आगरा एसएन मेडिकल कॉलेज: हर साल MP-राजस्थान के 200 नवजातों को मिल रहा नया जीवन

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आगरा एसएन मेडिकल कॉलेज: हर साल MP-राजस्थान के 200 नवजातों को मिल रहा नया जीवन

सारांश

आगरा का एसएन मेडिकल कॉलेज अब सिर्फ यूपी का नहीं, बल्कि पड़ोसी राज्यों का भी 'नवजात जीवनरक्षक' बन चुका है। हर साल MP और राजस्थान के 200 बच्चों को यहाँ नया जीवन मिलता है — सी-पैप तकनीक और 48 सक्रिय एसएनसीयू के दम पर योगी सरकार की स्वास्थ्य नीति अब राज्य की सीमाएँ लाँघ रही है।

मुख्य बातें

आगरा एसएन मेडिकल कॉलेज में सालाना लगभग 1,800 नवजात भर्ती होते हैं, जिनमें से 200 बच्चे मध्य प्रदेश और राजस्थान से आते हैं।
राजस्थान के भरतपुर, धौलपुर और MP के भिंड, मुरैना समेत करीब एक दर्जन जिलों के नवजातों का यहाँ इलाज होता है।
एसएनसीयू में स्थापित सी-पैप मशीनें वेंटिलेटर की तुलना में अधिक सुरक्षित और किफायती मानी जाती हैं।
राष्ट्रीय पारिवारिक स्वास्थ्य सर्वे (एनएफएचएस-5) के अनुसार यूपी में प्रति 1,000 नवजात में 28 की मृत्यु होती है।
प्रदेश में अभी 48 एसएनसीयू सक्रिय हैं; दूसरे चरण में शेष 72 यूनिट में प्रशिक्षण व उन्नयन कार्य होगा।
पहले चरण में 350 डॉक्टरों व कर्मचारियों को प्रशिक्षित किया जा चुका है।

आगरा के सरोजनी नायडू (एसएन) मेडिकल कॉलेज की सिक न्यूबॉर्न केयर यूनिट (एसएनसीयू) अब केवल उत्तर प्रदेश के नवजातों की जान नहीं बचा रही, बल्कि हर वर्ष मध्य प्रदेश और राजस्थान के लगभग 200 बच्चों को भी नया जीवन दे रही है। योगी सरकार द्वारा प्रदेश में नवजात मृत्यु दर (आईएमआर) घटाने के लिए अपग्रेड की जा रही इन स्वास्थ्य इकाइयों का लाभ अब पड़ोसी राज्यों तक पहुँच रहा है।

किन राज्यों से आ रहे हैं बच्चे

एसएन मेडिकल कॉलेज के एसएनसीयू के नोडल अधिकारी प्रो. नीरज यादव के अनुसार, राजस्थान के भरतपुर और धौलपुर तथा मध्य प्रदेश के भिंड और मुरैना समेत दोनों राज्यों के करीब एक दर्जन जिलों से बीमार नवजात यहाँ इलाज के लिए लाए जाते हैं। बाल रोग विभाग में सालाना लगभग 1,800 मरीज भर्ती होते हैं, जिनमें से लगभग 1 प्रतिशत यानी करीब 200 बच्चे दूसरे राज्यों के होते हैं।

एक माँ की कहानी: राजस्थान से आगरा तक की दौड़

राजस्थान के धौलपुर जिले की 27 वर्षीय सुमन ने बताया कि जन्म के छठे दिन उनके बच्चे की तबियत बिगड़ी तो वे सीधे आगरा भागीं, क्योंकि उन्हें पहले से पता था कि एसएन मेडिकल कॉलेज में बेहतर इलाज मिलता है। 18 अप्रैल को बच्चे का इलाज शुरू हुआ। डॉक्टरों के अनुसार बच्चे को संक्रमण था और सांस लेने में दिक्कत हो रही थी। उसे सी-पैप सपोर्ट पर रखा गया और धीरे-धीरे वह स्वस्थ होकर घर लौट गया। सुमन ने कहा,

संपादकीय दृष्टिकोण

000 पर 28 नवजात मृत्यु का आँकड़ा अभी भी राष्ट्रीय औसत से ऊपर है, जो बताता है कि 48 एसएनसीयू पर्याप्त नहीं — शेष 72 यूनिट का त्वरित उन्नयन ज़रूरी है। सी-पैप तकनीक को 'गेम-चेंजर' कहना तभी सार्थक होगा जब इसकी पहुँच ग्रामीण और दूरदराज़ के क्षेत्रों तक सुनिश्चित हो, न कि केवल मेडिकल कॉलेज स्तर पर।
RashtraPress
13 मई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

आगरा एसएन मेडिकल कॉलेज में किन राज्यों के नवजातों का इलाज होता है?
आगरा के एसएन मेडिकल कॉलेज में उत्तर प्रदेश के अलावा मध्य प्रदेश और राजस्थान के करीब एक दर्जन जिलों से नवजात आते हैं। इनमें राजस्थान के भरतपुर, धौलपुर और MP के भिंड, मुरैना प्रमुख हैं।
एसएन मेडिकल कॉलेज में सालाना कितने नवजातों का इलाज होता है?
बाल रोग विभाग में सालाना लगभग 1,800 नवजात भर्ती होते हैं, जिनमें से लगभग 200 बच्चे मध्य प्रदेश और राजस्थान से आते हैं। यह कुल भर्ती का लगभग 1 प्रतिशत है।
सी-पैप मशीन नवजातों के लिए कैसे फायदेमंद है?
सी-पैप मशीन निश्चित अनुपात में ऑक्सीजन और हवा को नाक के ज़रिए फेफड़ों तक पहुँचाती है, जिससे सांस लेने में तकलीफ़ वाले नवजातों को राहत मिलती है। राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के महाप्रबंधक डॉ. मिलिंद वर्धन इसे वेंटिलेटर की तुलना में अधिक सुरक्षित और कम दुष्प्रभाव वाला विकल्प मानते हैं।
यूपी में अभी कितने एसएनसीयू सक्रिय हैं और आगे क्या योजना है?
वर्तमान में उत्तर प्रदेश में 48 एसएनसीयू सक्रिय हैं। राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन की निदेशक डॉ. पिंकी जोवेल के अनुसार, दूसरे चरण में शेष 72 यूनिट में प्रशिक्षण और उन्नयन कार्य किया जाएगा।
यूपी में नवजात मृत्यु दर कितनी है?
राष्ट्रीय पारिवारिक स्वास्थ्य सर्वे (एनएफएचएस-5) के अनुसार उत्तर प्रदेश में प्रति 1,000 नवजात में 28 की मृत्यु होती है। इसे कम करने के लिए योगी सरकार एसएनसीयू नेटवर्क का विस्तार और सी-पैप तकनीक का प्रसार कर रही है।
राष्ट्र प्रेस
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