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सुप्रीम कोर्ट ने यूपी SC-ST आरक्षित सीटों के रोटेशन की याचिका खारिज की, कहा — संसद का काम

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सुप्रीम कोर्ट ने यूपी SC-ST आरक्षित सीटों के रोटेशन की याचिका खारिज की, कहा — संसद का काम

सारांश

सर्वोच्च न्यायालय ने उत्तर प्रदेश में SC-ST आरक्षित विधानसभा सीटों के रोटेशन की माँग वाली याचिका यह कहते हुए खारिज कर दी कि यह संसद का विषय है — कादीपुर सीट करीब छह दशकों से आरक्षित है और इलाहाबाद हाईकोर्ट भी पहले यही राय दे चुका है।

मुख्य बातें

सर्वोच्च न्यायालय ने 4 नवंबर 2026 को उत्तर प्रदेश में SC-ST आरक्षित विधानसभा सीटों के रोटेशन की याचिका खारिज की।
CJI सूर्यकांत , जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी.
मोहन की पीठ ने कहा — यह विषय संसद का है, न्यायपालिका का नहीं।
याचिका सुल्तानपुर के कादीपुर विधानसभा क्षेत्र के मतदाता जगदीश सिंह ने दाखिल की थी; सीट करीब छह दशकों से SC के लिए आरक्षित है।
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने भी जून 2026 में यही याचिका खारिज की थी।
अदालत ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 330 और 332 में सीटों के रोटेशन को अनिवार्य नहीं बनाया गया है।

सर्वोच्च न्यायालय ने 4 नवंबर 2026 को उत्तर प्रदेश में अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) के लिए आरक्षित विधानसभा सीटों के रोटेशन की माँग करने वाली याचिका खारिज कर दी। अदालत ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि यह विषय संसद और विधायिका के विचार का क्षेत्र है, न कि न्यायपालिका का।

न्यायालय की टिप्पणी

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहन की पीठ ने सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता से कहा, 'आप गलत नंबर डायल कर रहे हैं। अपनी आवाज़ उठाइए कि विधायिका और संसद इस मुद्दे पर फिर से विचार करें।' पीठ ने यह भी टिप्पणी की कि यह विरोध प्रदर्शन का अच्छा सीजन है और यह मुद्दा भी उचित है — लेकिन इसका सही मंच संसद है।

पीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि मौजूदा कानूनी ढाँचे के अभाव में वह परिसीमन आयोग को आरक्षित सीटों के रोटेशन का निर्देश देने में सक्षम नहीं है।

याचिका की पृष्ठभूमि

यह याचिका उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर जिले के कादीपुर विधानसभा क्षेत्र के मतदाता जगदीश सिंह ने दाखिल की थी। उनका तर्क था कि कादीपुर विधानसभा सीट करीब छह दशकों से अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित है, जिससे सामान्य वर्ग के मतदाताओं के पास अपने वर्ग के उम्मीदवार को चुनने का विकल्प नहीं बचता।

याचिकाकर्ता ने परिसीमन अधिनियम, 2002 की धारा 9(1)(सी) का हवाला देते हुए कहा था कि आरक्षित सीटों की पहचान SC/ST की जनसंख्या के आधार पर होती है। उन्होंने पंचायत और नगरपालिका चुनावों की तर्ज पर विधानसभा चुनावों में भी आरक्षित सीटों के रोटेशन की माँग की थी।

संवैधानिक आधार और कानूनी स्थिति

सर्वोच्च न्यायालय ने याचिकाकर्ता की दलीलों पर प्रश्न उठाते हुए पूछा कि दशकों तक किसी सीट के आरक्षित रहने से मतदाताओं का मताधिकार कैसे छिन जाता है और क्या इससे जातिगत विभाजन बढ़ता है। पीठ ने कहा कि इन पहलुओं पर विचार करना संसद का दायित्व है और केवल इस आधार पर संबंधित कानून को असंवैधानिक नहीं ठहराया जा सकता।

