न्यायालय ने अपने पूर्व आदेश में एक वर्ष बाद पुनः अदालत का रुख करने की अनुमति दी थी, लेकिन साथ में दो शर्तें भी लगाई थीं — गवाहों की जाँच शुरू होना और मुकदमे की सुनवाई आगे बढ़ना।
इलियास के अनुसार अब तक मुकदमा आरंभ नहीं हुआ है और गवाहों के बयान दर्ज करने की प्रक्रिया भी नहीं चली। यही वह आधार है जिस पर सर्वोच्च न्यायालय में फिर से जमानत माँगी गई है। गौरतलब है कि यह पहली बार नहीं है जब इस मामले में लंबे विचाराधीन कारावास को लेकर न्यायिक हलकों में सवाल उठे हों।
मौलाना शहाबुद्दीन का रुख
मौलाना शहाबुद्दीन ने स्पष्ट किया कि जमानत देना या न देना पूरी तरह अदालत का विशेषाधिकार है और इसका निर्णय दलीलों तथा उपलब्ध सबूतों को देखने के बाद ही होगा। उन्होंने कहा, 'अभी यह कहना उचित नहीं कि जमानत मिलेगी या नहीं — जब तारीख तय होगी और दोनों पक्षों में बहस होगी, तभी स्थिति स्पष्ट होगी।' उन्होंने उम्मीद ज़रूर जताई कि सर्वोच्च न्यायालय से दोनों को राहत मिल सकती है।
शिया चाँद कमेटी की प्रतिक्रिया और आरोप
लखनऊ में शिया चाँद कमेटी के अध्यक्ष मौलाना सैफ अब्बास नकवी ने भी इस मामले पर टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि सर्वोच्च न्यायालय में जमानत अर्जी दाखिल करना दोनों का संवैधानिक अधिकार है। हालाँकि, उन्होंने आरोप लगाया कि मामले के तथ्यों को जिस तरह प्रस्तुत किया जा रहा है और जमानत के रास्ते में जिस प्रकार की बाधाएँ खड़ी की जा रही हैं, वह 'किसी भी भारतीय नागरिक के लिए ठीक नहीं है।'
मौलाना सैफ अब्बास ने यह भी आरोप लगाया कि 'पूरी व्यवस्था एक साथ मिलकर साज़िश कर रही है।' यह एक गंभीर दावा है जिसकी स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं हुई है और जिसे उनके अपने बयान के रूप में दर्ज किया जाना चाहिए।
आगे क्या होगा
सर्वोच्च न्यायालय में याचिका दाखिल होने के बाद अब सुनवाई की तारीख तय होने का इंतज़ार है। एक बार बहस शुरू होने पर न्यायालय दोनों पक्षों की दलीलें सुनकर अपना फ़ैसला देगा। यह मामला विचाराधीन कैदियों के अधिकारों और त्वरित सुनवाई की संवैधानिक गारंटी के व्यापक प्रश्न को भी सामने रखता है।