उत्तर प्रदेश में बाल मृत्यु दर घटी: SRS 2024 में NMR 25, IMR 35 दर्ज, योगी सरकार के स्वास्थ्य सुधारों का असर
सारांश
मुख्य बातें
उत्तर प्रदेश में नवजात से पाँच वर्ष तक के बच्चों की मृत्यु दर में उल्लेखनीय गिरावट दर्ज की गई है। सैंपल रजिस्ट्रेशन सिस्टम (SRS) की ताज़ा रिपोर्ट के अनुसार, 2023 की तुलना में 2024 में नवजात मृत्यु दर (NMR), शिशु मृत्यु दर (IMR) और पाँच वर्ष तक के बच्चों की मृत्यु दर — तीनों आयु वर्गों में सुधार आया है। यह आँकड़े प्रति 1,000 जीवित जन्मों पर आधारित हैं।
मुख्य आँकड़े: क्या कहती है SRS रिपोर्ट
SRS रिपोर्ट के अनुसार, नवजात मृत्यु दर (NMR) 2023 के 26 से घटकर 2024 में 25 प्रति हज़ार हो गई। इसी अवधि में शिशु मृत्यु दर (IMR) 37 से घटकर 35 और पाँच वर्ष तक के बच्चों की मृत्यु दर (U5MR) 42 से घटकर 41 प्रति हज़ार रह गई।
उत्तर प्रदेश उन चुनिंदा राज्यों में शामिल हो गया है जहाँ बाल मृत्यु दर के सभी तीन प्रमुख संकेतकों में एक साथ कमी देखी गई है। विशेषज्ञों के अनुसार यह जमीनी स्तर पर किए गए सामूहिक प्रयासों का परिणाम है।
स्वास्थ्य विशेषज्ञ क्या कहते हैं
किंग जॉर्ज चिकित्सा विश्वविद्यालय (KGMU), लखनऊ के बाल रोग विभाग की प्रोफेसर डॉ. शालिनी त्रिपाठी के अनुसार, प्रदेश में स्वास्थ्य केंद्रों और स्वास्थ्यकर्मियों के उन्नयन से NMR और IMR में कमी आई है। उन्होंने बताया कि बीते तीन-चार वर्षों में आयुष्मान आरोग्य मंदिर से लेकर जिला महिला अस्पतालों तक के डॉक्टरों और स्टाफ नर्सों को लगातार प्रशिक्षित किया गया है।
डॉ. त्रिपाठी ने यह भी रेखांकित किया कि CPAP मशीन (नवजात को साँस लेने में कठिनाई होने पर), कंगारू मदर केयर, मिल्क बैंक, निःशुल्क दवाएँ और नियमित टीकाकरण — ये सभी उपाय शिशु मृत्यु दर में कमी लाने में सहायक सिद्ध हुए हैं। इसके अतिरिक्त अस्पतालों में शुरू की गई मदर न्यूबॉर्न केयर यूनिट (MNCU) — जिसमें प्रसव के बाद माँ और नवजात को एक ही वार्ड में रखा जाता है — से भी महत्वपूर्ण लाभ हो रहा है।
नर्सिंग प्रशिक्षण और अग्रिम पंक्ति की भूमिका
वीरांगना अवंती बाई महिला अस्पताल, लखनऊ की स्टाफ नर्स डेजी रानी ने बताया कि नर्सों को नवजात शिशु की देखभाल पर नियमित साप्ताहिक वर्चुअल लर्निंग सेशन और समय-समय पर आमने-सामने रिफ्रेशर ट्रेनिंग दी जा रही है। उनके अनुसार इन प्रशिक्षणों से नवजात के खतरे के लक्षण पहचानने, समय पर रेफरल प्रोटोकॉल का पालन करने और जन्म के समय पुनर्जीवन प्रक्रियाओं को मज़बूत करने में काफी सहायता मिली है।
स्वच्छता और संक्रमण नियंत्रण पर ज़ोर
उसी अस्पताल के बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. सलमान ने बताया कि पहले अनेक नवजातों की मृत्यु संक्रमण और अस्वच्छता के कारण होती थी। अब अस्पतालों में स्टाफ को प्रशिक्षित किया जाता है कि शिशु के पास आने से पूर्व डॉक्टर और नर्स के हाथ साफ हों, प्रसव क्षेत्र स्वच्छ हो, नवजात को लपेटने वाला कपड़ा, नाल काटने का उपकरण और नाल पर लगाई जाने वाली क्लिप — सभी संक्रमण-मुक्त हों।
आगे की चुनौती: पहले 48 घंटे सबसे अहम
हालाँकि आँकड़े उत्साहजनक हैं, विशेषज्ञों का मानना है कि नवजात मृत्यु दर में कमी की रफ्तार अभी भी अपेक्षाकृत धीमी है और जन्म के तुरंत बाद होने वाली मृत्यु दर में खास बदलाव नहीं आया है। यह संकेत करता है कि अगला चरण प्रसव, डिलीवरी और जीवन के पहले 48 घंटों के दौरान दी जाने वाली देखभाल की गुणवत्ता सुधारने पर केंद्रित होना होगा। गौरतलब है कि वैश्विक स्तर पर भी नवजात मृत्यु दर में कमी, शिशु और बाल मृत्यु दर की तुलना में अधिक कठिन साबित होती है क्योंकि यह सीधे प्रसव की गुणवत्ता से जुड़ी होती है।