अदालत ने संविधान के अनुच्छेद 330 और 332 का उल्लेख करते हुए कहा कि इनमें आरक्षित सीटों की संख्या का प्रावधान है, परंतु सीटों के रोटेशन को अनिवार्य नहीं बनाया गया है। यह विषय पूर्णतः संसद के अधिकार क्षेत्र में है।

इलाहाबाद हाईकोर्ट भी कर चुका है खारिज

गौरतलब है कि इससे पहले इलाहाबाद हाईकोर्ट ने भी जून 2026 में इसी याचिका को खारिज कर दिया था। हाईकोर्ट ने भी यही माना था कि संविधान के अनुच्छेद 330 और 332 में सीटों के रोटेशन को अनिवार्य नहीं बनाया गया है और यह विषय संसद के अधिकार क्षेत्र में आता है। सर्वोच्च न्यायालय के इस निर्णय ने हाईकोर्ट के रुख को और पुख्ता किया।

आगे क्या

सर्वोच्च न्यायालय के इस फैसले के बाद अब यह मसला पूरी तरह विधायिका के पाले में चला गया है। यदि याचिकाकर्ता या किसी संगठन को आरक्षित सीटों के रोटेशन की व्यवस्था लागू करवानी है, तो उन्हें संसद में प्रस्ताव या विधेयक के ज़रिए यह माँग उठानी होगी। यह मुद्दा आगामी विधानसभा चुनावों की चर्चाओं में स्थान पा सकता है।

संपादकीय दृष्टिकोण

फिर विधानसभा स्तर पर इसकी अनुपस्थिति एक असंगति पैदा करती है जिसे केवल 'संसद का विषय है' कहकर टाला नहीं जाना चाहिए। छह दशकों से किसी एक सीट का निरंतर आरक्षित रहना प्रतिनिधित्व की जटिल राजनीति को जन्म देता है — और यह बहस जाति-आधारित राजनीति के उभार के इस दौर में और भी प्रासंगिक हो जाती है।
RashtraPress
4 नवंबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

सुप्रीम कोर्ट ने यूपी SC-ST सीट रोटेशन याचिका क्यों खारिज की?
सर्वोच्च न्यायालय ने याचिका इसलिए खारिज की क्योंकि संविधान के अनुच्छेद 330 और 332 में आरक्षित सीटों के रोटेशन को अनिवार्य नहीं बनाया गया है। पीठ ने कहा कि यह विषय पूर्णतः संसद के विचार क्षेत्र में आता है, न कि न्यायपालिका के।
कादीपुर विधानसभा सीट कितने समय से आरक्षित है?
उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर जिले की कादीपुर विधानसभा सीट करीब छह दशकों से अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित है। याचिकाकर्ता जगदीश सिंह का तर्क था कि इतने लंबे समय तक एक ही सीट के आरक्षित रहने से सामान्य वर्ग के मतदाताओं का चुनावी विकल्प सीमित हो जाता है।
SC-ST विधानसभा सीटों के रोटेशन की माँग क्या है?
माँग यह है कि पंचायत और नगरपालिका चुनावों की तरह विधानसभा चुनावों में भी आरक्षित सीटों को बदलते रहा जाए, ताकि एक ही क्षेत्र दशकों तक लगातार आरक्षित न रहे। परिसीमन अधिनियम, 2002 की धारा 9(1)(सी) के तहत SC/ST जनसंख्या के आधार पर सीटें आरक्षित की जाती हैं।
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इस याचिका पर क्या कहा था?
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने जून 2026 में इसी याचिका को खारिज करते हुए कहा था कि संविधान के अनुच्छेद 330 और 332 में आरक्षित सीटों की संख्या तय है, परंतु रोटेशन को अनिवार्य नहीं बनाया गया है। यह विषय संसद के अधिकार क्षेत्र में है।
अब इस मुद्दे पर आगे क्या हो सकता है?
सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के बाद यह मुद्दा पूरी तरह विधायिका के पाले में है। यदि SC-ST आरक्षित सीटों के रोटेशन की व्यवस्था लागू करनी है, तो संसद में इसके लिए कानूनी संशोधन या नया विधेयक लाना होगा।
राष्ट्र प्रेस
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